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चक्रवाती तूफान: फेंगल का प्रभाव, हवा की रफ्तार 90 किमी प्रति घंटा तक पहुंचने की संभावना

चक्रवाती तूफान फेंगल के शनिवार की दोपहर पुडुचेरी के निकट पहुंचने की संभावना जताई गई है। इसे लेकर प्रशासनिक अधिकारियों ने स्थानीय लोगों को घरों में रहने की सलाह दी है। बता दें कि शनिवार को चक्रवाती तूफान के मद्देनजर सभी स्कूल और कॉलेज बंद रहेंगे। अधिकारियों ने इसकी जानकारी दी। भारत मौसम विभाग ने शुक्रवार को बताया कि चक्रवाती तूफान के पुडुचेरी के निकट शनिवार दोपहर तक पहुंचने की संभावना है। इस दौरान हवा की रफ्तार 90 किमी प्रतिघंटे की हो सकती है। जिलाधिकारी ए कुलोथुंगन ने पीडब्ल्यूडी, स्थानीय प्रशासन, पुलिस और अन्य विभागों के अधिकारियों संग चर्चा की और हालात की समीक्षा की।

पुडुचेरी और चेन्नई की समंदर में उठ रही ऊंची लहरें

इस बीच पुडुचेरी और चेन्नई की समंदर में ऊंची लहरें उठने लगी है। न्यूज एजेंसी एएनआई द्वारा जारी वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे चक्रवाती तूफान फेंगल के कारण समंदर मैं ऊंची लहरें उठने लगी हैं और तेज बारिश देखने को मिल रही है। मौसम विभाग की मानें तो आज शाम तक चक्रवाती तूफान फेंगल पुडुचेरी और चेन्नई के तटों से टकराएगा। इस बीत तमिलनाडु में भारी बारिश देखने को मिल रही है। तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने एहतियाती उपायों की समीक्षा के लिए बीते दिनों सचिवालय में हाईलेवल मीटिंग बुलाई थी। हालात से निपटने के लिए एनडीआरएफ और राज्य की टीम को तिरुवरुर, मयिलादुथुराई, नागपत्तनम, कुड्डालोर जिले के लिए रवाना किया गया है।

विमानों की उड़ान में बदलाव

बता दें कि चेन्नई और आसपास के जिले चेंगलपेट, कांचीपुरम और तिरुवल्लूर, उत्तरी तटीय शहर कुड्डालोर और नागपत्तनम सहित कावेरी डेल्टा उन स्थानों में शामिल है जहां बारिश लगातार देखने को मिल रही है। इन इलाकों में कई स्थानों पर हल्की से मध्यम और कुछ स्थानों पर भारी बारिश देखने को मिल रही है। बारिश के कारण चेन्नई के ओएमआर रोड समेत कई इलाकों में भारी यातायात जाम देखने को मिला और सड़कों पर पानी भर जाने से यातायात प्रभावित हुआ। बता दें कि चक्रवाती तूफान के मद्देनजर विमानों की उड़ानों में भी बदलाव किया गया है। इस कारण घर से निकलने से पहले दिशानिर्देश और विमानों की जानकारी जरूर ले लें।

स्वास्थ्य टिप्स: नवजात को जन्म के तुरंत बाद शहद न दें, जानें डॉक्टरों की सलाह

जब घर में छोटा और नन्हा मेहमान आता है, तो पूरा घर खुशी से झूम उठता है। बच्चे के जन्म के बाद परिवार के लोगों द्वारा कुछ रीति-रिवाज भी किए जाते हैं। इनमें सबसे कॉमन नवजात बच्चे को शहद चटाना शामिल है। आपने भी देखा होगा कि बच्चे के जन्म के बाद उसको सबसे पहले शहद चटाया जाता है। लेकिन डॉक्टर ऐसा करने से मना करते हैं। आपको बता दें कि न्यू बॉर्न बेबी को डॉक्टर सबसे पहले शहद चटाने से मना करते हैं। तो ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि डॉक्टर नवजात को शहद न चटाने और इसके कारण और नुकसान भी बताए हैं। तो आइए जानते हैं कि बच्चे को शहद चटाने से क्या नुकसान हो सकते हैं।

बच्चे को क्यों नहीं खिलाना चाहिए शहद

डॉक्टर की मानें, तो शहद के साथ-साथ बच्चे को चीनी का पानी भी नहीं पिलाना चाहिए। क्योंकि इन दोनों ही चीजों का स्वाद ब्रेस्टमिल्क से ज्यादा मीठा होता है। ऐसे में जब बच्चे को इन दोनों का स्वाद पसंद आ जाता है, तो फिर उसको मां का दूध अच्छा नहीं लगता है और वह दूध पीने में आनाकानी करने लगता है

ब्रेस्टमिल्क है जरूरी

बता दें कि बच्चे के जन्म से पहले एक घंटे के अंदर उसको मां का दूध ही पिलाना चाहिए। इससे डिस्चार्ज होने से पहले ही शिशु दूध पीना सीख सकता है। जोकि बच्चे के लिए बहुत जरूरी है। क्योंकि शुरूआ में बच्चे को स्तनपान करना सिखाना थोड़ा मुश्किल होता है। वहीं जब इस गोल्डन पीरियड में बच्चे को दूध मिल जाता है, तो इससे बच्चे को स्तनपान सीखने में आसानी होती है।

शहद के साइड इफेक्ट

शहद की वजह से बच्चे को एलर्जी हो सकती है। या फिर बच्चे को दस्त लग सकते हैं और उसके विकास पर नकारात्मक असर भी पड़ सकता है। वहीं शहद से बच्चे को बोटुलिज्‍म नाम का एक दुर्लभ इंफेक्‍शन होने का भी खतरा होता है।

डॉक्टर से जरूर पूछें

डॉक्टर की मानें, तो इ गोल्न आवर में ब्रेस्टफीडिंग करवाया जाना चाहिए। डिलीवरी के लिए जाने से पहले ही स्किन टू स्किन कॉन्‍टैक्‍ट और फीडिंग के बारे में डॉक्‍टर से बात कर लेनी चाहिए। जन्म के बाद बच्चे को ब्रेस्टफीडिंग से पहले कुछ भी नहीं पिलाना चाहिए।

कब दे सकते हैं शहद

नेशनल हेल्‍थ सर्विस के मुताबिक बच्चे के एक साल के होने के बाद ही उसको शहद देना चाहिए। इससे पहले बच्चे को शहद नहीं चटाना चाहिए।

सोशल मीडिया बैन: आस्ट्रेलिया में बच्चों की उम्र सीमा तय होने के बाद अब एक नजर भारत पर भी डालें, जानें इस मामले में विशेषज्ञों की क्या राय है?

social media ban
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  • ऑस्ट्रेलिया का कदम: ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून पारित किया, जिससे भारत में भी इस दिशा में विचार-विमर्श शुरू हो गया है।
  • भारत में बढ़ता सोशल मीडिया उपयोग: 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों में सोशल मीडिया का उपयोग लगातार बढ़ रहा है, जिससे इसके प्रभावों पर चर्चा जरूरी हो गई है।
  • सदुपयोग: सोशल मीडिया बच्चों के लिए शैक्षिक सामग्री, सामाजिक संपर्क और रचनात्मकता के अवसर प्रदान कर सकता है।
  • दुरुपयोग: अश्लील सामग्री, साइबर बुलिंग, और गोपनीयता उल्लंघन जैसी समस्याएं बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं।
  • बाल चिकित्सकों का दृष्टिकोण: मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए प्रतिबंध की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है।

नई दिल्ली/लखनऊ, 30 नवंबर 2024: डिजिटल युग ने न केवल वयस्कों बल्कि बच्चों की जीवनशैली और सोच को भी गहराई से प्रभावित किया है। सोशल मीडिया, जो शुरुआत में संचार का एक माध्यम था, अब बच्चों के मनोरंजन, शिक्षा और सामाजिक जुड़ाव का प्राथमिक स्रोत बन चुका है। हालांकि, इसके अंधाधुंध उपयोग ने बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालना शुरू कर दिया है।

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहां इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच तेजी से बढ़ी है, बच्चों का सोशल मीडिया पर समय बिताना एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने बच्चों पर सोशल मीडिया उपयोग को सीमित करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। ऐसे में यह सवाल प्रासंगिक है कि क्या भारत में भी इस तरह के प्रतिबंधों और नीतियों की आवश्यकता है ?

भारत में सोशल मीडिया उपयोग का मौजूदा परिदृश्य

किशोरों और बच्चों में सोशल मीडिया की लोकप्रियता:

  • लोकप्रिय प्लेटफॉर्म: इंस्टाग्राम, यूट्यूब, स्नैपचैट, फेसबुक, और हाल ही में टिकटॉक जैसे ऐप (भारत में प्रतिबंधित होने से पहले)।
  • उपयोग के आंकड़े:
    • जून 2024 तक भारत में 485 मिलियन सक्रिय सोशल मीडिया उपयोगकर्ता थे।
    • इनमें से लगभग 20% उपयोगकर्ता 18 साल से कम आयु के हैं।
  • औसत स्क्रीन टाइम:
    • 16 वर्ष से कम आयु के बच्चे प्रतिदिन औसतन 3-4 घंटे सोशल मीडिया पर बिताते हैं।
    • शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा और अधिक है।

जानें, इस मामले में विशेषज्ञों की क्या राय है?

डिजिटल इंडिया पर अनवरत काम कर रहे भाजपा विधायक डॉ०राजेश्वर सिंह ने कहा- क़ानून के दायरों में ही होता है समुचित विकास

डॉ.सिंह ने आस्ट्रेलिया के नए प्रस्तावित सोशल मीडिया आयु प्रतिबंध और संबंधित कानून की गिनाई खूबियाँ

ऑस्ट्रेलिया में प्रस्तावित नए सोशल मीडिया कानून बच्चों और किशोरों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए आयु सत्यापन और सामग्री प्रतिबंधों को अनिवार्य करेंगे।

प्रमुख प्रावधान:

1. आयु सत्यापन:

  • 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखा जाएगा।
  • 13-17 वर्ष के किशोरों को आयु-उपयुक्त सामग्री और कड़ी निगरानी के तहत पहुंच दी जाएगी।
  • 18+ उपयोगकर्ताओं को पूरी पहुंच होगी, लेकिन बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

2. जुर्माना: अनुपालन न करने पर सोशल मीडिया कंपनियों को भारी जुर्माना लगेगा।

फायदे:

  • बच्चों और किशोरों को हानिकारक सामग्री और साइबर बुलिंग से बचाव।
  • सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही बढ़ेगी।
  • माता-पिता को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधि नियंत्रित करने में मदद।
  • वैश्विक स्तर पर बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा में नेतृत्व।

ये कानून बच्चों को सुरक्षित डिजिटल अनुभव प्रदान करते हुए प्रौद्योगिकी और सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करेंगे।

देश के वरिष्ठ पत्रकार व भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सदस्य की प्रतिक्रिया

इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर जब truenewsup.com के संस्थापक एवं मुख्य संपादक शिवसागर सिंह चौहान ने देश के जाने माने एवं वरिष्ठ पत्रकार डॉ .रमेश ठाकुर जी से बात की तो उनका भी यही पक्ष था और उन्होंने आस्ट्रेलिया के इस फैसले का स्वागत किया और भारत के लिए भी उतना ही उपयोगी बताया, दरअसल वरिष्ठ पत्रकार रमेश ठाकुर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार में नामित सदस्य भी हैं, जो खासतौर से बच्चों के कल्याण के लिए ही काम करती है। इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर श्री ठाकुर का साफ़तौर से यही कहना है कि वो खुद केंद्र सरकार से कई सालों से इस फैसले की मांग कर रहे हैं कि देश के युवाओं को मजबूत दिशा-दशा देने के लिए कम से कम 14 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया, एंड्रॉयड फोन जैसी वस्तुओं से पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए। तभी हमारे देश का युवा अपने उज्ज्वल भविष्य की तरफ अग्रसर होगा।

बच्चों के मानसिक विकास को लेकर लखनऊ के सुप्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. मनु लाल की प्रतिक्रिया

उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के सुप्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ.मनु लाल ने एक तरफ जहां ऑस्ट्रेलिया द्वारा 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध को सकारात्मक कदम बताया, उन्होंने कहा कि यह बच्चों के मानसिक विकास और स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों में आत्म-सम्मान की कमी, लत, और शारीरिक गतिविधियों में गिरावट का कारण बनता है।

तो वहीं दूसरी तरफ डॉ.मनु लाल ने कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बच्चों के लिए डिजिटल एजुकेशन की दृष्टि से उपयोगी भी बताया। डॉ. मनु लाल ने कहा कि सोशल मीडिया के कुछ प्लेटफॉर्म से बच्चों को पढ़ाई से संबंधित सामग्री प्राप्त होती है। ऐसे में इन प्लेटफॉर्म्स को चिन्हित करते हुए शेष सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से एक निश्चित उम्र सीमा तक के बच्चों को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। इससे न केवल उनका मानसिक विकास होगा, बल्कि इसके सकारात्मक प्रभाव भी जल्द दिखने लगेंगे।

उन्होंने भारत में इस तरह के प्रभावी कानून बनाए जाने की आवश्यकता पर जोर तो दिया। लेकिन इसके साथ ही, उन्होंने कहा कि इन सबके बीच जो बात सबसे जरूरी है वह है “माता-पिता का जागरूक होना” क्योंकि अगर बच्चों के माता-पिता खुद सोशल मीडिया की लत से दूर रहेंगे, तभी बच्चों में भी बदलाव देखने को मिलेगा अन्यथा पेरेंट्स की जागरूकता के बिना इस मामले पर कोई फायदा नहीं होगा।

“सोशल मीडिया प्रतिबंध” पर दिलीप यशवर्धन का बयान

प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक दिलीप यशवर्धन ने ऑस्ट्रेलिया के 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध को एक सराहनीय कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और पढ़ाई में सुधार के लिए जरूरी है।

उन्होंने सुझाव दिया कि “भारत में भी मनोरंजन वाले ऐप्स और मुख्यत जिन ऐप्स से जुएँ की प्रवर्ती जन्म लेती है जिनका प्रचार नामचीन लोगो द्वारा भी किया जाता है पर प्रतिबंध लगाकर शिक्षा आधारित प्लेटफॉर्म को जारी रखना चाहिए। साथ ही, सोशल मीडिया के राजनीतिक और सामाजिक उपयोग को ध्यान में रखते हुए ठोस नीतियां बनानी होंगी।”

श्री यशवर्धन ने भी बच्चों के माता-पिता की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि उनकी जागरूकता बच्चों में डिजिटल आदतों को सुधारने में मददगार होगी। उन्होंने इसे बच्चों के भविष्य और समाज के हित में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

सोशल मीडिया प्रतिबंध पर एक नजर “डॉ. पीयूष शुक्ला” की

लखनऊ के सुप्रसिद्ध होम्योपैथी चिकित्सक डॉ. पीयूष शुक्ला ने ऑस्ट्रेलिया द्वारा 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध को एक सही कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।

डॉ. शुक्ला ने कहा, “सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों में तनाव, चिंता और नींद की समस्या जैसी मानसिक बीमारियों को बढ़ावा दे सकता है। जब तक बच्चे मानसिक रूप से मजबूत नहीं होते, उन्हें इन प्लेटफॉर्म्स से दूर रखना उनकी भलाई के लिए सही रहेगा।”

उन्होंने भारत में इस तरह के कदम को लागू करने की आवश्यकता जताई और माता-पिता से अपील की कि वे अपने बच्चों को सोशल मीडिया के सही उपयोग के लिए जागरूक करें। उनके अनुसार, “माता-पिता का ध्यान और जिम्मेदारी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए अहम है। साथ ही, बच्चों की भी जिम्मेदारी है कि वे स्वयं को किस ओर मोड़ना चाहते हैं और अपनी डिजिटल आदतों का सही दिशा में उपयोग करें क्योंकि कहीं न कहीं एक उम्र के बाद डिजिटल इंडिया के लिए सोशल मीडिया के कुछ ऐप एजूकेशन के लिए महत्वपूर्ण भी साबित हो रहे हैं।”

16 साल के बच्चे की प्रतिक्रिया

लखनऊ के 16 वर्षीय आदित्य (परिवर्तित नाम) ने ऑस्ट्रेलिया के इस फैसले पर अपनी राय देते हुए कहा,
“सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि इससे हमें पढ़ाई और प्रोजेक्ट्स के लिए काफी मदद मिलती है। लेकिन मैं मानता हूं कि इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल हमारी पढ़ाई और दिमाग पर बुरा असर डालता है। अगर सरकार सिर्फ मनोरंजन और जुएं वाले ऐप्स को सीमित कर दे और पढ़ाई से जुड़े प्लेटफॉर्म्स चालू रखें, तो यह बेहतर होगा।”

आदित्य ने यह भी कहा कि सभी पेरेंट्स को बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर ध्यान देना चाहिए और खुद भी एक उदाहरण बनना चाहिए। उन्होंने कहा, “अगर माता-पिता सोशल मीडिया पर कम समय बिताएंगे, तो बच्चों पर भी इसका अच्छा असर पड़ेगा।”

जानें, क्या आकर्षित करता है बच्चों को सोशल मीडिया की ओर ?

  1. मनोरंजन:
    • छोटे-छोटे वीडियो, मीम्स, और इंटरएक्टिव कंटेंट।
  2. सामाजिक जुड़ाव:
    • दोस्तों और परिवार से जुड़े रहने का सरल माध्यम।
  3. शैक्षिक सामग्री:
    • यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर शैक्षिक वीडियो।
  4. रचनात्मकता और आत्म-अभिव्यक्ति:
    • कला, संगीत और नृत्य जैसे हुनर को दिखाने का मंच।

सोशल मीडिया का प्रभाव: एक गहन दृष्टिकोण

सकारात्मक पहलू:

  1. शिक्षा में सहायक:
    • डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों को विभिन्न विषयों में विशेषज्ञता हासिल करने का मौका देते हैं।
    • ट्यूटोरियल, ऑनलाइन कोर्स, और शैक्षिक एप्स का बढ़ता उपयोग।
  2. रचनात्मकता को बढ़ावा:
    • बच्चों को अपने विचारों और रचनात्मक कौशल को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का मंच मिलता है।
    • कई किशोर सोशल मीडिया के माध्यम से करियर बनाने की कोशिश करते हैं।
  3. सामाजिक जुड़ाव:
    • बच्चों को अलग-अलग संस्कृतियों और विचारों को जानने का मौका मिलता है।
    • वे नई भाषाओं और कौशलों को सीखते हैं।

नकारात्मक पहलू:

  1. साइबर बुलिंग और ट्रोलिंग:
    • सोशल मीडिया पर अभद्र टिप्पणियां और साइबर धमकी बच्चों के आत्मविश्वास को बुरी तरह प्रभावित करती हैं।
  2. अनुचित सामग्री तक पहुंच:
    • बच्चों के लिए अनुपयुक्त अश्लील सामग्री और हिंसा से संबंधित वीडियो आसानी से उपलब्ध हैं।
  3. डिजिटल लत:
    • अधिक समय तक स्क्रीन पर रहने से पढ़ाई, खेलकूद और सामाजिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं।
  4. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य:
    • लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों और रीढ़ की हड्डी की समस्याएं होती हैं।
    • सोशल मीडिया पर प्रचारित असली से दूर “परफेक्ट लाइफ” के मानकों से बच्चे हीन भावना का शिकार हो सकते हैं।
  5. डेटा गोपनीयता का खतरा:
    • सोशल मीडिया कंपनियां बच्चों की निजी जानकारी का दुरुपयोग कर सकती हैं।

विश्व के अन्य देशों के प्रयास

ऑस्ट्रेलिया:

  • 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है।
  • सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों का डेटा इकट्ठा करने से रोक दिया गया है।
  • माता-पिता की निगरानी और शिक्षकों की भूमिका को मजबूत किया गया है।

चीन:

  • 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग के उपयोग पर समय सीमा तय है।
  • सरकारी नियमों के तहत बच्चे केवल सप्ताहांत पर ऑनलाइन गेम खेल सकते हैं।

दक्षिण कोरिया:

  • बच्चों के लिए ऑनलाइन कंटेंट को फ़िल्टर करने के सख्त नियम।
  • माता-पिता को बच्चों के डिजिटल उपयोग की निगरानी के लिए प्रेरित किया गया है।

यूनाइटेड किंगडम:

  • बच्चों की गोपनीयता और सुरक्षा के लिए सख्त डिजिटल नीति लागू की गई है।
  • सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों की जानकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बाध्य किया गया है।

क्या भारत में भी उम्र के मुताबिक सोशल मीडिया प्रतिबंध की आवश्यकता है ?

फायदे:

  1. मानसिक स्वास्थ्य:
    • सोशल मीडिया से दूरी अवसाद, चिंता और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं को कम करेगी।
  2. शारीरिक स्वास्थ्य:
    • स्क्रीन टाइम कम होने से बच्चे खेलकूद और अन्य शारीरिक गतिविधियों में शामिल हो सकेंगे।
  3. शैक्षिक प्रदर्शन में सुधार:
    • पढ़ाई पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का मौका मिलेगा।
  4. साइबर अपराध से बचाव:
    • बच्चों को साइबर बुलिंग और अनुचित सामग्री से बचाया जा सकेगा।

चुनौतियां:

  1. डिजिटल साक्षरता में कमी:
    • बच्चों का डिजिटल तकनीक से संपर्क कम हो सकता है।
  2. सामाजिक अलगाव:
    • दोस्त और रिश्तेदारों से जुड़े रहने का प्रमुख माध्यम समाप्त हो सकता है।
  3. रचनात्मकता का अवरोध:
    • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों की कला और हुनर को दिखाने का बड़ा मंच है।

समाधान और सिफारिशें

1. माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका:

  • बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर निगरानी।
  • समय सीमा तय करना और उपयोग के लिए नियम बनाना।
  • बच्चों को ऑफलाइन गतिविधियों में शामिल करना।

2. सख्त कानूनी कदम:

  • सोशल मीडिया कंपनियों पर आयु सत्यापन प्रणाली लागू करना।
  • बच्चों के डेटा संग्रह और विज्ञापनों पर प्रतिबंध।

3. जागरूकता अभियान:

  • बच्चों और अभिभावकों को सोशल मीडिया के सुरक्षित उपयोग के प्रति जागरूक करना।
  • स्कूलों में डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना।

4. वैकल्पिक मंच:

  • बच्चों के लिए सुरक्षित और शैक्षिक कंटेंट वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित करना।

भारत में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को सीमित करना एक चुनौतीपूर्ण लेकिन आवश्यक कदम हो सकता है। हालांकि, पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बजाय, बच्चों को डिजिटल दुनिया के सुरक्षित और संतुलित उपयोग के लिए प्रशिक्षित करना बेहतर विकल्प होगा।

सरकार, अभिभावक, और शिक्षकों को मिलकर काम करना होगा ताकि सोशल मीडिया बच्चों के लिए एक वरदान साबित हो, न कि अभिशाप। “सोशल मीडिया का विवेकपूर्ण उपयोग ही बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है।”

भारत में 0-5 वर्ष के बच्चों में मोबाइल और स्क्रीन की लत,: एक व्यापक समस्या और इसके प्रभाव, जानें क्या है विशेषज्ञों का कहना और इसके उपाय

childrean mobile addiction
childrean mobile addiction

डिजिटल युग में मोबाइल और टैबलेट का उपयोग न केवल वयस्कों बल्कि छोटे बच्चों के लिए भी सामान्य हो गया है। 0-5 वर्ष की आयु के बच्चों में मोबाइल और स्क्रीन के प्रति बढ़ती लत ने माता-पिता और विशेषज्ञों के लिए एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। यह आयु बच्चों के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास का सबसे महत्वपूर्ण चरण होती है। ऐसे में डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक उपयोग उनके विकास को बाधित कर सकता है।

भारत में 0-5 वर्ष के बच्चों का स्क्रीन उपयोग: एक चिंताजनक आंकड़ा

1. चलन और आदतें:

  • मोबाइल को खिलौने की तरह उपयोग करना:
    • बच्चे मोबाइल और टैबलेट को खिलौने की तरह देखते हैं और इसमें उपलब्ध रंगीन कार्टून, गाने और वीडियो उनके लिए बहुत आकर्षक होते हैं।
  • शांत करने का उपकरण:
    • माता-पिता अक्सर बच्चों को शांत करने या व्यस्त रखने के लिए मोबाइल का उपयोग करते हैं, विशेषकर खाने या सोने के समय।

2. आंकड़े और तथ्य:

  • एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 0-5 वर्ष के 70% बच्चे किसी न किसी रूप में स्क्रीन का उपयोग करते हैं।
  • 50% माता-पिता स्वीकार करते हैं कि उनके बच्चे प्रतिदिन कम से कम 2 घंटे मोबाइल देखते हैं।
  • यूट्यूब और कार्टून: इस आयु वर्ग के बच्चों के बीच सबसे लोकप्रिय कंटेंट हैं।

मोबाइल और स्क्रीन लत के कारण और प्रभाव

कारण:

  1. माता-पिता की व्यस्तता:
    • कामकाजी माता-पिता के पास बच्चों के साथ पर्याप्त समय बिताने का समय नहीं होता, जिससे वे मोबाइल का उपयोग एक आसान उपाय के रूप में करते हैं।
  2. सुविधा और उपलब्धता:
    • सस्ते डेटा प्लान और स्मार्टफोन की आसान उपलब्धता ने इस समस्या को बढ़ा दिया है।
  3. शिक्षा और मनोरंजन का भ्रम:
    • माता-पिता यह मानते हैं कि मोबाइल और टैबलेट से बच्चे कुछ सीख रहे हैं, लेकिन यह अक्सर केवल मनोरंजन तक ही सीमित रहता है।

प्रभाव:

1. मानसिक और संज्ञानात्मक विकास पर प्रभाव:
  • भाषा और संवाद कौशल में कमी:
    • स्क्रीन पर निर्भरता के कारण बच्चे बोलने और संवाद करने में देरी का अनुभव करते हैं।
  • ध्यान केंद्रित करने में समस्या:
    • लगातार मोबाइल का उपयोग बच्चों की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को कमजोर करता है।
2. शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:
  • दृष्टि समस्याएं:
    • मोबाइल स्क्रीन पर लंबे समय तक देखने से बच्चों की आंखों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • मोटापा:
    • स्क्रीन टाइम में वृद्धि के कारण शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं, जिससे मोटापे का खतरा बढ़ जाता है।
  • नींद की गड़बड़ी:
    • रात में मोबाइल देखने से बच्चों के स्लीप साइकल पर असर पड़ता है।
3. सामाजिक और भावनात्मक विकास पर प्रभाव:
  • सामाजिक अलगाव:
    • मोबाइल पर समय बिताने के कारण बच्चे परिवार और दोस्तों के साथ कम बातचीत करते हैं।
  • चिड़चिड़ापन और गुस्सा:
    • मोबाइल से दूर करने पर बच्चे चिड़चिड़े और गुस्सैल हो सकते हैं।
4. व्यसनी व्यवहार:
  • आदत बनने का खतरा:
    • इस उम्र में डिजिटल उपकरणों की लत आगे चलकर अन्य प्रकार के व्यसनों की प्रवृत्ति को जन्म दे सकती है।

0-5 वर्ष के बच्चों में मोबाइल लत के प्रति विशेषज्ञों की राय

डॉ. प्रियंका शर्मा (बाल रोग विशेषज्ञ):

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रियंका शर्मा के मुताबिक “बच्चों के दिमाग का विकास शुरुआती वर्षों में बहुत तेजी से होता है। यदि इस समय स्क्रीन का अत्यधिक उपयोग किया जाए, तो उनके मस्तिष्क की संरचना और कार्य प्रभावित हो सकते हैं।”

डॉ. मोनिका गुप्ता (बाल मनोवैज्ञानिक):

बाल मनोवैज्ञानिक डॉ. मोनिका गुप्ता के मुताबिक “बच्चों के लिए मोबाइल एक आसान मनोरंजन साधन बन गया है, लेकिन यह उनकी रचनात्मकता और समस्या समाधान की क्षमता को कम करता है। माता-पिता को इस आदत को नियंत्रित करने के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए।”

डॉ. संजीव सिंह (शिशु स्वास्थ्य विशेषज्ञ):

शिशु स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. संजीव सिंह के मुताबिक “मोबाइल का उपयोग सीमित करने और बच्चों को अधिक शारीरिक और सामाजिक गतिविधियों में शामिल करने से उनकी लत को रोका जा सकता है।”

समस्या का समाधान: बच्चों को स्क्रीन लत से बचाने के उपाय

1. स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण:

  • आयु के अनुसार समय सीमा:
    • 0-2 वर्ष: स्क्रीन उपयोग पूरी तरह से बंद हो।
    • 3-5 वर्ष: स्क्रीन उपयोग 1 घंटे प्रतिदिन से अधिक न हो।

2. वैकल्पिक गतिविधियों को बढ़ावा दें:

  • रचनात्मक खेल:
    • बच्चों को शारीरिक खेल, ड्रॉइंग, और अन्य रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करें।
  • पढ़ाई और कहानी सुनाना:
    • बच्चों को किताबें पढ़ने और कहानियां सुनाने की आदत डालें।

3. माता-पिता की भूमिका:

  • रोल मॉडल बनें:
    • माता-पिता को खुद भी मोबाइल का उपयोग सीमित करना चाहिए ताकि बच्चे उनसे प्रेरणा लें।
  • गुणवत्तापूर्ण समय बिताएं:
    • बच्चों के साथ खेलने और बात करने में अधिक समय लगाएं।

4. तकनीकी समाधान:

  • पैरेंटल कंट्रोल ऐप्स:
    • बच्चों की स्क्रीन उपयोग पर निगरानी रखने के लिए पैरेंटल कंट्रोल सॉफ्टवेयर का उपयोग करें।
  • ऑफलाइन मोड:
    • बच्चों को बिना इंटरनेट वाले ऐप्स और सामग्री तक सीमित रखें।

5. स्क्रीन-फ्री जोन बनाएं:

  • घर के कुछ हिस्सों, जैसे डाइनिंग टेबल और बेडरूम, को स्क्रीन-फ्री जोन घोषित करें।

0-5 वर्ष की आयु बच्चों के जीवन का सबसे संवेदनशील और विकासशील समय होता है। इस दौरान मोबाइल और स्क्रीन के अत्यधिक उपयोग से उनकी मानसिक, शारीरिक और सामाजिक वृद्धि पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

माता-पिता और समाज को मिलकर इस समस्या का समाधान ढूंढ़ना होगा। बच्चों को स्वस्थ और रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करना, स्क्रीन समय को नियंत्रित करना, और डिजिटल उपकरणों का उपयोग केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए करना इस समस्या को हल करने में मदद कर सकता है।

यदि इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो यह न केवल बच्चों के भविष्य को बल्कि समाज के समग्र स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है।

Hemoglobin During Pregnancy: प्रेग्नेंसी में हीमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए इन खाद्य पदार्थों को अपनी डाइट में शामिल करें, जो आपके बच्चे के लिए भी लाभकारी होंगे।

हीमोग्लोबिन एक आयरन रिच प्रोटीन है, जो हमारे शरीर के ब्लड में पाया जाता है। हीमोग्लोबिन की सहायता से रेड ब्लड सेल्स पूरे शरीर में ऑक्सीजन सर्कुलेट होता है। शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर से पता चलता है कि आप कितने स्वस्थ हैं। या फिर आपके शरीर में पोषक तत्वों की जरूरत है। आप इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि गर्भवती महिलाओं के लिए यह कितना जरूरी है। प्रेग्नेंसी के दौरान महिला के शरीर में ब्लड वॉल्यूम बढ़ जाता है। इसका कारण यह है कि प्रेग्नेंट महिलाओं को अधिक मात्रा में आयरन की जरूरत होती है। क्योंकि अगर किसी वजह से शरीर में आयरन की कमी हो जाती है, तो ब्लड में हीमोग्लोबिन का स्तर गिर सकता है।

शरीर में हीमोग्लोबिन का लेवल कम होने से महिलाओं को कमजोरी लगना, चक्कर आना, सांस लेने में दिक्कत और ठंड लगने की समस्या हो सकती है। यह महिलाओं को उनके गर्भ में पलने वाले बच्चे के लिए सही नहीं माना जाता है। इसलिए जरूरी है कि हर गर्भवती महिलाएं अपने हीमोग्लोबिन के लेवल को बैलेंस में बनाए रखने का प्रयास करें। इसके लिए आप अपनी डाइट में कुछ जरूरी चीजों को शामिल कर सकती हैं। तो आइए जानते हैं कि हीमोग्लोबिन के लेवल को बैलेंस में रखने के लिए डाइट में किन चीजों को शामिल करना चाहिए।

खाएं हरी-पत्तेदार सब्जियां

हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक प्रेग्नेंट महिलाओं को अपनी डाइट में हरे पत्तेदार सब्जियों को शामिल करना चाहिए। इससे शरीर में हीमोग्लोबिन का लेवल बढ़ जाता है। दरअसल, यह सब्जियां आयरन को एब्जॉर्व करती है। वहीं हरी पत्तेदार सब्जियों में विटामिन बी और सी की प्रर्याप्त मात्रा पाई जाती है। यह प्रेग्नेंट महिलाओं और गर्भ में पलने वाले बच्चे को स्वस्थ बनाए रखने में सहायता करती है।

मिलेट्स खाएं

मिलेट्स में कई तरह के फूड आइटम्स पाए जाते हैं। जैसे- ज्वार-बाजरा आदि। हेल्थ एक्सपर्ट की मानें, तो प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर में हीमोग्लोबिन का लेवल बढ़ाने के लिए महिलाओं को अपनी डाइट में मिलेट्स को भी शामिल करना चाहिए। इससे बच्चे की ग्रोथ पर सकारात्मक असर पड़ता है। मिलेट्स का सेवन करने से प्रेग्नेंट महिलाओं में काफी ज्यादा मात्रा में हीमोग्लोबिन का लेवल बढ़ने लगता है।

खाएं सिट्रस फ्रूट

प्रेग्नेंसी के समय महिलाएं सिट्रस फ्रूट्स जैसे नींबू या संतरा खाना पसंद करती हैं। इससे मितली या उल्टी की समस्या कम होती है। लेकिन सिट्रस फ्रूट्स की सहायता से प्रेग्नेंट महिलाओं की बॉडी में हीमोग्लोबिन का लेवल बढ़ सकता है। क्योंकि सिट्रस फ्रूट्स में विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। यह शरीर में आयरन को अवशोषित करने की क्षमता बढ़ाता है और हीमोग्लोबिन प्रोडक्शन के लिए जरूरी होता है।

चुकंदर खाएं

बता दें कि प्रेग्नेंसी की तीसरी तिमाही में महिलाओं को चुकंदर या फिर चुकंदर के जूस का सेवन करना चाहिए। हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक चुकंदर का सेवन गर्भवती महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ाने में सहायता करता है। असल में, चुकंदर आयरन का अच्छा स्त्रोत होता है और इसकी सहायता से रेड ब्लड सेल्स तक ऑक्सीजन पहुंचता है। इसके साथ ही यह फोलिक एसिड का भी अच्छा स्त्रोत होता है। यह सेल्स और टिश्यूज के विकास में मदद करता है।