
लखनऊ। देश में तेजी से बदलते आर्थिक एवं साइबर अपराधों के स्वरूप के बीच सरोजनीनगर के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने कानून प्रवर्तन व्यवस्था को आधुनिक, तकनीक-सक्षम और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि आज अपराध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अपराधी अब केवल पारंपरिक तरीकों से नहीं, बल्कि फर्जी कॉल, जाली दस्तावेजों, डिजिटल भुगतान में धोखाधड़ी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से क्लोन की गई आवाजों के जरिए लोगों की मेहनत की कमाई को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में अपराधों की बदलती प्रकृति के अनुरूप पुलिसिंग, जांच प्रक्रिया और न्यायिक व्यवस्था को भी मजबूत करना समय की मांग है।
डॉ. राजेश्वर सिंह ने आर्थिक एवं साइबर अपराधों से संबंधित विभिन्न आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ साइबर धोखाधड़ी की चुनौती भी गंभीर होती जा रही है। नागरिकों द्वारा रिपोर्ट किए गए साइबर धोखाधड़ी के नुकसान वर्ष 2023 में लगभग 7,465 करोड़ रुपये से बढ़कर वर्ष 2024 में 22,845 करोड़ रुपये तक पहुंचने का आंकड़ा इस चुनौती की व्यापकता को दर्शाता है। यह स्थिति बताती है कि साइबर अपराध अब केवल तकनीकी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि आम नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा, बैंकिंग व्यवस्था में विश्वास और देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन चुका है।
पारंपरिक अपराधों से डिजिटल धोखाधड़ी तक बदला अपराध का स्वरूप
डॉ. सिंह ने कहा कि पहले आर्थिक अपराधों में जालसाजी, फर्जी दस्तावेजों और वित्तीय लेन-देन में धोखाधड़ी जैसे तरीके प्रमुख थे, लेकिन अब अपराधियों ने तकनीक का इस्तेमाल कर अपने तौर-तरीकों को अधिक जटिल बना लिया है। फर्जी बैंक अधिकारी बनकर फोन करना, ओटीपी हासिल करना, नकली निवेश योजनाओं के जरिए लोगों को लालच देना, संदिग्ध लिंक भेजकर बैंक खातों तक पहुंच बनाना और किसी परिचित की आवाज की नकल करके पैसे मांगना जैसे तरीके तेजी से चिंता का विषय बन रहे हैं।
उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यमों के जरिए होने वाले अपराधों में पीड़ित व्यक्ति को कई बार यह समझने का अवसर भी नहीं मिलता कि उसके साथ धोखाधड़ी हो रही है। अपराधी कुछ ही मिनटों में बैंक खातों से रकम निकाल सकते हैं या उसे कई अलग-अलग खातों में स्थानांतरित कर सकते हैं। ऐसे मामलों में समय पर शिकायत, संदिग्ध लेन-देन की पहचान और धन के प्रवाह को रोकने की क्षमता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
डॉ. सिंह के अनुसार, बदलते अपराध परिदृश्य में कानून प्रवर्तन एजेंसियों को केवल घटना के बाद कार्रवाई करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि तकनीकी निगरानी, डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण और विभिन्न संस्थानों के बीच समन्वय के माध्यम से अपराधों की रोकथाम पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए।
1.14 लाख से बढ़कर 2.14 लाख तक पहुंचे आर्थिक अपराध
आर्थिक अपराधों से संबंधित आंकड़ों का उल्लेख करते हुए डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) के अंतर्गत दर्ज आर्थिक अपराधों की संख्या वर्ष 2012 में लगभग 1.14 लाख थी, जो वर्ष 2024 में बढ़कर लगभग 2.14 लाख तक पहुंच गई। प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, इनमें करीब 87 प्रतिशत मामले जालसाजी, धोखाधड़ी और छल से संबंधित बताए गए हैं।
उन्होंने बैंकिंग धोखाधड़ी से जुड़े वित्तीय नुकसान पर भी चिंता जताई। उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2004-05 से 2023-24 के बीच बैंक धोखाधड़ी से संबंधित कुल राशि लगभग 5.66 लाख करोड़ रुपये रही, जबकि इसमें से करीब सात प्रतिशत राशि ही वसूल हो सकी।
डॉ. सिंह ने कहा कि आर्थिक अपराधों का वास्तविक प्रभाव केवल दर्ज मामलों या वित्तीय नुकसान के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। इसके कारण आम नागरिकों की बचत प्रभावित होती है, कारोबारियों का विश्वास कमजोर पड़ता है और वित्तीय संस्थानों की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ सकता है। विशेष रूप से ऋण संबंधी बड़े धोखाधड़ी मामलों में वित्तीय नुकसान की मात्रा अत्यधिक हो सकती है। इसलिए ऐसे मामलों में समयबद्ध जांच, संपत्तियों की पहचान और कानून के अनुरूप धन की वसूली के प्रयासों को प्रभावी बनाना आवश्यक है।
साइबर शिकायतों में वृद्धि, जांच व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत
डॉ. राजेश्वर सिंह ने साइबर अपराधों की बढ़ती शिकायतों को भी गंभीर चुनौती बताया। उनके द्वारा उद्धृत आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 में लगभग 4.52 लाख साइबर शिकायतों की तुलना में वर्ष 2025 में शिकायतों की संख्या करीब 24 लाख तक पहुंच गई। शिकायतों में यह वृद्धि साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ-साथ जांच एजेंसियों के सामने बढ़ते कार्यभार की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है।
उन्होंने कहा कि साइबर अपराधों की जांच में तकनीकी विशेषज्ञता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। डिजिटल लेन-देन का रिकॉर्ड खंगालना, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित रखना, संदिग्ध खातों की पहचान करना, धन के हस्तांतरण की कड़ियों को जोड़ना और विभिन्न राज्यों में सक्रिय अपराधियों तक पहुंचना सामान्य जांच से अलग विशेषज्ञता की मांग करता है।
ऐसे में प्रत्येक जिले में प्रशिक्षित अधिकारियों और आधुनिक डिजिटल फॉरेंसिक सुविधाओं से युक्त विशेषज्ञ साइबर एवं आर्थिक अपराध इकाई स्थापित करने से जांच प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर शिकायतों के निस्तारण, डिजिटल साक्ष्य के विश्लेषण और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को मजबूती मिल सकती है।
आर्थिक अपराधों में त्वरित न्याय और दोषसिद्धि पर जोर
डॉ. सिंह ने आर्थिक अपराधों में दोषसिद्धि दर और न्यायालयों में लंबित मामलों से संबंधित आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि अपराधियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई के लिए केवल प्राथमिकी दर्ज करना पर्याप्त नहीं है। जांच की गुणवत्ता, डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता, अभियोजन की तैयारी और न्यायिक प्रक्रिया की गति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने उद्धृत आंकड़ों के अनुसार, आर्थिक अपराधों में दोषसिद्धि दर लगभग 29 प्रतिशत और 96 प्रतिशत से अधिक मामलों के न्यायालयों में लंबित होने की स्थिति पर चिंता जताई। उनके अनुसार, यदि मामलों के निस्तारण में अत्यधिक समय लगता है, तो पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है और अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई का प्रभाव भी कमजोर पड़ सकता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए आर्थिक एवं साइबर अपराधों से जुड़े मामलों की शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विशेष न्यायालयों की क्षमता बढ़ाने, जांच और अभियोजन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा डिजिटल साक्ष्यों के प्रबंधन की व्यवस्था मजबूत करने की आवश्यकता है। हालांकि, त्वरित न्याय के साथ निष्पक्ष सुनवाई, कानूनी प्रक्रिया और आरोपियों के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
हर जिले में विशेषज्ञ साइबर एवं आर्थिक अपराध इकाई स्थापित करने का सुझाव
आर्थिक अपराधों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए डॉ. राजेश्वर सिंह ने चार प्रमुख सुझाव प्रस्तुत किए।
पहला, हर जिले में विशेषज्ञ इकाई की स्थापना: उन्होंने आर्थिक एवं साइबर अपराधों की जांच के लिए प्रशिक्षित अधिकारियों का विशेष कैडर विकसित करने और आधुनिक डिजिटल फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर जोर दिया। इससे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के विश्लेषण, संदिग्ध लेन-देन की जांच और जटिल वित्तीय अपराधों के खुलासे में मदद मिल सकती है।
दूसरा, समयबद्ध न्याय व्यवस्था: आर्थिक एवं साइबर अपराधों की शीघ्र सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों की क्षमता बढ़ाई जानी चाहिए। साथ ही, जांच एजेंसियों और अभियोजन पक्ष को तकनीकी प्रशिक्षण देकर मामलों की प्रभावी पैरवी सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि पीड़ितों को अनावश्यक विलंब का सामना न करना पड़े।
तीसरा, संदिग्ध बैंक खातों और धन के प्रवाह पर तत्काल कार्रवाई: साइबर धोखाधड़ी में इस्तेमाल होने वाले म्यूल बैंक खातों की पहचान के लिए वास्तविक समय में निगरानी और बैंकों, फिनटेक कंपनियों तथा दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के बीच बेहतर समन्वय विकसित करने की जरूरत है। म्यूल खाते वे बैंक खाते होते हैं जिनका इस्तेमाल धोखाधड़ी से प्राप्त धन को स्थानांतरित करने या छिपाने के लिए किया जाता है। ऐसे खातों के संबंध में कानून और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुरूप समय पर कार्रवाई होने से पीड़ितों की रकम को आगे स्थानांतरित होने से रोकने में मदद मिल सकती है। साथ ही, संबंधित संस्थानों की जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
चौथा, डिजिटल साक्षरता को जनआंदोलन बनाना: ग्रामीण क्षेत्रों, वरिष्ठ नागरिकों, विद्यार्थियों और पहली बार डिजिटल भुगतान करने वाले लोगों तक साइबर सुरक्षा की जानकारी पहुंचाई जानी चाहिए। आम नागरिकों को यह समझाना जरूरी है कि बैंक अधिकारी बनकर फोन करने वाले व्यक्ति के साथ ओटीपी या गोपनीय जानकारी साझा न करें, संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने से बचें, अनजान लोगों के कहने पर स्क्रीन साझा करने वाले ऐप डाउनलोड न करें और किसी परिचित की आवाज में पैसे मांगने वाले फोन की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें। व्यापक जनजागरूकता के माध्यम से अनेक साइबर अपराधों को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता है।
डिजिटल अर्थव्यवस्था में विश्वास कायम रखना जरूरी
डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि भारत तेजी से डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन बैंकिंग और तकनीक आधारित सेवाओं की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में डिजिटल अर्थव्यवस्था की सफलता के लिए नागरिकों का भरोसा बनाए रखना अनिवार्य है। यदि लोग ऑनलाइन लेन-देन को लेकर असुरक्षित महसूस करेंगे, तो डिजिटल सेवाओं के विस्तार और आर्थिक गतिविधियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि आर्थिक अपराधों के प्रति शून्य सहिष्णुता का दृष्टिकोण अपनाते हुए तकनीकी निगरानी, संस्थागत जवाबदेही, प्रशिक्षित मानव संसाधन और त्वरित न्याय के बीच मजबूत तालमेल स्थापित करना होगा। पुलिस, बैंकिंग संस्थानों, दूरसंचार कंपनियों, फिनटेक सेवाओं और संबंधित नियामक संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय से अपराधियों के नेटवर्क को तोड़ने तथा पीड़ितों को राहत पहुंचाने में सहायता मिल सकती है।
डॉ. सिंह ने यह भी रेखांकित किया कि विकसित राष्ट्र बनने और पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए आर्थिक सुरक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक है। आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल केवल आर्थिक गतिविधियों को आसान बनाने के लिए ही नहीं, बल्कि धोखाधड़ी की पहचान करने, वित्तीय लेन-देन को सुरक्षित रखने और अपराधियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई करने के लिए भी किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि नागरिकों की मेहनत की कमाई की रक्षा करना केवल वित्तीय सुरक्षा का विषय नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक स्थिरता, डिजिटल व्यवस्था में विश्वास और न्यायपूर्ण शासन से भी जुड़ा हुआ है। आर्थिक एवं साइबर अपराधों के बदलते स्वरूप के अनुरूप कानून प्रवर्तन व्यवस्था का आधुनिकीकरण ही इस चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटने का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।


































