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जयशंकर की बीजिंग यात्रा से पहले चीन का बयान – तिब्बत से जुड़े मुद्दे भारत-चीन रिश्तों में निभाते हैं महत्वपूर्ण भूमिका

नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास ने रविवार (13 जुलाई, 2025) को कहा कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी सहित तिब्बत से संबंधित मुद्दे भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में एक कांटा हैं और वे नई दिल्ली के लिए एक बोझ बन गए हैं. चीन की ओर से यह टिप्पणी विदेश मंत्री एस. जयशंकर की शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन यात्रा से पहले आई है. पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर 2020 के सैन्य गतिरोध के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों में आए गंभीर तनाव के बाद यह जयशंकर की पहली चीन यात्रा होगी.

भारत और चीन ने पिछले साल अक्टूबर में पूर्वी लद्दाख के सैन्य गतिरोध वाले अंतिम दो स्थानों से अपने-अपने सैनिकों को पीछे हटाया है. पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने के लिए कई उपाय शुरू किए हैं.

चीन ने दलाई लामा के बयान पर जताई नाराजगी

इस महीने की शुरुआत में दलाई लामा ने कहा था कि तिब्बती बौद्धों के एक ट्रस्ट को उनके भावी उत्तराधिकारी को मान्यता देने का एकमात्र अधिकार होगा. वहीं, चीन ने दलाई लामा की टिप्पणी पर नाराजगी व्यक्त की और कहा कि उनके उत्तराधिकारी को चीनी सरकार की ओर से मंजूरी दी जानी चाहिए.

दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर चीनी दूतावार के प्रवक्ता ने दिया बयान

चीनी दूतावास के प्रवक्ता यु जिंग ने रविवार (13 जुलाई) को एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “पूर्व अधिकारियों सहित रणनीतिक और शैक्षणिक समुदायों के सदस्यों ने दलाई लामा के उत्तराधिकारी के संबंध में भारत सरकार के सार्वजनिक रुख के विपरीत अनुचित टिप्पणी की है.”

यु जिंग ने कहा, “उन्हें शिजांग से संबंधित मुद्दों की संवेदनशीलता के बारे में पूरी तरह से अवगत होना चाहिए और यह भी कि दलाई लामा के पुनर्जन्म और उत्तराधिकार स्वाभाविक रूप से चीन का आंतरिक मामला है, जिसमें किसी भी बाहरी ताकत का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.”

उल्लेखनीय है कि चीन तिब्बत को शिजांग कहता है. चीनी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा, “वास्तव में, शिजांग से संबंधित मुद्दा चीन-भारत संबंधों में एक कांटा है और भारत के लिए बोझ बन गया है. शिजांग कार्ड खेलना निश्चित रूप से अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा.”

14-15 जुलाई को चीन की यात्रा करेंगे एस. जयशंकर

जयशंकर एससीओ के विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के लिए 14 और 15 जुलाई को चीन की यात्रा पर जाएंगे. एससीओ सम्मेलन के दौरान उनके अपने चीनी समकक्ष वांग यी के साथ द्विपक्षीय वार्ता करने की उम्मीद है.

Sports News:‘वो और मैं…’ – बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल और पारुपल्ली कश्यप का तलाक, साझा किया भावुक नोट

मशहूर बैडमिंटन प्लेयर साइना नेहवाल ने अपने पति पारुपल्ली कश्यप से अलग होने का फैसला सार्वजानिक किया. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक नोट शेयर करते हुए इसकी जानकारी दी. दोनों की प्रेम कहानी बैडमिंटन कोर्ट से ही शुरू हुई थी. दोनों ने हैदराबाद स्थित पुलेला गोपीचंद एकेडमी में साथ ट्रेनिंग ली थी, यहीं से दोनों के बीच दोस्ती शुरू हुई जो आगे चलकर प्यार में बदली.

साइना नेहवाल ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर एक नोट शेयर करते हुए लिखा, “जिंदगी हमें कभी कभी अलग रास्तों पर ले जाती है. काफी विचार करने के बाद, मैंने और पारुपल्ली कश्यप ने अलग होने का फैसला किया है. हमने एक दूसरे के लिए शान्ति, विकास और स्वस्थ जीवन को चुनने का फैसला किया है. मैं इन यादगार पलों के लिए आभारी हूं और भविष्य के लिए शुभकामनाएं देती हूं. इस समय हमारी प्राइवेसी को समझने और इसका सम्मान करने लिए धन्यवाद.”

साइना नेहवाल और पारुपल्ली कश्यप की शादी कब हुई थी?

साइना और पारुपल्ली की शादी 14 दिसंबर, 2018 को हुई थी. हरियाणा के हिसार में जन्मी साइना पारुपल्ली कश्यप से 3 साल छोटी हैं. शादी के समय परुप्पाली 31 और साइना नेहवाल 28 साल की थी. 30 साल की उम्र में साइना ने राजनीती में भी कदम रखा था, उन्होंने 2020 में बीजीपी पार्टी ज्वाइन की थी.

साइना नेहवाल का बैडमिंटन करियर

साल 2005 में साइना नेहवाल ने 15 साल की उम्र में एशियाई सॅटॅलाइट टूर्नामेंट जीता था. 2012 लंदन ओलंपिक में उन्होंने विमेंस सिंगल में ब्रोंज मेडल जीता था. ये उनका ओलंपिक में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी है. साइना ने अपने करियर में कामनवेल्थ गेम्स में 3 गोल्ड मेडल जीते, इसमें से 2 विमेंस सिंगल और एक मिक्स्ड डबल में आया था.

    • 2010, न्यू दिल्ली- विमेंस सिंगल
    • 2018, गोल्ड कोस्ट- विमेंस सिंगल
    • 2018, गोल्ड कोस्ट- मिक्स्ड डबल

2015 में साइना नेहवाल पहली भारतीय महिला प्लेयर बनी थी, जिन्होंने बैडमिंटन रैंकिंग में पहला स्थान हासिल किया था. पारुपल्ली कश्यप की बात करें तो उन्होंने 2014 ग्लासगो कामनवेल्थ के मेंस सिंगल में स्वर्ण पदक जीता था. कश्यप ने 2013 में अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ रैंक हासिल की थी, वह छठे नंबर पर पहुंचे थे।

The Legacy of Madan Mohan: जज्बातों को साज में पिरोने वाला वो ग़ज़ल सम्राट, जिसे निधन के 30 साल बाद मिला फिल्मफेयर अवॉर्ड

 जब सुर किसी जादू की तरह दिल में उतरें और हर धुन में कुछ खास एहसास हो, तो समझ लीजिए वह संगीत मदन मोहन का है. 14 जुलाई, 1975 को हिंदी सिनेमा ने एक ऐसे जादूगर को खो दिया, जिसने अपनी धुनों से गीतों को अमर करने के साथ-साथ लाखों दिलों में भावनाओं का समंदर उड़ेल दिया. मदन मोहन, जिन्हें लता मंगेशकर ‘मदन भैया’ और ‘गजलों का शहजादा’ कहती थीं, वह एक फौजी से लेकर संगीत के शिखर तक पहुंचने वाले अनमोल रत्न थे.

उनकी धुनों में शामिल ‘लग जा गले’ की उदासी हो या ‘कर चले हम फिदा’ का जोश, आज हर सांस में बसती हैं. उनकी पुण्यतिथि पर आइए, उस संगीतकार को याद करें, जिसने सुरों को आत्मा और गीतों को जज़्बातों का रंग दिया.

एक तारीख जो केवल याद नहीं, श्रद्धांजलि भी है

14 जुलाई सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उस संगीत सम्राट को याद करने का दिन है, जिसने हिंदी फिल्म संगीत को भावनात्मकता और रूहानियत का अद्भुत संगम दिया. मदन मोहन की पहचान यूं तो एक संगीतकार के तौर पर है, लेकिन वह इससे कहीं बढ़कर थे; वे एक भावना के रचयिता थे जो हर गीत को सिर्फ धुन नहीं, एक जीवंत अनुभव बना देते थे.

उन्होंने सुरों को महज मनोरंजन नहीं, अंतरात्मा की आवाज बना दिया, चाहे वो मोहब्बत की मासूमियत हो, विरह का दर्द हो या देशभक्ति का जुनून. उनकी धुनें हर भाव को संवेदना की सच्ची परिभाषा देती हैं. 14 जुलाई 1975 को भारतीय सिनेमा की सुरमयी दुनिया से एक ऐसा सितारा बुझ गया, जिसकी रोशनी आज भी कानों से होते हुए दिलों तक पहुंचती है.

मदन मोहन का पूरा नाम मदन मोहन कोहली था. वह एक सैनिक, एक रेडियो कलाकार और फिर हिंदी सिनेमा के सबसे रुहानी संगीतकारों में से एक थे. “मदन मोहन: अल्टीमेट मेलोडीज” में उनकी जिंदगी के पन्नों को पलटा गया है. उनके जन्म से लेकर जिंदगी के अहम पड़ावों का जिक्र है.

बगदाद में जन्मा भारतीय संगीत का रत्न

मदन मोहन का जन्म 25 जून 1932 को बगदाद में हुआ.शुरुआती शिक्षा लाहौर, फिर मुंबई और देहरादून में हुई. 1943 में वह द्वितीय लेफ्टिनेंट के रूप में भारतीय सेना से जुड़े और द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक सेवा की. लेकिन उनकी आत्मा का संगीत से रिश्ता कहीं गहराई से बंधा था. 1946 में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, लखनऊ में कार्यक्रम सहायक के रूप में काम करना शुरू किया, जहां उस्ताद फैयाज खान और बेगम अख्तर जैसे दिग्गजों के संपर्क ने उनके भीतर का संगीतकार जाग्रत किया.

1948 में मुंबई वापसी के बाद उन्होंने एसडी बर्मन और श्याम सुंदर जैसे संगीत निर्देशकों के सहायक के रूप में काम किया, लेकिन बतौर स्वतंत्र संगीतकार उनकी असली पहचान बनी 1950 की फिल्म ‘आंखें’ से. इसके बाद उनका सफर कभी थमा नहीं. लता मंगेशकर की आवाज के साथ उन्होंने जो रचनाएं कीं, वह आज भी अमर गीतों की श्रेणी में आती हैं. लता उन्हें ‘मदन भैया’ कहकर बुलाती थीं और उन्हें गजलों का शहजादा कहती थीं.

मदन मोहन के सबसे पसंदीदा गायक थे मोहम्मद रफी. ‘लैला मजनूं’ जैसी फिल्म में जब किसी ने किशोर कुमार की सिफारिश की, तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया, ‘मजनूं की आवाज तो सिर्फ रफी साहब की हो सकती है.’ नतीजा यह हुआ कि यह फिल्म म्यूजिकल हिट बन गई और रफी की आवाज ऋषि कपूर की पहचान.

वो गीत जो समय को पार कर दिल में बस गए

कुछ गीत ऐसे होते हैं जो समय की सीमाओं को पार कर, आज भी दिल को गहरे तक छू लेते हैं. ‘लग जा गले…’ (वो कौन थी, 1964) की मधुर धुन और लता मंगेशकर की सौम्य आवाज प्रेम और बिछोह की भावनाओं को एक साथ उकेरती है, मानो हर नोट में एक अनकहा वादा छिपा हो. ‘आपकी नजरों ने समझा…’ (अनपढ़, 1962) का रोमानी अंदाज और उसकी सादगी भरी धुन प्रेम की गहराई को व्यक्त करती है, जो सुनने वाले को एक अलग ही दुनिया में ले जाती है. ‘कर चले हम फिदा…’ (हकीकत, 1965) देशभक्ति का ऐसा जज्बा जगाता है कि हर शब्द में बलिदान और गर्व का मिश्रण महसूस होता है. वहीं, ‘तुम जो मिल गए हो…’ (हंसते जख्म, 1973) की मेलोडी प्रेम की जटिलताओं को उजागर करती है, जो सुनते ही दिल में एक मीठा दर्द जगा देती है. और ‘वो भूली दास्तां…’ (संजोग, 1961) की उदास धुन बीते हुए पलों की यादों को ताज़ा करती है, मानो कोई पुरानी किताब के पन्ने पलट रहे हों. इन गीतों की धुनें किसी कल्पनालोक की तरह हैं, जो आंखें नम भी करती हैं और दिल में एक अनमोल, मीठा दर्द भी भर देती हैं. ये गीत सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि भावनाओं का एक ऐसा खजाना हैं जो हर पीढ़ी के दिल को छूता रहेगा.

राजा मेंहदी अली खान, राजेन्द्र कृष्ण और कैफी आजमी, इन तीनों के साथ मदन मोहन की जुगलबंदी ने हिंदी सिनेमा को अमर गीत दिए. राजेन्द्र कृष्ण की कोमलता, राजा मेंहदी अली की भावनात्मक गहराई और कैफी आजमी की शायरी को मदन मोहन की धुनों ने परवाज दी.

14 जुलाई 1975 को मात्र 51 वर्ष की उम्र में मदन मोहन का देहांत हो गया, लेकिन उनके जाने के बाद भी उनकी संगीत-संपदा आगे जिंदा रही. 2004 में यश चोपड़ा ने फिल्म ‘वीर जारा’ में उनकी अप्रयुक्त धुनों को इस्तेमाल किया, जिन पर जावेद अख्तर ने नए बोल लिखे. ‘तेरे लिए’ और ‘कभी ना कभी तो मिलोगे’ जैसे गीतों ने फिर से मदन मोहन की आत्मा को जिंदा कर दिया. यही वजह है कि उन्हें इस फिल्म के गाने ‘तेरे लिए’ के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला.

लता-मदन की जोड़ी थी संगीत की आत्मा

लता मंगेशकर के बिना मदन मोहन अधूरे थे और मदन मोहन के बिना लता के करियर की परिभाषा अधूरी. लता उन्हें राखी बांधा करती थीं और हर बार उनकी धुनों को आवाज देने के लिए तैयार रहती थीं. आशा भोंसले की शिकायतें कि वे सिर्फ लता से गवाते हैं, भी इस बात का प्रमाण हैं कि यह जोड़ी सिनेमा इतिहास की सबसे आत्मीय साझेदारी थी.

मदन मोहन ने लगभग 100 फिल्मों के लिए संगीत दिया. लेकिन संख्या नहीं, बल्कि उनकी धुनों की गुणवत्ता ही उन्हें कालजयी बनाती है. उन्होंने संगीत में सिर्फ सुर नहीं दिए, उन्होंने श्रोताओं को भावनाओं का अनुभव कराया—जैसे धड़कते दिल की आवाज को सुर में ढाल दिया हो.

Health Tips:अगर खड़े होते ही आने लगते हैं चक्कर, तो इस संकेत को न करें नजरअंदाज – हो सकती है यह गंभीर बीमारी

आमतौर पर कई बार देखा जाता है कि लोग लेटने या लंबे समय तक बैठने के बाद जैसे ही अचानक खड़े होते हैं उन्हें चक्कर आने लगता है. इसके अलावा आंखों के सामने धुंधलापन छा जाता है या कमजोरी महसूस होने लगती है तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. एक्सपर्ट इसे एक प्रकार का लो ब्लड प्रेशर मानते हैं जिसे मेडिकल भाषा में ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन या पोस्चरल हाइपोटेंशन कहा जाता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताएंगे कि खड़े होते ही चक्कर क्यों आते हैं इसके लक्षण क्या है और इसके बचाव क्या हो सकते हैं.

खड़े होते ही क्यों गिरता है ब्लड प्रेशर

कुछ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति अचानक खड़ा होता है तो गुरुत्वाकर्षण बल के कारण शरीर का खून पैरों में जमा हो जाता है. जिससे दिल की ओर लौटने वाला ब्लड कम हो जाता है और अचानक ब्लड प्रेशर गिरने लगता है इससे ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन कहते हैं. दिल और ब्लड सेल्स इस कमी की भरपाई के लिए तेजी से प्रतिक्रिया देते हैं. जिसमें दिल तेजी से धड़कने लगता है और सेल्स सिकुड़ती है ताकि ब्लड सर्कुलेशन बना रहे लेकिन जिन लोगों में यह प्रतिक्रिया कमजोर होती है उन्हें चक्कर या बेहोशी जैसी समस्याएं हो सकती है.

किन लोगों को होता है ज्यादा खतरा

एकदम से उठने के बाद चक्कर या बेहोशी जैसी समस्याओं का खतरा आमतौर पर बुजुर्गों को ज्यादा होता है. इसके अलावा डिहाइड्रेशन की कमी से जूझ रहे या फिर कुछ खास दवाई लेने वाले लोगों को भी इसका खतरा सबसे ज्यादा होता है.

क्या हैं इसके लक्षण

ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन के लक्षण में सबसे ज्यादा आम लक्षण चक्कर आना या सिर का घूमना होता है. इसके अलावा आंखों का धुंधलापन भी इसका लक्षण होता है. वहीं अचानक कमजोरी, थकावट, जी मिचलाना भी इसका लक्षण हो सकता है. इनके अलावा गंभीर स्थिति में बेहोश हो जाना भी इसका लक्षण होता है. ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन में यह सभी लक्षण खड़े होते ही शुरू हो जाते हैं और बैठने या लेटने के बाद थोड़ी देर में ठीक हो जाते हैं. लेकिन बार-बार ऐसा होना खतरे का संकेत हो सकता है.

जाने कब डॉक्टर को दिखाना हो सकता है जरूरी

डॉक्टर बताते हैं कि अगर किसी को बार-बार बेहोशी आती है या बार-बार खड़े होते ही चक्कर आते हैं तो इसे हल्के में न लें. यह किसी गंभीर मेडिकल समस्या का संकेत हो सकता है. जैसे नर्वस सिस्टम की गड़बड़ी, हार्ट संबंधी बीमारियां या न्यूरोलॉजिकल दिक्कत की वजह से ऐसा हो सकता है. ऐसे में अगर आपके साथ भी यह समस्या बार-बार होती है तो आपको तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए.

क्या है बचाव का तरीका

इस समस्या से बचने के लिए काफी देर बैठे या लेटे रहने के बाद खड़े होने से पहले धीरे-धीरे उठें, खासकर बिस्तर से. इसके अलावा पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें ताकि आपको डिहाइड्रेशन न हो. इसके अलावा कॉम्प्रेशन स्टॉकिंग्स पहने जिससे पैरों में ब्लड पुलिंग ना हो. इस समस्या से बचने के लिए भारी भोजन न करें और छोटे-छोटे और हल्के कदम चलने की कोशिश करें. साथ ही नियमित एक्सरसाइज करते रहे ताकि शरीर में ब्लड सर्कुलेशन बेहतर बना रहे.

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

डॉ. राजेश्वर सिंह ने ISC राष्ट्रीय टॉपर मेधा प्रसाद को बताया एकाग्रता और उत्कृष्टता की प्रतीक: ISC में 99.75%! डॉ. राजेश्वर सिंह ने नेशनल टॉपर मेधा प्रसाद की उपलब्धि को सराहा

  • डॉ. राजेश्वर सिंह ने ISC टॉपर मेधा प्रसाद को किया सम्मानित, बताया अपनी पीढ़ी की प्रेरणा
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  • मॉडर्न अकेडमी गोमती नगर के 5 मेधावियों को डॉ. राजेश्वर सिंह ने प्रदान किये लैपटॉप

लखनऊ: “मेधा प्रसाद ने वास्तव में अपने नाम के सार को साकार किया है, जो ज्ञान, विवेक और बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। ISC में 99.75% अंक प्राप्त कर, उन्होंने न केवल शैक्षणिक रूप से उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है, बल्कि अपनी पीढ़ी के लिए एक चमकदार उदाहरण भी प्रस्तुत किया है। उनकी प्रतिबद्धता, विचारों की स्पष्टता और निरंतर कड़ी मेहनत उत्कृष्टता की सच्ची भावना को दर्शाते हैं। इस विचलित समय में, मेधा ने दिखाया है कि एकाग्रता, मूल्य और दृष्टिकोण असाधारण सफलता की ओर ले जाते हैं। उन्होंने अपने परिवार, विद्यालय और पूरे समुदाय को गौरवान्वित किया है और अनगिनत युवा मनों को ऊँचे लक्ष्य रखने के लिए प्रेरित किया है।” ये प्रेरणास्पद शब्द सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह द्वारा ISC बोर्ड की राष्ट्रीय टॉपर मेधा प्रसाद को सम्मानित करते हुए शुक्रवार को गोमती नगर स्थित मॉडर्न एकेडमी में आयोजित फेलिसिटेशन सेरेमनी में कहे गए।

यह कार्यक्रम ICSE (कक्षा 10) एवं ISC (कक्षा 12) की बोर्ड परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित करने के लिए आयोजित किया गया था। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. राजेश्वर सिंह ने मेधावी छात्रों को मेडल, प्रमाण पत्र, स्मृति चिह्न एवं लैपटॉप प्रदान किए और उन्हें शिक्षा, मूल्य और राष्ट्र निर्माण पर केंद्रित संदेश दिया। मेधा प्रसाद को सम्मानित करने के अलावा, डॉ. सिंह ने ICSE स्कूल टॉपर काव्या गुप्ता तथा NEET में ऑल इंडिया रैंक 325 प्राप्त करने वाली अद्विता को भी सम्मानित किया। उन्होंने विद्यालय की पूर्व छात्रा अंतरा हॉवर्ड (वर्तमान मिसेज उत्तर प्रदेश) तथा भारत की अंडर-19 क्रिकेट विश्वकप टीम के सदस्य नमन तिवारी का विशेष उल्लेख करते हुए उन्हें संस्थान द्वारा निर्मित प्रेरणास्रोत बताया।

डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता के अंतर्गत, डॉ. राजेश्वर सिंह ने श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले छात्रों के लिए विद्यालय को पाँच लैपटॉप प्रदान किए। उन्होंने विद्यालय निदेशक राजीव तुली, सुनील तुली और सिद्धार्थ तुली की नेतृत्व क्षमता और दूरदर्शिता की सराहना करते हुए कहा कि इन्होंने मूल्य, अनुशासन और तकनीकी संसाधनों के साथ शैक्षणिक उत्कृष्टता को बढ़ावा दिया है। समारोह में डॉ. दीपक अग्रवाल (मुख्य गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट एवं एमडी, ग्लोब मेडिकेयर), डॉ. नारायण प्रसाद (प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, नेफ्रोलॉजी, SGPGIMS) और डॉ. रेनू सिंह (प्रोफेसर, प्रसूति एवं स्त्री रोग, KGMU) आदि गणमान्य शामिल रहे।