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लखनऊ के विकास को नई रफ्तार: सीएम योगी ने सरोजनीनगर से किया ₹12,000 करोड़ की दो आवासीय परियोजनाओं का शुभारंभ ; कार्यक्रम में विधायक डॉ राजेश्वर सिंह ने कहा-वरुण विहार और नैमिष नगर से सुनियोजित शहरी लविस्तार को मिलेगी गति, रोजगार के नए अवसरों का भी होगा विस्तार

लखनऊ | 24 सितंबर 2026। सरोजनीनगर की धरती से राजधानी लखनऊ के सुनियोजित एवं आधुनिक विस्तार की दिशा में गुरुवार को एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ विकास प्राधिकरण की महत्वाकांक्षी वरुण विहार और नैमिष नगर आवासीय योजनाओं का शुभारंभ किया। दोनों टाउनशिप परियोजनाओं के लिए लगभग ₹12,000 करोड़ के निवेश का प्रावधान बताया गया है। इसके साथ ही पांच बहुमंजिला आवासीय परियोजनाओं का भी शिलान्यास किया गया।

इस अवसर पर सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रति सरोजनीनगर की जनता की ओर से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इन परियोजनाओं से लखनऊ के आवासीय विस्तार, आधुनिक शहरी सुविधाओं, कनेक्टिविटी और आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलने की संभावना है।

उन्होंने कहा कि वरुण विहार और नैमिष नगर केवल आवासीय योजनाएं नहीं, बल्कि लखनऊ के भविष्य के सुनियोजित विस्तार की आधारशिला हैं।

वरुण विहार और नैमिष नगर से बदलेगा लखनऊ का आवासीय विस्तार

वरुण विहार योजना आगरा एक्सप्रेसवे के निकट और नैमिष नगर योजना आईआईएम रोड एवं सीतापुर रोड क्षेत्र में विकसित की जा रही है। उपलब्ध विवरण के अनुसार दोनों योजनाओं के पहले चरण में हजारों आवासीय भूखंडों के लिए पंजीकरण शुरू किया गया है।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि इन योजनाओं के विकसित होने से विभिन्न आय वर्गों के लोगों के लिए आवासीय अवसर बढ़ेंगे तथा शहर के विस्तार को अधिक व्यवस्थित स्वरूप देने में मदद मिलेगी।

उन्होंने कहा कि आधुनिक आवासीय सुविधाओं के साथ सड़क, कनेक्टिविटी, सार्वजनिक सुविधाओं और अन्य शहरी आधारभूत ढांचे का विकास राजधानी के आगामी विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

लखनऊ को State Capital Region के रूप में विकसित करने की दिशा में कदम

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ के विकास को महानगर और जनपद की सीमाओं से आगे बढ़ाते हुए State Capital Region (SCR) के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

डॉ. सिंह ने कहा कि लखनऊ के साथ आसपास के जिलों को बेहतर कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय विकास से जोड़ने की सोच राजधानी के दीर्घकालिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। नैमिषारण्य जैसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्रों को बेहतर संपर्क मार्गों से जोड़ने की योजनाएं पर्यटन और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

उन्होंने मुख्यमंत्री द्वारा भूमि अधिग्रहण एवं मुआवजा प्रक्रिया में पारदर्शिता पर दिए गए जोर का भी उल्लेख किया। डॉ. सिंह के अनुसार, किसानों और एलडीए के बीच किसी मध्यस्थ के बजाय भूमि स्वामियों से सीधे संवाद तथा पात्र लाभार्थियों को सीधे बैंक खातों में मुआवजा देने की व्यवस्था से प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का प्रयास होगा।

सरोजनीनगर बन रहा शिक्षा और रोजगार का नया केंद्र

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि सरोजनीनगर में विकास का दायरा केवल आवासीय परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। क्षेत्र में शिक्षा, औद्योगिक गतिविधियों, परिवहन, तकनीक और आधुनिक बुनियादी ढांचे से जुड़े अनेक प्रोजेक्ट आकार ले रहे हैं।

उन्होंने कहा कि एयरपोर्ट, अनंत नगर, एआई सिटी, एयरोसिटी और औद्योगिक परियोजनाओं के विस्तार के साथ सरोजनीनगर में आर्थिक गतिविधियों और रोजगार के नए अवसरों की संभावनाएं बढ़ रही हैं।

उन्होंने विशेष रूप से अशोक लेलैंड की लखनऊ स्थित ग्रीन मोबिलिटी फैक्ट्री का उल्लेख किया। कंपनी के अनुसार यह संयंत्र सरोजनीनगर इंडस्ट्रियल क्षेत्र में लखनऊ एयरपोर्ट के पास 70 एकड़ में स्थापित किया गया है और इसे स्वच्छ परिवहन पर केंद्रित किया गया है।

डॉ. सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों की मौजूदगी के कारण भी सरोजनीनगर की पहचान तेजी से शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हो रही है।

कानून-व्यवस्था और विकास को बताया एक-दूसरे का पूरक

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि किसी भी शहर के सतत विकास के लिए मजबूत कानून-व्यवस्था, सुरक्षित वातावरण और बेहतर आधारभूत ढांचा आवश्यक है।

उन्होंने प्रदेश में अपराध के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार मार्च 2017 से नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश पुलिस ने 17,043 मुठभेड़ अभियान किए, जिनमें 34,253 अपराधियों की गिरफ्तारी और 289 अपराधियों के मारे जाने की जानकारी दी गई है।

डॉ. सिंह ने कहा कि कानून-व्यवस्था के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक, उद्योग और कनेक्टिविटी में निवेश होने से प्रदेश में विकास के लिए अनुकूल आधार तैयार होता है।

विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण भी प्राथमिकता

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि आधुनिक शहर का निर्माण केवल ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों से नहीं होता, बल्कि स्वच्छ हवा, हरित क्षेत्र और बेहतर जीवन गुणवत्ता भी शहरी विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

कार्यक्रम के अवसर पर वृक्षारोपण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि लखनऊ के विकास को हरित एवं स्वच्छ शहर के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ाना आवश्यक है। उनका कहना था कि आधुनिक आधारभूत संरचना के साथ पर्यावरण संरक्षण को समान महत्व दिया जाना चाहिए।

किसानों के हितों और पारदर्शी मुआवजे पर जोर

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि किसी भी बड़ी विकास परियोजना की सफलता केवल उसके निर्माण से नहीं, बल्कि उससे प्रभावित होने वाले परिवारों के हितों की सुरक्षा से भी जुड़ी होती है।

उन्होंने कहा कि जिन परिवारों की भूमि विकास परियोजनाओं से जुड़ती है, उनके हितों को प्राथमिकता देना जरूरी है। मुख्यमंत्री द्वारा मुआवजा प्रक्रिया में पारदर्शिता और पात्र भूमि स्वामियों को सीधे भुगतान किए जाने की बात इस दिशा में महत्वपूर्ण है।

सरोजनीनगर की जनता की ओर से मुख्यमंत्री का आभार

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि सरोजनीनगर की धरती से शुरू हुई ये परियोजनाएं लखनऊ के भविष्य के विकास को नई दिशा देने वाली हैं।

उन्होंने कहा—

“माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व और मार्गदर्शन में लखनऊ तथा सरोजनीनगर विकास, रोजगार, आधुनिकता और बेहतर नागरिक सुविधाओं के नए चरण में आगे बढ़ रहे हैं। सरोजनीनगर की जनता की ओर से इन महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लिए मैं मुख्यमंत्री जी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं।”

उन्होंने कहा कि वरुण विहार और नैमिष नगर के साथ लखनऊ के आवासीय विस्तार, बेहतर कनेक्टिविटी, औद्योगिक निवेश, शिक्षा, रोजगार और आधुनिक शहरी सुविधाओं का विस्तार राजधानी के विकास को नई गति देगा।

कार्यक्रम में ये रहे उपस्थित

कार्यक्रम में लखनऊ की महापौर श्रीमती सुषमा खर्कवाल, राज्यसभा सांसद श्री संजय सेठ, विधान परिषद सदस्य डॉ. महेंद्र कुमार सिंह, श्री मुकेश शर्मा, डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल, श्री रामचंद्र प्रधान, श्री पवन कुमार सिंह, विधायक श्री योगेश शुक्ल, डॉ. नीरज बोरा, श्री ओ.पी. श्रीवास्तव, श्रीमती जय देवी, श्री अमरेश कुमार, भाजपा महानगर अध्यक्ष श्री आनंद द्विवेदी, जिला अध्यक्ष श्री विजय कुमार मौर्य, प्रमुख सचिव आवास एवं शहरी नियोजन श्री पी. गुरुप्रसाद, एलडीए उपाध्यक्ष श्री प्रथमेश कुमार, सचिव आवास श्री अनिल ढींगरा, मंडलायुक्त श्री विजय विश्वास पंत, लखनऊ विकास प्राधिकरण बोर्ड के सदस्य श्री पुष्कर शुक्ला एवं श्री पी.एन. सिंह सहित अन्य जनप्रतिनिधि एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे।

मुख्य बिंदु

  • ₹12,000 करोड़ की वरुण विहार और नैमिष नगर टाउनशिप परियोजनाओं का शुभारंभ।
  • लखनऊ के सुनियोजित आवासीय विस्तार को मिलेगी गति।
  • विभिन्न आय वर्गों के लिए आवासीय अवसरों का विस्तार।
  • लखनऊ को व्यापक State Capital Region के रूप में विकसित करने की दिशा में जोर।
  • सरोजनीनगर में एयरपोर्ट, एआई, एयरोसिटी और औद्योगिक परियोजनाओं से विकास की संभावनाएं।
  • अशोक लेलैंड की ग्रीन मोबिलिटी फैक्ट्री सरोजनीनगर के औद्योगिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण परियोजना।
  • विकास परियोजनाओं में किसानों के मुआवजे की पारदर्शी प्रक्रिया पर जोर।
  • आवासीय एवं शहरी विकास के साथ हरित और स्वच्छ लखनऊ के लक्ष्य पर बल।
  • सरोजनीनगर की जनता की ओर से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रति डॉ. राजेश्वर सिंह ने व्यक्त किया आभार।

पत्रकारों के सामाजिक सुरक्षा कवच के लिए सरोजनी नगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने सीएम योगी से की महत्वपूर्ण मांग: प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकारों के लिए नियमित पेंशन और दिवंगत पत्रकारों की विधवाओं को न्यूनतम ₹25 हजार मासिक सहायता की मांग, विधायक ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजा पत्र

लखनऊ। जनहित की खबरों को समाज के सामने लाने, शासन-प्रशासन से सवाल पूछने और आम नागरिकों की आवाज को जिम्मेदार मंच तक पहुंचाने वाले पत्रकारों के सामाजिक और आर्थिक भविष्य को लेकर सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अनुस्मारक पत्र भेजकर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकारों तथा सेवाकाल के दौरान दिवंगत होने वाले पत्रकारों के आश्रित परिवारों के लिए पेंशन योजना शुरू करने का अनुरोध किया है।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने पत्र में निर्धारित पात्रता पूरी करने वाले 60 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ पत्रकारों के लिए नियमित मासिक पेंशन की व्यवस्था किए जाने का आग्रह किया है। साथ ही सेवाकाल के दौरान पत्रकार की असामयिक मृत्यु होने की स्थिति में उसकी विधवा अथवा पात्र आश्रित परिवार को न्यूनतम ₹25,000 प्रतिमाह पारिवारिक पेंशन दिए जाने की मांग की है। उन्होंने यह सहायता कम से कम पांच वर्ष तक और परिस्थितियों एवं आवश्यकता के अनुसार पांच से दस वर्ष तक जारी रखने का सुझाव दिया है।

पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, सार्वजनिक जिम्मेदारी भी

पत्रकार का जीवन अक्सर समाचारों की सुर्खियों में दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे छिपे व्यक्तिगत संघर्ष को बहुत कम लोग देख पाते हैं। एक पत्रकार के लिए खबर केवल कार्यालय की डेस्क पर तैयार होने वाली सामग्री नहीं होती। कई बार उसे देर रात तक घटनास्थल पर रहना पड़ता है, दुर्घटनाओं और अपराध की घटनाओं के बीच पहुंचना पड़ता है, प्राकृतिक आपदाओं में रिपोर्टिंग करनी पड़ती है और लगातार बदलती परिस्थितियों के बीच तथ्य जुटाने पड़ते हैं।

स्थानीय और जिला स्तर पर काम करने वाले अनेक पत्रकार सीमित संसाधनों में अपना काम करते हैं। अनियमित आय, परिवार की जिम्मेदारियां, बच्चों की शिक्षा, मकान का किराया, स्वास्थ्य संबंधी खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच पत्रकारिता की जिम्मेदारी निभाना उनके लिए लगातार चुनौती बना रहता है।

सबसे कठिन स्थिति तब सामने आती है जब कोई पत्रकार असमय दुनिया छोड़ देता है। जिस व्यक्ति की पूरी जिंदगी समाज की समस्याओं को सामने लाने और दूसरों की आवाज बनने में गुजर जाती है, उसके जाने के बाद उसके अपने परिवार के सामने आर्थिक सुरक्षा का सवाल खड़ा हो सकता है। बच्चों की पढ़ाई, परिवार का भरण-पोषण, इलाज और भविष्य की योजनाएं अचानक अनिश्चितता में आ जाती हैं।

इसी मानवीय पक्ष को ध्यान में रखते हुए डॉ. राजेश्वर सिंह ने पत्रकारों और उनके परिवारों के लिए संस्थागत सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया है।

मुख्यमंत्री के प्रति जताया आभार

डॉ. सिंह ने पत्रकारों के कल्याण से जुड़े विषयों के साथ-साथ अधिवक्ताओं को गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने तथा संकटग्रस्त पत्रकार परिवारों के लिए पत्रकार कल्याण कोष को सुदृढ़ किए जाने जैसे प्रयासों के लिए मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं को समझते हुए कल्याणकारी व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक है। पत्रकार समुदाय भी समाज के महत्वपूर्ण वर्गों में शामिल है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में सूचना और जनहित से जुड़े मुद्दों को सामने लाने की भूमिका निभाता है।

दिवंगत पत्रकारों के परिवारों से मिले, बच्चों की शिक्षा के लिए की सहायता

पत्रकारों के परिवारों की वास्तविक परिस्थितियों को समझने के लिए डॉ. राजेश्वर सिंह द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर किए गए प्रयासों का भी उल्लेख उनके पत्र में किया गया है।

उन्होंने लखनऊ के दिवंगत पत्रकारों स्वर्गीय विधि सिंह, स्वर्गीय मोहम्मद इरफान और स्वर्गीय नीरज श्रीवास्तव के परिवारों से मुलाकात कर शोक संवेदना व्यक्त की। इस दौरान बच्चों की शिक्षा में सहयोग के उद्देश्य से सीएसआर के माध्यम से प्रत्येक परिवार को ₹1 लाख की सहायता प्रदान की गई।

डॉ. सिंह ने कहा- “यह छोटी-सी सहायता किसी प्रियजन की अपूरणीय क्षति की भरपाई नहीं कर सकती, लेकिन यह संदेश अवश्य देती है कि दुःख की घड़ी में हम परिवार के साथ खड़े हैं।”

यह पहल इस व्यापक सवाल को भी सामने लाती है कि व्यक्तिगत स्तर पर मिलने वाली सहायता के साथ-साथ ऐसी परिस्थितियों के लिए एक स्थायी और संस्थागत व्यवस्था क्यों न हो, जिससे किसी पत्रकार की असामयिक मृत्यु के बाद उसके परिवार को आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े।

50 वर्ष से कम आयु में दिवंगत पत्रकारों का तैयार हो प्रामाणिक रिकॉर्ड

डॉ. राजेश्वर सिंह ने मुख्यमंत्री से प्रदेश में विशेष रूप से 50 वर्ष से कम आयु में दिवंगत होने वाले पत्रकारों का जिला-वार और आयु-वार प्रामाणिक अभिलेख तैयार कराने का भी अनुरोध किया है।

ऐसा रिकॉर्ड तैयार होने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग जिलों में कितने पत्रकार कम आयु में असमय दिवंगत हुए और उनके पीछे किस प्रकार की पारिवारिक परिस्थितियां रह गईं। इसके आधार पर भविष्य में पत्रकार कल्याण से जुड़ी योजनाओं के लिए अधिक व्यवस्थित नीति तैयार की जा सकती है।

उन्होंने पत्रकार पेंशन और पारिवारिक सहायता के लिए सरल, पारदर्शी और ऑनलाइन आवेदन एवं सत्यापन व्यवस्था विकसित करने का सुझाव भी दिया है, ताकि पात्र पत्रकारों और उनके परिवारों को सरकारी कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें तथा योजना का लाभ स्पष्ट पात्रता मानकों के आधार पर मिल सके।

उम्र बढ़ने के साथ बढ़ती हैं पत्रकारों की आर्थिक चुनौतियां

पत्रकारिता के क्षेत्र में लंबे समय तक काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकारों के सामने उम्र बढ़ने के साथ कई नई चुनौतियां आती हैं। रिपोर्टिंग की सक्रियता कम होने के बाद नियमित आय के अवसर भी सीमित हो सकते हैं। दूसरी ओर स्वास्थ्य संबंधी खर्च और पारिवारिक जिम्मेदारियां बनी रहती हैं।

ऐसे में पेंशन जैसी व्यवस्था उन पत्रकारों के लिए सामाजिक सुरक्षा का आधार बन सकती है, जिन्होंने दशकों तक पत्रकारिता के माध्यम से समाज और जनहित से जुड़े विषयों को सामने रखा है।

इसी तरह युवा या मध्यम आयु में पत्रकार की मृत्यु होने पर परिवार की आर्थिक स्थिति अचानक प्रभावित हो सकती है। यदि मृतक पत्रकार परिवार का प्रमुख आय अर्जक था, तो बच्चों की शिक्षा और परिवार के दैनिक खर्च से लेकर भविष्य की आवश्यकताओं तक पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।

पत्रकारों के परिवारों की सुरक्षा से जुड़ा है व्यापक सामाजिक सरोकार

डॉ. राजेश्वर सिंह की मांग केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। इसके पीछे पत्रकार और उसके परिवार के भविष्य की सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न भी जुड़ा है।

एक पत्रकार जब किसी गरीब परिवार की समस्या, किसी दुर्घटना के पीड़ित की आवाज, किसी सरकारी योजना की जमीनी स्थिति या किसी सार्वजनिक समस्या को सामने लाता है, तो वह अपने पेशे के माध्यम से समाज के व्यापक हित में योगदान देता है। लेकिन उसके अपने परिवार की आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न अक्सर उतनी प्रमुखता से सामने नहीं आ पाता।

ऐसे में पत्रकार कल्याण की स्थायी व्यवस्था में वरिष्ठ पत्रकारों के लिए पेंशन और दिवंगत पत्रकारों के आश्रित परिवारों के लिए पारिवारिक पेंशन जैसे प्रावधानों पर विचार किया जाना पत्रकार समुदाय के लिए महत्वपूर्ण विषय हो सकता है।

मुख्यमंत्री से संवेदनशील और स्थायी व्यवस्था की उम्मीद

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा- “जीवनभर जनहित को आवाज देने वाले पत्रकार और उनके परिवार संकट के समय अकेले नहीं रहने चाहिए। मुझे विश्वास है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के संवेदनशील नेतृत्व में पत्रकार समुदाय को एक मजबूत और ऐतिहासिक सामाजिक सुरक्षा कवच प्राप्त होगा।”

अब इस मांग का केंद्रबिंदु यह है कि पत्रकार कल्याण से जुड़ी मौजूदा व्यवस्थाओं के साथ-साथ क्या प्रदेश में ऐसी दीर्घकालिक नीति तैयार की जा सकती है, जो वरिष्ठ पत्रकारों की आर्थिक सुरक्षा और असामयिक मृत्यु की स्थिति में उनके परिवारों के भविष्य को भी सुरक्षित करने में मदद करे।

पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्षों तक काम करने वाले लोगों के लिए यह विषय केवल पेंशन का नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और परिवार के भविष्य का प्रश्न भी है। मुख्यमंत्री के स्तर पर इस प्रस्ताव पर विचार होने की स्थिति में पात्रता, आर्थिक प्रावधान, सत्यापन प्रक्रिया और सहायता की अवधि जैसे पहलुओं को स्पष्ट करते हुए एक व्यवस्थित नीति का खाका तैयार किया जा सकता है।

डॉ. राजेश्वर सिंह की पहल ने प्रदेश में पत्रकार कल्याण और पत्रकारों के सामाजिक सुरक्षा कवच को लेकर एक महत्वपूर्ण विमर्श को सामने रखा है।

लखनऊ में ई-व्हीकल खरीदने के बाद चार्जर खराब होने से उठे सवाल, उपभोक्ता ने hero कम्पनी पर लगाए गंभीर आरोप : ₹1.50 लाख में खरीदी EV बाइक, एक सप्ताह में चार्जर खराब; रिप्लेसमेंट के नाम पर 15 दिन इंतजार के बाद मिला दूसरा चार्जर भी निकला खराब

लखनऊ। देश में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने और पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने की दिशा में सरकार लगातार प्रयास कर रही है। प्रदूषण कम करने और स्वच्छ परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को लेकर लोगों में भी तेजी से रुचि बढ़ी है। लेकिन इसी बीच लखनऊ में एक इलेक्ट्रिक बाइक की खरीद से जुड़ा मामला सामने आया है, जिसने ईवी ग्राहकों को मिलने वाली बिक्री के बाद की सेवाओं और चार्जिंग व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

लखनऊ निवासी उपभोक्ता और पेशे से अधिवक्ता ईशांत प्रताप सिंह सेंगर ने आरोप लगाया है कि उन्होंने 14 अगस्त को इंदिरा नगर स्थित सन मोटर्स के शोरूम से लगभग ₹1.50 लाख की इलेक्ट्रिक बाइक खरीदी थी, जिस पर Hero और Vida की संयुक्त ब्रांडिंग की गई थी। ईशांत के मुताबिक वाहन खरीदने के महज एक सप्ताह के भीतर ही उसका चार्जर खराब हो गया।

चार्जर खराब हुआ तो 15 दिन का समय बताया गया

कस्टमर ईशांत का आरोप है कि चार्जर में खराबी आने के बाद उन्होंने शोरूम और संबंधित लोगों से संपर्क किया। उन्हें चार्जर बदलने के लिए करीब 15 दिन का समय दिया गया। उनका कहना है कि निर्धारित समय के बाद जब उन्हें दूसरा चार्जर उपलब्ध कराया गया और उन्होंने उसे इस्तेमाल किया तो वह भी ठीक से काम नहीं कर रहा था।

मामले को लेकर ईशान ने सवाल उठाया कि यदि किसी ग्राहक से करीब डेढ़ लाख रुपये की इलेक्ट्रिक बाइक खरीदवाई जाती है तो उसके साथ दी जाने वाली मूलभूत चार्जिंग सुविधा और आफ्टर-सेल्स सर्विस इतनी कमजोर क्यों है?

पेड चार्जिंग मेंबरशिप को लेकर भी उठाया सवाल

ईशांत प्रताप सिंह सेंगर ने आरोप लगाया कि चार्जर से जुड़ी समस्या के दौरान उन्हें शोरूम की ओर से पेड चार्जिंग मेंबरशिप लेने की बात बताई गई। ईशान का दावा है कि उन्हें ऐसा लगा कि चार्जर संबंधी समस्या के समाधान के बजाय उन्हें शोरूम की सशुल्क चार्जिंग सुविधा लेने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

हालांकि, इस पूरे आरोप पर संबंधित शोरूम अथवा कंपनी का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है। ऐसे में आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

ईवी के नाम पर ग्राहक सेवा पर सवाल

इस मामले ने इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री के साथ-साथ उनकी आफ्टर-सेल्स सर्विस, वारंटी, चार्जर रिप्लेसमेंट और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

ईवी खरीदने वाले ग्राहक के लिए चार्जर वाहन का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि वाहन खरीदने के कुछ ही दिनों बाद चार्जर खराब हो जाए और उसके रिप्लेसमेंट में लंबा समय लगे, तो ग्राहक के सामने वाहन के इस्तेमाल का संकट पैदा होना स्वाभाविक है।

ईशांत का कहना है कि उन्होंने इस मामले को इसलिए सार्वजनिक करने का निर्णय लिया, ताकि अन्य ग्राहक इलेक्ट्रिक वाहन खरीदते समय केवल वाहन की कीमत और फीचर्स ही नहीं, बल्कि वारंटी, चार्जर की गारंटी, रिप्लेसमेंट प्रक्रिया, सर्विस नेटवर्क और पेड चार्जिंग की शर्तों की भी पूरी जानकारी लें।

सरकार की ईवी नीति के बीच उठी व्यवस्था पर बहस

केंद्र और राज्य सरकारें इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने, प्रदूषण कम करने और स्वच्छ परिवहन व्यवस्था विकसित करने पर जोर दे रही हैं। ऐसे में ईवी बाजार में ग्राहकों का भरोसा बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।

यदि किसी ग्राहक को वाहन खरीदने के बाद चार्जिंग अथवा सर्विस से जुड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है, तो इसका सीधा असर इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रति उपभोक्ताओं के विश्वास पर पड़ सकता है।

हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि किसी एक ग्राहक के मामले के आधार पर पूरे इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग या किसी कंपनी की व्यवस्था पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इस मामले में संबंधित कंपनी और शोरूम का पक्ष सामने आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।

वीडियो सामने आने के बाद कार्रवाई का इंतजार

ईशांत प्रताप सिंह सेंगर ने मामले को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए संबंधित संस्थान की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अब देखना यह होगा कि मामले से जुड़ा वीडियो और शिकायत सामने आने के बाद संबंधित कंपनी, शोरूम अथवा उपभोक्ता संरक्षण से जुड़े अधिकारी इस मामले में क्या संज्ञान लेते हैं।

फिलहाल यह मामला ई-व्हीकल खरीदने वाले ग्राहकों के अधिकार, चार्जर की वारंटी, आफ्टर-सेल्स सर्विस और पेड चार्जिंग व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा करता है- क्या ग्राहक को इलेक्ट्रिक वाहन खरीदते समय मिलने वाली सुविधाओं और बाद की सेवाओं की शर्तें पर्याप्त रूप से स्पष्ट की जा रही हैं?

सरोजनी नगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने केंद्रीय विधि मंत्री से ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ लाने का किया आग्रह : उन्होंने कहा – जहां क्षति हुई है, वहां समाधान का अधिकार भी होना चाहिए

लखनऊ। उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ की सरोजनी नगर विधानसभा से भाजपा विधायक सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र लिखकर भारत में एक व्यापक ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ लाने का आग्रह किया है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य लापरवाही अथवा अन्य नागरिक क्षति से प्रभावित लोगों को समयबद्ध, प्रभावी और उचित क्षतिपूर्ति उपलब्ध कराने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था तैयार करना है।

डॉ. राजेश्वर सिंह का कहना है कि भारत ने हाल के वर्षों में आपराधिक न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। अब नागरिक क्षति और उसके मुआवजे से जुड़े कानूनों को भी आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप व्यवस्थित करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा, “भारत ने दंड देने वाले कानून को आधुनिक बनाया है। अब समय है कि क्षति की भरपाई करने वाले कानून को भी आधुनिक बनाया जाए।”

नए आपराधिक कानूनों के बाद नागरिक क्षतिपूर्ति कानून में सुधार की जरूरत

डॉ. सिंह ने अपने पत्र में कहा है कि औपनिवेशिक दौर के आपराधिक कानूनों के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) लागू किए जाने के बाद अब नागरिकों को होने वाली क्षति और उसकी भरपाई से संबंधित कानूनी ढांचे पर भी व्यापक विचार किया जाना चाहिए।

उनके अनुसार, किसी दोषी को दंडित करना न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन जिस व्यक्ति को नुकसान हुआ है, उसके जीवन और अधिकारों की यथासंभव पुनर्स्थापना भी न्याय का महत्वपूर्ण पक्ष है।

सात दशकों से व्यापक कानून की आवश्यकता

डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने पत्र में भारत में सिविल रॉन्ग्स और क्षतिपूर्ति से जुड़े व्यापक कानून के इतिहास का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार, प्रथम विधि आयोग ने वर्ष 1956 में अपनी पहली रिपोर्ट में राज्य के दायित्व से संबंधित कानून बनाए जाने की सिफारिश की थी।

इसके बाद 1965 और 1967 में इस दिशा में विधेयक भी सामने आए, लेकिन वे कानून का रूप नहीं ले सके। परिणामस्वरूप आज भी भारत में नागरिक क्षति से संबंधित विभिन्न मामलों के लिए अलग-अलग कानूनी प्रावधानों और न्यायिक सिद्धांतों पर निर्भरता बनी हुई है।

डॉ. सिंह ने विशेष रूप से गलत तरीके से हुई मृत्यु से संबंधित दावों के लिए Fatal Accidents Act, 1855 के अस्तित्व का उल्लेख करते हुए नागरिक क्षतिपूर्ति कानून को आधुनिक बनाने की आवश्यकता बताई है।

सड़क दुर्घटनाओं से लेकर डेटा ब्रीच तक के मामलों को शामिल करने का प्रस्ताव

प्रस्तावित ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ के दायरे में आधुनिक समय में सामने आने वाली विभिन्न प्रकार की नागरिक क्षतियों को शामिल किया जा सकता है।

डॉ. सिंह ने चिकित्सा लापरवाही, खराब सड़क या भवन निर्माण, औद्योगिक दुर्घटनाओं, डीपफेक, डेटा ब्रीच, साइबर क्षति तथा पुलिस की ज्यादती जैसे मामलों के लिए स्पष्ट क्षतिपूर्ति व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया है।

भारत में सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा इस समस्या की गंभीरता को रेखांकित करता है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की Road Accidents in India–2023 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में देश में 4,80,583 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 1,72,890 लोगों की मौत हुई और 4,62,825 लोग घायल हुए।

ऐसे मामलों में जहां दुर्घटना के पीछे किसी सार्वजनिक एजेंसी, ठेकेदार अथवा अन्य संस्था की लापरवाही का आरोप हो, पीड़ितों के लिए जवाबदेही और क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है।

आम नागरिक को पांच सवालों का स्पष्ट जवाब देने वाली व्यवस्था

डॉ. राजेश्वर सिंह ने प्रस्तावित संहिता के माध्यम से आम नागरिक के लिए क्षतिपूर्ति प्रक्रिया को सरल और स्पष्ट बनाने की बात कही है।

उनके अनुसार कानून में कम से कम इन पांच सवालों का स्पष्ट उत्तर होना चाहिए-

  • किसके विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा किया जा सकता है?
  • दावा किस प्राधिकरण या न्यायिक मंच के समक्ष किया जाएगा?
  • दावा कितने समय के भीतर दाखिल करना होगा?
  • कितनी क्षतिपूर्ति का दावा किया जा सकता है?
  • अंतिम निर्णय आने तक अंतरिम राहत की क्या व्यवस्था होगी?

इससे नागरिकों को अपनी क्षति के मामले में उपलब्ध कानूनी उपायों की स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी और क्षतिपूर्ति प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित किया जा सकेगा।

प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ाने पर जोर

डॉ. सिंह ने सरकारी विभागों और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़े प्रावधानों पर भी जोर दिया है। प्रस्ताव के अनुसार, संबंधित विभागों को नागरिकों द्वारा किए गए क्षतिपूर्ति दावों पर निर्धारित समयसीमा में जवाब देना अनिवार्य किया जा सकता है।

साथ ही, ईमानदारी और सद्भावना से लिए गए प्रशासनिक निर्णयों के लिए अधिकारियों को आवश्यक संरक्षण दिया जा सकता है, जबकि दुर्भावना या घोर लापरवाही साबित होने की स्थिति में संबंधित अधिकारी से क्षतिपूर्ति की वसूली जैसे प्रावधानों पर विचार किया जा सकता है।

इस संदर्भ में डॉ. सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के LDA v. M.K. Gupta मामले में स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख किया है। सुप्रीम कोर्ट के बाद के निर्णयों में भी इस मामले को सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा अनुचित तरीके से अधिकारों को प्रभावित किए जाने पर क्षतिपूर्ति के सिद्धांत के संदर्भ में उद्धृत किया गया है।

दावों का वार्षिक डेटा सार्वजनिक करने का सुझाव

प्रस्ताव में सरकारी विभागों और संबंधित संस्थाओं द्वारा प्राप्त क्षतिपूर्ति दावों का वार्षिक डेटा प्रकाशित करने की व्यवस्था पर भी विचार करने का सुझाव दिया गया है।

इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किन विभागों या क्षेत्रों में बार-बार एक जैसी शिकायतें और नागरिक क्षति के मामले सामने आ रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर प्रशासनिक कमियों की पहचान कर उनमें सुधार किया जा सकता है।

झूठे दावों से सुरक्षा और मध्यस्थता की व्यवस्था

डॉ. राजेश्वर सिंह ने प्रस्तावित कानून में नागरिकों के अधिकारों के साथ-साथ संस्थाओं और अधिकारियों के लिए आवश्यक सुरक्षा उपायों की जरूरत भी बताई है।

प्रस्ताव में झूठे एवं निराधार दावों के विरुद्ध सुरक्षा, सद्भावना से लिए गए निर्णयों का संरक्षण, किफायती ऑनलाइन विवाद समाधान व्यवस्था तथा मुकदमेबाजी से पहले मध्यस्थता जैसे प्रावधानों पर विचार करने की बात कही गई है।

इससे एक ओर वास्तविक पीड़ितों को समयबद्ध राहत देने का प्रयास किया जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर कानून के दुरुपयोग की संभावनाओं को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा व्यवस्था भी बनाई जा सकती है।

भारतीय विधि आयोग से समयबद्ध रिपोर्ट की मांग

डॉ. राजेश्वर सिंह ने केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री से इस महत्वपूर्ण विषय को भारतीय विधि आयोग के समक्ष भेजने और समयबद्ध रिपोर्ट प्राप्त करने का आग्रह किया है।

उन्होंने इसके बाद विशेषज्ञों की समिति गठित कर कानूनी विशेषज्ञों, न्यायविदों, प्रशासनिक अधिकारियों, उद्योग जगत, नागरिक संगठनों और आम नागरिकों के साथ व्यापक राष्ट्रव्यापी परामर्श की प्रक्रिया शुरू करने का सुझाव दिया है।

“क्षतिपूर्ति भी न्याय का हिस्सा है”

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल दोषी को दंडित करना नहीं होना चाहिए, बल्कि जिस व्यक्ति को नुकसान हुआ है, उसके अधिकारों और जीवन की यथासंभव पुनर्स्थापना भी न्याय का हिस्सा है।

उन्होंने कहा, “जहां क्षति हुई है, वहां न्याय का अर्थ केवल निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि पीड़ित को यथासंभव पुनर्स्थापित करना भी होना चाहिए।”

प्रस्तावित ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ के माध्यम से नागरिक क्षति, जवाबदेही और मुआवजे से जुड़े प्रावधानों को एक व्यापक कानूनी ढांचे में लाने की दिशा में पहल का सुझाव दिया गया है।

‘नेट जीरो सरोजनीनगर’ की दिशा में बढ़ा बड़ा कदम : 60 मेगावाट से अधिक सौर ऊर्जा, 3,000+ सोलर स्ट्रीट लाइटें और 7 EV चार्जिंग स्टेशन ; 8 सामुदायिक सौर ऊर्जा संयंत्र, 5 सोलर ट्री और 3 तालाबों के विकास से स्वच्छ ऊर्जा, जल संरक्षण और हरित विकास को मिल रहा बढ़ावा

लखनऊ : सरोजनीनगर विधानसभा क्षेत्र को सुरक्षित, प्रकाशमान, ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में ‘नेट जीरो सरोजनीनगर’ की परिकल्पना को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है। इस पहल के तहत स्वच्छ एवं अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, कार्बन उत्सर्जन में कमी, जल संरक्षण, हरित क्षेत्र और जनभागीदारी को एक साथ जोड़ते हुए सतत विकास की दिशा में विभिन्न प्रयास किए जा रहे हैं।

सरोजनीनगर के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह के अनुसार, ‘नेट जीरो सरोजनीनगर’ केवल पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा अभियान नहीं, बल्कि क्षेत्र के भविष्य के लिए दीर्घकालिक विकास दृष्टि है। उनका कहना है कि विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण को समान प्राथमिकता देते हुए स्वच्छ ऊर्जा को स्थानीय विकास का अभिन्न हिस्सा बनाया जा रहा है।

60 मेगावाट से अधिक सौर ऊर्जा क्षमता का विस्तार

सरोजनीनगर में 60 मेगावाट से अधिक सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता विकसित की जा चुकी है। इसके साथ ही ₹1.64 करोड़ की लागत से 8 RWA में सामुदायिक सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किए गए हैं। इन संयंत्रों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने के साथ ऊर्जा के वैकल्पिक और स्वच्छ स्रोतों को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त ₹25.18 लाख की लागत से जोनल पार्क में सोलर पावर प्लांट स्थापित किया गया है। सार्वजनिक स्थलों पर सौर ऊर्जा के उपयोग की दिशा में इसे महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।

क्षेत्र में 3,000 से अधिक सौर स्ट्रीट लाइट और 200 से अधिक सौर स्ट्रीट मास्ट भी लगाए गए हैं। इनके माध्यम से गलियों, संपर्क मार्गों, ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य आवश्यक सार्वजनिक स्थलों पर प्रकाश व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा, “जहाँ अंधेरा है, वहाँ प्रकाश पहुँचे; जहाँ बिजली पर निर्भरता है, वहाँ सौर ऊर्जा विकल्प बने- यही सुरक्षित, सुगम और नेट जीरो सरोजनीनगर की दिशा में हमारा प्रयास है।”

सोलर ट्री और EV चार्जिंग स्टेशन से स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा

‘नेट जीरो सरोजनीनगर’ की दिशा में सौर ऊर्जा आधारित ढांचे के विस्तार के साथ पर्यावरण-अनुकूल परिवहन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। क्षेत्र में 5 सोलर ट्री और 7 EV चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए गए हैं।

सौर ऊर्जा आधारित प्रकाश व्यवस्था से पारंपरिक बिजली पर निर्भरता कम करने, ऊर्जा की बचत करने और अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में मदद मिल रही है। वहीं EV चार्जिंग स्टेशन क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

डॉ. सिंह ने कहा कि ऊर्जा संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आने वाले समय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विकास की नई दिशा भी है।

बेहतर रोशनी का सीधा संबंध सार्वजनिक सुरक्षा से

सरोजनीनगर में सौर स्ट्रीट लाइटों के विस्तार को केवल ऊर्जा बचत तक सीमित नहीं रखा गया है। सार्वजनिक स्थानों पर पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था को नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा से भी जोड़ा जा रहा है।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि बेहतर सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था केवल सुविधा नहीं, बल्कि सुरक्षा और सम्मान का आधार भी है। पर्याप्त रोशनी से महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों और देर शाम आवागमन करने वाले लोगों के लिए सार्वजनिक स्थान अधिक सुगम और सुरक्षित बनते हैं।

उनके अनुसार, “विकास का अर्थ केवल बड़ी परियोजनाएँ नहीं हैं। किसी गली का अंधेरा दूर होना, किसी बेटी का सुरक्षित घर पहुँचना, किसी बुजुर्ग के लिए रास्ता सुगम होना और यह सब ऊर्जा की बचत के साथ संभव होना भी विकास है।”

3 तालाबों के विकास से जल संरक्षण को बढ़ावा

‘नेट जीरो सरोजनीनगर’ की परिकल्पना में केवल सौर ऊर्जा ही नहीं, बल्कि जल संरक्षण को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसके तहत ₹9 करोड़ की लागत से 3 तालाबों के विकास के माध्यम से जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।

इसके साथ ही हरित क्षेत्रों के संरक्षण, वृक्षारोपण, वर्षा जल संचयन और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को प्राथमिकता दी जा रही है।

पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से 1,400 पौधों का वितरण भी किया गया है। इसका उद्देश्य पौधरोपण को बढ़ावा देने के साथ नागरिकों को पौधों के संरक्षण और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए प्रेरित करना है।

‘नेट जीरो’ का दायरा सिर्फ पौधरोपण तक सीमित नहीं

डॉ. राजेश्वर सिंह के अनुसार, नेट जीरो का अर्थ केवल अधिक से अधिक पेड़ लगाना नहीं है। इसके अंतर्गत ऊर्जा के उपयोग से होने वाले उत्सर्जन को कम करना, स्वच्छ एवं अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देना, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना और विकास परियोजनाओं को पर्यावरण के अनुकूल बनाना भी शामिल है।

इसी सोच के तहत सरोजनीनगर में सौर ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण, हरित विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

नागरिकों की भागीदारी को भी दिया जा रहा महत्व

डॉ. राजेश्वर सिंह ने नागरिकों से ऊर्जा और जल की बचत करने, एकल-उपयोग प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल करने, कचरे का उचित प्रबंधन करने और लगाए गए पौधों के संरक्षण को अपनी दैनिक जीवनशैली का हिस्सा बनाने की अपील की।

उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार या किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें समाज और प्रत्येक नागरिक की भागीदारी आवश्यक है। सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही किसी क्षेत्र को दीर्घकालिक रूप से स्वच्छ, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल बनाया जा सकता है।

2070 के नेट जीरो लक्ष्य के अनुरूप स्थानीय स्तर पर प्रयास

भारत ने वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसी व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि के अनुरूप सरोजनीनगर में सौर ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण और हरित विकास को बढ़ावा देते हुए ‘नेट जीरो सरोजनीनगर’ की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा, “आज लिया गया पर्यावरणीय संकल्प आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का संकल्प है। हमारा प्रयास है कि नेट जीरो सरोजनीनगर विकास, सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के संतुलन का प्रेरक मॉडल बने।”

सौर ऊर्जा की बढ़ती क्षमता, हजारों सौर स्ट्रीट लाइटों, सामुदायिक सोलर प्लांट, सोलर ट्री, EV चार्जिंग स्टेशन, तालाबों के विकास और पौध वितरण जैसी पहलों के माध्यम से सरोजनीनगर में विकास को पर्यावरण संरक्षण के साथ जोड़ने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। आने वाले समय में इन पहलों के माध्यम से क्षेत्र में ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण और हरित विकास को और गति देने का लक्ष्य रखा गया है।