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किन लोगों को चींटियों से डर लगता है और किस विटामिन की कमी से यह समस्या होती है?

Fear of Ants: कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हें कई चीजों से डर लगता है. जैसे कि कुछ लोगों को छिपकली से, किसी को सांप से, किसी को अन्य चीजों से डर लगता है. लेकिन क्या आपको मालूम है कि कुछ लोगों को चींटियों से भी डर लगता है? सुनने में यह थोड़ा अजीब और फिल्मों की कहानियों जैसा लगता है कि लोगों को चींटियों से डर लगता है, लेकिन यह बात सच है कि कुछ लोगों को चींटियों से डर लगता है और इसकी वजह कुछ और नहीं बल्कि यह है कि उनके शरीर में कुछ विटामिन्स की कमी होती है. चलिए, आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं.

क्या है मामला?

दरअसल, तेलंगाना के संगारेड्डी जिले से एक हैरान कर देने वाली घटना सामने आई थी, जहां 25 साल की महिला ने चींटियों के डर से सुसाइड कर लिया. यह घटना 4 नवंबर को घटित हुई. पुलिस के अनुसार, महिला बचपन से ही चींटियों से डरती थी. इसको लेकर उसके पैतृक गांव में उसकी काउंसलिंग भी हो चुकी थी. महिला ने सुसाइड से पहले एक लेटर भी लिखा, जिसमें उसने लिखा कि ‘मैं माफी चाहती हूं कि मैं इन चींटियों के साथ नहीं रह सकती. बेटी का ख्याल रखना. सावधान रहना.”

क्यों लगता है चींटियों से डर?

इस तरह की बीमारी को मायरमेकोफोबिया कहा जाता है. यह एक तरह का स्पेसिफिक फोबिया है, जिसमें व्यक्ति को चींटियों से अत्यधिक डर या घबराहट महसूस होती है. यह डर इतना ज्यादा होता है कि व्यक्ति चींटियों के बारे में सोचकर भी बेचैन हो जाता है. कुछ मामलों में तो लोग चींटियों के आसपास जाने से बचते हैं, बाहर खाना खाने या बाग-बगीचे जाने से भी डरते हैं. जिन लोगों को चींटियों से डर लगता है, उनमें कई शारीरिक और मानसिक लक्षण दिखाई देते हैं, जैसे कि दिल की धड़कन तेज होना, पसीना आना या कांपना, और चींटियों से जुड़ी जगहों या चीजों से दूर भागना.

किस विटामिन की कमी से होता है यह?

इसको लेकर अभी तक कोई ठोस सबूत नहीं है कि यह किस विटामिन्स के चलते होता है, लेकिन कई जगह इस बात का उल्लेख किया गया है कि यह विटामिन B12 की कमी के चलते हो सकता है. विटामिन B12 नर्वस सिस्टम को मजबूत बनाए रखने में मदद करता है. इसकी कमी से व्यक्ति को थकान, कमजोरी, भूलने की बीमारी और डर जैसी मानसिक समस्याएं हो सकती हैं. जब नर्वस सिस्टम कमजोर हो जाता है, तो छोटी-छोटी चीजें भी डर का कारण बन सकती हैं.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Health Tips: अब बिना सुई के होगा शुगर टेस्ट, IIT मद्रास की नई डिवाइस से डायबिटीज मरीजों को मिलेगी बड़ी राहत

भारत में डायबिटीज आज बहुत आम बीमारी बन चुकी है. भारत में करोड़ों लोग रोजाना अपने ब्लड शुगर लेवल की जांच करते हैं ताकि वे अपनी सेहत को संभाल सकें. लेकिन अब तक जो तरीका यूज होता था. वो उंगली में सुई चुभाकर खून का सैंपल लेना है. वह काफी दर्दनाक और झंझट भरा होता था. कई बार दिन में 3 से 4 बार टेस्ट करना पड़ता है, जिससे न सिर्फ दर्द होता है बल्कि खर्च भी बढ़ जाता है. अब इन सब परेशानियों से राहत देने के लिए IIT मद्रास के वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक विकसित की है जो डायबिटीज मरीजों की जिंदगी को आसान बना देगी. अब बिना सुई लगाए कम खर्च में मरीज शुगर टेस्ट कर सकेंगे. IIT मद्रास की नई डिवाइस से डायबिटीज के मरीजों को राहत मिलेगी.

सस्ता, आसान और बिना सुई लगाए कम खर्च में शुगर टेस्ट 

IIT मद्रास के इलेक्ट्रॉनिक मटीरियल्स एंड थिन फिल्म्स लैब के शोधकर्ताओं ने एक खास ग्लूकोज मॉनिटरिंग डिवाइस तैयार की है. इस डिवाइस को प्रोफेसर परसुरामन स्वामीनाथन की अगुवाई में बनाया गया है. यह डिवाइस खासतौर पर डायबिटीज के मरीजों के लिए डिजाइन की गई है ताकि वे बिना सुई के, आसानी से और कम खर्च में अपना ब्लड शुगर लेवल जांच सकें.

कैसे काम करती है यह नई डिवाइस?

अब तक दो तरह के तरीके आमतौर पर यूज होते थे. जिसमें पहला SMBG (Self-Monitoring of Blood Glucose), इसमें सुई से उंगली चुभाकर खून का सैंपल लिया जाता है. वहीं दूसरा CGM (Continuous Glucose Monitoring), जो बिना बार-बार सुई लगाए रियल-टाइम रीडिंग देता है, लेकिन ये काफी महंगे होते हैं और मोबाइल या अलग डिवाइस से ही डेटा दिखाते हैं.

वहीं IIT मद्रास की टीम ने इन दोनों की कमियों को ध्यान में रखते हुए एक नया समाधान निकाला है. उन्होंने एक मॉड्यूलर सिस्टम बनाया है जिसमें दो हिस्से हैं. एक रीयूजेबल इलेक्ट्रॉनिक यूनिट जिसमें लो-पावर डिस्प्ले लगा है और एक डिस्पोजेबल माइक्रोनीडल सेंसर पैच, जो स्किन पर चिपकाया जाता है. यह माइक्रोनीडल पैच बहुत छोटा होता है और स्किन के बिल्कुल ऊपर वाले हिस्से से शुगर लेवल मेजर कर लेता है. इसका यूज करने में न तो दर्द होता है और न ही खून निकालने की जरूरत पड़ती है.

क्या है इस रिसर्च का उद्देश्य?

इस नई तकनीक से डायबिटीज के मरीजों को बार-बार सुई चुभाने की परेशानी से छुटकारा मिलेगा और वे ज्यादा आराम से अपने शुगर लेवल पर नजर रख पाएंगे. इस प्रोजेक्ट से जुड़े एमएस (एंटरप्रेन्योरशिप) स्कॉलर एल. बालमुरुगन ने बताया कि यह डिवाइस गेम-चेंजर साबित हो सकती है. यह ग्लूकोज मॉनिटरिंग को न सिर्फ आसान बनाती है बल्कि गोपनीय और किफायती भी है. अब लोग घर बैठे नियमित रूप से शुगर टेस्ट कर सकेंगे, जिससे उन्हें अपनी सेहत को समझने और समय पर कदम उठाने में मदद मिलेगी. लंबे समय में इसका फायदा यह होगा कि डायबिटीज से जुड़ी इमरजेंसी और अस्पताल जाने की जरूरत कम होगी. इससे परिवार पर आर्थिक बोझ घटेगा और मरीज अपनी सेहत को बेहतर तरीके से संभाल पाएंगे.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Heart Blockage Symptoms:हार्ट अटैक के दौरान बाएं हाथ में क्यों होता है दर्द? जानिए इस चेतावनी संकेत के पीछे का विज्ञान

 जब भी हम हार्ट की बात करते हैं, तो सबसे पहले दिमाग में सीने में दर्द का ख्याल आता है. लेकिन कई बार लोगों को इसके साथ या इससे पहले बाएं हाथ में दर्द या भारीपन महसूस होता है. यह दर्द हल्का, दबाव जैसा, झुनझुनी भरा या सुन्नपन जैसा हो सकता है. यह लक्षण यूं ही नहीं आता, बल्कि शरीर का यह एक महत्वपूर्ण संकेत होता है कि कुछ गंभीर हो रहा है. अगर आप समय रहते इसे पहचान लें, तो आप अपनी जान बचा सकते हैं. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.

क्यों होता है बाएं हाथ में दर्द?

जब दिल की मांसपेशियों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती क्योंकि कोरोनरी आर्टरीज में ब्लॉकेज आ जाता है, तो हार्ट दर्द के संकेत भेजता है. दिल और बाएं हाथ की नसें एक ही रास्ते से मस्तिष्क तक जाती हैं. इस वजह से दिमाग असली दर्द के सोर्स को पहचान नहीं पाता और उसे बाएं हाथ से आने वाला दर्द समझ लेता है. इसे ही रिफरेड पेन कहा जाता है. दिल और बाएं हाथ की नसें मुख्य रूप से T1 से T4 नामक स्पाइनल नर्व्स से जुड़ी होती हैं. जब दिल में ऑक्सीजन की कमी होती है, तो इन नसों के जरिए दर्द का संदेश पूरे बाएं हिस्से तक फैल जाता है, खासतौर पर कंधे, हाथ और जबड़े तक.

क्यों बाईं तरफ दर्द ज्यादा महसूस होता है?

दिल शरीर के बाएं हिस्से की ओर थोड़ा झुका होता है, इसलिए ब्लॉकेज या दिल की मांसपेशी में ऑक्सीजन की कमी का असर उसी तरफ ज्यादा महसूस होता है. अगर दिल की Left Anterior Descending (LAD) आर्टरीज में रुकावट होती है, तो यह दर्द सीधे बाईं ओर महसूस होता है. डॉक्टर इसे विंडो मेकर आर्टरीज भी कहते हैं, क्योंकि इसमें पूरी रुकावट घातक हो सकती है.

कब समझें कि यह दर्द हार्ट अटैक का संकेत है?

हर बार बाएं हाथ का दर्द हार्ट अटैक नहीं होता, लेकिन अगर यह दर्द कुछ मिनटों से ज्यादा रहे, दबाव या जलन जैसा महसूस हो और आराम करने पर भी न जाए, तो इसके बाद आपको सतर्क होने की जरूरत है. अगर इस दर्द के साथ सीने में भारीपन, सांस फूलना, जबड़े में दर्द, मतली या पसीना भी महसूस हो, तो तुरंत मेडिकल मदद लें. करीब हर चार में से एक व्यक्ति को हार्ट अटैक के दौरान असामान्य लक्षण होते हैं. यानी उन्हें सीने में दर्द नहीं होता, बल्कि सिर्फ बाएं हाथ में दर्द ही एकमात्र संकेत हो सकता है.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

T20 World Cup 2026: भारत करेगा फाइनल मैच की मेजबानी, टूर्नामेंट से जुड़ी A से Z जानकारी हुई जारी।

भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) ने अगले साल होने वाले टी20 विश्व कप के आयोजन स्थलों की सूची में अहमदाबाद, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और मुंबई को जगह दी है. फाइनल अहमदाबाद में खेला जाएगा.

एकदिवसीय विश्व कप 2023 का भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच फाइनल भी अहमदाबाद में खेला गया था जो एक लाख से अधिक दर्शकों की क्षमता के साथ दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम है. विश्व कप 2023 भारत में 10 स्थलों पर खेला गया था.

बेंगलुरु का नाम अंतिम रूप से चयनित स्थलों की सूची में नहीं है क्योंकि जून में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (आरसीबी) के आईपीएल विजय समारोह में हुई भगदड़ के बाद कर्नाटक राज्य क्रिकेट संघ द्वारा आवश्यक मंजूरी प्राप्त करने में विफल रहने के बाद इसे महिला एकदिवसीय विश्व कप की सूची से हटा दिया गया था.

चिन्नास्वामी स्टेडियम में हुई इस घटना में 11 लोगों की जान चली गई थी और उसके बाद से वहां कोई अंतरराष्ट्रीय मैच नहीं हुआ है.

पता चला है कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) फरवरी-मार्च में होने वाली इस प्रतियोगिता का पूर्ण कार्यक्रम अगले हफ्ते घोषित करेगा. टूर्नामेंट के सात फरवरी को शुरू होने की संभावना है जबकि फाइनल आठ मार्च को हो सकता है.

टी20 विश्व कप का श्रीलंका सह मेजबान होगा जो भारत के साथ इंतजाम के तहत पाकिस्तान के लिए तटस्थ स्थल होगा. श्रीलंका में कैंडी और कोलंबो सहित तीन स्थलों पर मुकाबलों का आयोजन होगा.

भारत स्वदेश में होने वाले विश्व कप में गत चैंपियन के रूप में उतरेगा. टीम ने पिछले साल जून में बारबडोस में पिछले टी20 विश्व कप का खिताब जीता था.

पाकिस्तान अगर फाइनल में पहुंचता है तो खिताबी मुकाबला श्रीलंका में होगा. आईसीसी, बीसीसीआई और पीसीबी के बीच समझौते के तहत 2027 तक भारत और पाकिस्तान के सभी मैच तटस्थ स्थल पर होंगे.

Health News:अगर कोई एक बार में बहुत ज्यादा पानी पी ले, तो क्या होता है? क्या ऐसा करना सेहत के लिए खतरनाक है?

पानी हमारी लाइफ के लिए बेहद जरूरी है. यह न सिर्फ हमारे शरीर को हाइड्रेटेड रखता है, बल्कि पाचन, ब्लड फ्लो, शरीर का तापमान कंट्रोल करने और दिमाग के सही कामकाज के लिए भी जरूरी है. हम अक्सर सुनते हैं कि दिन में आठ गिलास पानी पियो या पानी जरूरी है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बहुत ज्यादा पानी पीना भी खतरनाक हो सकता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि अगर एक बार में ढेर सारा पानी पी लेंगे तो क्या होगा और ऐसा करना हमारी सेहत के लिए कितना खतरनाक है.

अगर एक बार में ढेर सारा पानी पी लेंगे तो क्या होगा

अगर एक बार में ढेर सारा पीना, खासकर थोड़े समय में बहुत ज्यादा मात्रा में पी लेना, शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स जैसे सोडियम को पतला कर सकता है. जब सोडियम का लेवल इंबैलेंस हो जाता है, तो यह जल विषाक्तता आनी Water Intoxication या हाइपोनेट्रेमिया जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है. इस स्थिति में शरीर के सेल्स पानी से सूजने लगती हैं और दिमाग पर दबाव बढ़ जाता है, जो कभी-कभी लाइफ के लिए भी खतरे का कारण बन सकता है. हालांकि यह स्थिति आम लोगों में बहुत कम होती है, लेकिन यह उन लोगों में ज्यादा दिखाई देती है जो एथलीट हैं और लंबे समय तक खेल या एक्सरसाइज करते हैं, कुछ विशेष बीमारियों से पीड़ित हैं और बिना प्यास के लगातार बहुत सारा पानी पीते हैं.

ऐसा करना हमारी सेहत के लिए कितना खतरनाक है

1.  लगातार साफ यूरिन आना – अगर आपका यूरिन लगातार रंगहीन और साफ है, तो यह संकेत है कि शरीर को जरूरत से ज्यादा पानी मिल रहा है. हल्का पीला यूरिन आम तौर पर सही हाइड्रेशन का संकेत होता है, लेकिन लगातार साफ यूरिन यह बता सकता है कि इलेक्ट्रोलाइट्स इंबैलेंस  हो रहे हैं.

2. जल्दी यूरिन आना – दिन में 8 से 10 बार से ज्यादा यूरिन आना यह संकेत हो सकता है कि गुर्दे एक्स्ट्रा पानी निकालने के लिए ज्यादा मेहनत कर रहे हैं. इससे शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी भी हो सकती है.

3. मतली, उल्टी और चक्कर आना – ज्यादा पानी पीने से शरीर में सोडियम की कमी होती है, जिससे मतली, कभी-कभी उल्टी और चक्कर आने लगते हैं. इसे अक्सर डिहाइड्रेशन समझ लिया जाता है, जबकि यह पानी के ज्यादा सेवन के कारण होता है.

4. दिमाग की सूजन से सिरदर्द – जब शरीर में सोडियम कम हो जाता है, तो पानी दिमाग की कोशिकाओं में चला जाता है. इससे दिमाग में सूजन आ जाती है और तेज सिरदर्द शुरू हो जाता है.

5. भ्रम और ब्रेन फॉग – ज्यादा पानी दिमाग के नॉर्मल काम करने को असर कर सकता है. ऐसे लोग भ्रमित, फोकस में दिक्कत, चिड़चिड़ा या थका हुआ महसूस कर सकते हैं.

6. सूजन और स्किन का रंग बदलना – शरीर के हाथ, पैर, होंठ और चेहरे में सूजन दिखाई दे सकती है. स्किन फीकी या खींची हुई लग सकती है क्योंकि ज्यादा पानी सेल्स और टिशू में जमा हो जाता है.

7. थकान और शारीरिक कमजोरी – गुर्दे एक्स्ट्रा पानी को निकालने के लिए एक्स्ट्रा मेहनत करते हैं, जिससे शरीर थका हुआ और कमजोर महसूस करता है.

8. मांसपेशियों में ऐंठन – इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी के कारण मांसपेशियों में ऐंठन, मरोड़ या झटके महसूस हो सकते हैं.

9. दौरे पड़ने का खतरा – गंभीर मामलों में, सोडियम का स्तर तेजी से गिर सकता है, जिससे दौरे, बेहोशी या चेतना का अचानक खोना हो सकता है.

10. सांस लेने में मुश्किल – दिमाग की सूजन श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकती है. इससे सांस लेने में मुश्किल हो सकती है और यह जल्दी जानलेवा हो सकता है.

कितना पानी पिएं 

इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन (IOM) के अनुसार, हर व्यक्ति की पानी की जरूरत अलग होती है. यह उम्र, शरीर का आकार, गतिविधि और मौसम पर निर्भर करता है. सामान्य रूप से वयस्क महिलाओं को  प्रतिदिन लगभग 2.7 लीटर पानी पीना चाहिए और वयस्क पुरुषों को प्रतिदिन लगभग 3.7 लीटर पानी पीना चाहिए. पानी की मात्रा को प्यास के अनुसार लेना चाहिए.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.