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Health Update:Fanta में 3 गुना ज्यादा Sugar! क्या भारतीय वेरिएंट से बढ़ सकता है सेहत का खतरा? समझें पूरा मामला

Fanta Drink: एक ही ब्रांड का सॉफ्ट ड्रिंक अलग-अलग देशों में अलग फॉर्मूले के साथ क्यों मिलता है? यह सवाल अक्सर तब उठता है जब भारत और दूसरे देशों में बिकने वाली Fanta के न्यूट्रिशन लेबल की तुलना की जाती है। भारत में मिलने वाली Fanta और ब्रिटेन की Fanta Orange में शुगर की मात्रा में बड़ा अंतर दिखाई देता है।

न्यूट्रिशन लेबल के मुताबिक, भारत में बिकने वाली Fanta में प्रति 100 ml करीब 13.7 ग्राम शुगर है। वहीं ब्रिटेन में मिलने वाली Fanta Orange में करीब 4.5 ग्राम शुगर बताई गई है। यानी समान मात्रा की तुलना करें तो भारतीय वेरिएंट में शुगर लगभग तीन गुनी है।

लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भारतीय Fanta पीने से बीमारी का खतरा भी तीन गुना बढ़ जाता है। यहां तीन गुने का अंतर केवल शुगर की मात्रा से संबंधित है।

100 ml से 500 ml तक कितना बदल जाता है आंकड़ा?

शुगर की मात्रा को समझने के लिए सर्विंग साइज पर ध्यान देना जरूरी है। अगर 500 ml की बोतल की बात करें तो भारतीय Fanta में लेबल के हिसाब से करीब 68.5 ग्राम शुगर हो सकती है।

इसके मुकाबले 500 ml ब्रिटिश Fanta Orange में करीब 22.5 ग्राम शुगर होगी। यानी बड़ी बोतल पीने पर दोनों के बीच शुगर का अंतर काफी बढ़ जाता है।

यही वजह है कि केवल किसी ड्रिंक के नाम या ब्रांड को देखकर उसे हेल्दी या अनहेल्दी मानने के बजाय उसके पैकेट पर दिए गए Nutrition Facts को देखना ज्यादा जरूरी है।

भारत और UK में अलग क्यों है Fanta का फॉर्मूला?

एक ही ब्रांड का पेय अलग देशों में बिल्कुल एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं है। कंपनियां अलग-अलग बाजारों के लिए उत्पाद की रेसिपी तैयार करते समय स्थानीय स्वाद, उपभोक्ताओं की पसंद, उपलब्ध सामग्री, कीमत, टैक्स और खाद्य नियमों जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखती हैं।

UK में सामान्य Fanta Orange में शुगर के साथ स्वीटनर्स का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे उसकी कुल शुगर मात्रा भारतीय वेरिएंट की तुलना में कम हो जाती है।

हालांकि कम शुगर होने का अर्थ यह नहीं है कि UK वाली Fanta पूरी तरह स्वास्थ्यवर्धक पेय बन जाती है। यह भी एक कार्बोनेटेड और मीठा सॉफ्ट ड्रिंक है, इसलिए इसका सेवन सीमित रखना बेहतर माना जाता है।

बाजार और लोगों की पसंद भी डालती है असर

किसी पेय की रेसिपी केवल स्वाद के आधार पर तय नहीं होती। कंपनियां किसी देश में उत्पाद लॉन्च या बेचते समय वहां की मांग, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ताओं की पसंद का भी अध्ययन करती हैं।

भारत में लंबे समय से मीठे और फ्लेवर वाले कार्बोनेटेड ड्रिंक्स की अच्छी मांग रही है। वहीं हाल के वर्षों में कम शुगर और जीरो-शुगर पेय को लेकर भी लोगों की रुचि बढ़ी है।

इसी कारण अलग-अलग बाजारों में एक ही ब्रांड के सामान्य और लो-शुगर या जीरो-शुगर विकल्प देखने को मिलते हैं।

ज्यादा Sugar वाली ड्रिंक से क्या नुकसान हो सकता है?

सॉफ्ट ड्रिंक के जरिए शरीर में शुगर और अतिरिक्त कैलोरी पहुंचती है। अगर ऐसी ड्रिंक्स का सेवन बार-बार और बड़ी मात्रा में किया जाए, तो यह कुल कैलोरी सेवन बढ़ा सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, आहार में Free Sugars की मात्रा कुल दैनिक ऊर्जा के 10 प्रतिशत से कम रखना बेहतर है। इसे 5 प्रतिशत से नीचे रखने पर अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं।

ज्यादा फ्री शुगर का सेवन वजन बढ़ने और मोटापे के जोखिम से जुड़ा है। इसके अलावा अधिक चीनी का सेवन दांतों में कैविटी की समस्या का खतरा भी बढ़ा सकता है।

क्या भारतीय Fanta से 3 गुना ज्यादा नुकसान होगा?

नहीं। यह कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि शुगर तीन गुनी होने का मतलब बीमारी का खतरा भी तीन गुना हो गया।

तीन गुने का आंकड़ा केवल 100 ml ड्रिंक में मौजूद शुगर की तुलना बताता है। स्वास्थ्य पर असर कई चीजों पर निर्भर करता है—आप कितनी मात्रा में सॉफ्ट ड्रिंक लेते हैं, कितनी बार पीते हैं और पूरे दिन आपके आहार से कुल कितनी शुगर मिल रही है।

अगर कोई व्यक्ति कभी-कभार थोड़ी मात्रा में ऐसी ड्रिंक लेता है, तो उसकी स्थिति उस व्यक्ति से अलग होगी जो रोजाना बड़ी बोतल सॉफ्ट ड्रिंक पीता है।

इसलिए सॉफ्ट ड्रिंक खरीदते समय केवल ब्रांड या स्वाद पर ध्यान देने के बजाय प्रति 100 ml शुगर, पूरी बोतल में कुल शुगर और सर्विंग साइज जरूर देखें। नियमित रूप से ज्यादा मीठे पेय लेने की आदत को कम करना overall health के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है।

डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी जानकारी के लिए है। किसी विशेष बीमारी, वजन या डाइट से जुड़ी व्यक्तिगत सलाह के लिए योग्य डॉक्टर या डाइटीशियन से परामर्श करें।

नेपाल में आई तबाही के बीच फंसे बंगाली एक्टर खराज मुखर्जी, पत्नी भी हैं उनके साथ

नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने हालात बेहद खराब कर दिए हैं। प्राकृतिक आपदा के कारण कई इलाकों में जनजीवन प्रभावित हुआ है और बड़ी संख्या में लोग अलग-अलग स्थानों पर फंस गए हैं। इसी बीच मशहूर बंगाली अभिनेता खराज मुखर्जी के भी नेपाल में फंसे होने की जानकारी सामने आई है। वह अपनी पत्नी के साथ नेपाल गए थे।

खराज मुखर्जी के परिवार ने बताया है कि अभिनेता और उनकी पत्नी फिलहाल सुरक्षित हैं। हालांकि, खराब मौसम और नेटवर्क की समस्या के कारण परिवार को उनसे संपर्क करने में परेशानी हुई।

शूटिंग के लिए नेपाल पहुंचे थे अभिनेता

खराज मुखर्जी की साली शाश्वती मुखर्जी के मुताबिक, अभिनेता करीब 20 अगस्त को एक शूटिंग प्रोजेक्ट के सिलसिले में नेपाल पहुंचे थे। उनकी वापसी 23 अगस्त को प्रस्तावित थी।

हालांकि, लगातार खराब मौसम और बारिश के कारण शूटिंग का कार्यक्रम आगे बढ़ाना पड़ा। इसी वजह से खराज को नेपाल में कुछ और समय रुकना पड़ा।

इसी दौरान इलाके में बाढ़ और भूस्खलन की स्थिति गंभीर हो गई। जब परिवार को नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा की जानकारी मिली तो उन्होंने अभिनेता से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन खराब नेटवर्क के कारण सीधे बातचीत नहीं हो सकी।

बेटे से मिली अभिनेता के सुरक्षित होने की जानकारी

परिवार की चिंता उस समय बढ़ गई जब खराज से फोन पर संपर्क नहीं हो पाया। इसके बाद परिवार ने उनके बेटे बिहू मुखर्जी से संपर्क किया।

बिहू ने परिवार को जानकारी दी कि उनके पिता सुरक्षित हैं और उनकी स्थिति ठीक है। अभिनेता की पत्नी भी उनके साथ हैं और वह भी सुरक्षित बताई जा रही हैं।

फिलहाल परिवार उनकी स्थिति पर नजर बनाए हुए है और संपर्क बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

कौन हैं खराज मुखर्जी?

खराज मुखर्जी बंगाली सिनेमा के जाने-माने अभिनेता हैं। अभिनय के अलावा वह कॉमेडी और गायन के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं। उन्होंने लंबे करियर के दौरान कई चर्चित बंगाली फिल्मों में काम किया है और हिंदी फिल्मों में भी अपनी पहचान बनाई है।

उन्होंने वर्ष 1980 के आसपास फिल्मी करियर की शुरुआत की थी। शुरुआती दौर के बाद उन्होंने बंगाली सिनेमा में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।

हिंदी फिल्मों में भी किया काम

खराज मुखर्जी ने हिंदी दर्शकों के बीच भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। वह ‘जॉली एलएलबी 3’, ‘लकड़बग्घा’, ‘धड़क’, ‘मेरी प्यारी बिंदु’ और ‘कहानी 2: दुर्गा रानी सिंह’ जैसी फिल्मों में नजर आ चुके हैं।

फिल्म ‘कहानी’ में उन्होंने इंस्पेक्टर चटर्जी की भूमिका निभाकर दर्शकों का ध्यान खींचा था।

इसके अलावा वह ‘द जापानी वाइफ’, ‘शिखर’, ‘टोली लाइट्स’, ‘देवा’, ‘दुई पृथिवी’, ‘एगारो’, ‘आवारा’, ‘एक्सीडेंट’ और ‘जमाई 420’ सहित कई बंगाली फिल्मों का हिस्सा रहे हैं।

नेपाल में बाढ़ ने बढ़ाई चिंता

नेपाल में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन के कारण कई क्षेत्रों में गंभीर स्थिति बनी हुई है। बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने के साथ कई लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।

ऐसे हालात में खराज मुखर्जी और उनकी पत्नी का सुरक्षित होना उनके परिवार और प्रशंसकों के लिए राहत की खबर है। खराब मौसम के बीच राहत एवं बचाव अभियान जारी है और प्रभावित क्षेत्रों में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने की कोशिश की जा रही है।

Travel Tips:Delhi से ₹5,000 में घूम आएं ये 3 खूबसूरत शहर, Travel Plan में जानें सफर, होटल और खाने का खर्च

अगर आपको कम बजट में घूमने का शौक है, तो हर ट्रिप के लिए बड़ी रकम खर्च करना जरूरी नहीं है। सही जगह चुनकर, सस्ता ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करके और बजट होटल में रुककर छोटी यात्रा को किफायती बनाया जा सकता है।

सितंबर का मौसम भी कई जगहों पर घूमने के लिए अच्छा माना जाता है। बारिश के बाद प्राकृतिक नजारे खिल उठते हैं और मौसम में भी गर्मी की तुलना में राहत मिल सकती है। अगर आप दिल्ली से छोटी बजट ट्रिप प्लान कर रहे हैं, तो पुष्कर, ऋषिकेश और अमृतसर जैसे शहर विकल्प हो सकते हैं।

नोट: ₹5,000 का बजट मुख्य रूप से किफायती ट्रांसपोर्ट, बजट ठहरने और सीमित खाने-पीने को ध्यान में रखकर है। वीकेंड, त्योहार या होटल की उपलब्धता के हिसाब से खर्च बढ़ सकता है।

1. पुष्कर, राजस्थान

अगर आप पहाड़ों की बजाय झील, मंदिर और पुराने बाजारों वाली जगह देखना चाहते हैं, तो पुष्कर एक अच्छा विकल्प हो सकता है। यहां पुष्कर झील के आसपास घूमने के अलावा ब्रह्मा मंदिर और स्थानीय बाजारों को एक्सप्लोर किया जा सकता है।

सितंबर में बारिश के बाद आसपास का वातावरण काफी अच्छा नजर आ सकता है। कम बजट में यात्रा करने के लिए बस या ट्रेन के सस्ते विकल्पों को प्राथमिकता देना बेहतर रहेगा।

दिल्ली से दूरी: लगभग 430 किमी
यात्रा समय: करीब 7-9 घंटे, साधन के अनुसार

कहां घूम सकते हैं?

  • पुष्कर झील
  • ब्रह्मा मंदिर
  • घाट
  • स्थानीय बाजार

बजट टिप: महंगे होटल की जगह पहले से बजट रूम बुक करें। स्थानीय भोजनालयों में खाना खाने से खर्च नियंत्रित किया जा सकता है।

2. ऋषिकेश, उत्तराखंड

दिल्ली से कम समय में पहुंचने वाली बजट डेस्टिनेशन की बात करें तो ऋषिकेश का नाम जरूर आता है। धार्मिक स्थलों के साथ-साथ यहां गंगा किनारे का माहौल और एडवेंचर एक्टिविटीज भी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।

आप सुबह की आरती, मंदिरों और घाटों की सैर कर सकते हैं। अगर बजट अनुमति देता है तो रिवर राफ्टिंग जैसी गतिविधि भी ट्रिप में शामिल की जा सकती है, हालांकि इससे कुल खर्च बढ़ जाएगा।

दिल्ली से दूरी: करीब 240 किमी
यात्रा समय: लगभग 5-6 घंटे

बजट कैसे संभालें?

ऋषिकेश में बजट होटल या हॉस्टल के विकल्प तलाशे जा सकते हैं। सामान्य तौर पर ₹1,200-1,500 के आसपास कमरा मिलने की संभावना हो सकती है, लेकिन तारीख और लोकेशन के अनुसार कीमत बदलती है।

लोकल ट्रांसपोर्ट, शेयरिंग ऑटो और पैदल घूमने से अतिरिक्त खर्च कम किया जा सकता है। महंगे कैफे और अनावश्यक एडवेंचर एक्टिविटीज से बचेंगे तो ₹5,000 के आसपास ट्रिप प्लान करना आसान हो सकता है।

3. अमृतसर, पंजाब

अगर धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों तरह की जगहों को एक साथ देखना चाहते हैं, तो अमृतसर भी बजट ट्रिप के लिए अच्छा विकल्प हो सकता है।

शहर का सबसे प्रमुख आकर्षण स्वर्ण मंदिर है। इसके अलावा समय मिलने पर अटारी-वाघा बॉर्डर की यात्रा भी की जा सकती है।

दिल्ली से दूरी: लगभग 450 किमी
यात्रा समय: करीब 7-8 घंटे, यात्रा के साधन के आधार पर

कम पैसे में कैसे घूमें?

अमृतसर में खाने का खर्च कम रखने के लिए स्थानीय भोजनालयों का विकल्प चुना जा सकता है। स्वर्ण मंदिर में मिलने वाला लंगर भी यात्रियों के लिए भोजन का एक विकल्प है।

लोकल ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें और महंगे रेस्टोरेंट या प्रीमियम होटल से बचें। अगर यात्रा से पहले ट्रेन/बस और होटल की बुकिंग कर ली जाए तो बजट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

₹5,000 की ट्रिप में इन बातों का रखें ध्यान

कम बजट वाली यात्रा में सबसे ज्यादा फर्क ट्रांसपोर्ट और होटल की कीमत से पड़ता है। इसलिए यात्रा से पहले किराया और कमरे की कीमत जरूर जांच लें।

  • ट्रेन या बस के सस्ते विकल्प चुनें।
  • होटल पहले से बुक करने की कोशिश करें।
  • लोकल ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें।
  • स्ट्रीट फूड और स्थानीय भोजनालयों को प्राथमिकता दें।
  • महंगी एक्टिविटीज को बजट के हिसाब से चुनें।
  • वीकेंड की बजाय सामान्य दिनों में यात्रा करने पर खर्च कम हो सकता है।

इन तीनों जगहों में से ऋषिकेश दिल्ली से सबसे नजदीक है, इसलिए ₹5,000 के सीमित बजट में इसे मैनेज करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। वहीं पुष्कर और अमृतसर में लंबी दूरी के कारण आने-जाने का खर्च बजट का बड़ा हिस्सा ले सकता है।

‘देऊळ बंद 2’ की बंपर कमाई का नेक इस्तेमाल, किसानों के बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया मुनाफा

मराठी फिल्म ‘देऊळ बंद 2’ ने सिनेमाघरों में शानदार प्रदर्शन करते हुए अच्छी कमाई की थी। अब फिल्म के निर्देशक प्रवीण तरडे ने इससे जुड़ी एक ऐसी जानकारी साझा की है, जिसने फिल्म की सफलता को एक अलग वजह से खास बना दिया है।

प्रवीण तरडे के मुताबिक, फिल्म की लागत निकालने के बाद बची पूरी रकम को मेकर्स ने अपने पास रखने के बजाय जरूरतमंद परिवारों की मदद के लिए दान कर दिया। इस फंड का इस्तेमाल महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले उन बच्चों की सहायता के लिए किया जा रहा है, जिन्होंने अपने किसान माता-पिता को आत्महत्या के कारण खो दिया है।

फिल्म की सफलता को परिवारों तक पहुंचाना था मकसद

प्रवीण तरडे ने बताया कि फिल्म की टीम चाहती थी कि इसकी सफलता का फायदा समाज के उन लोगों तक भी पहुंचे, जो आर्थिक और सामाजिक मुश्किलों से गुजर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि प्रोडक्शन पर हुआ खर्च निकालने के बाद जो भी मुनाफा बचा, उसे जरूरतमंद बच्चों की मदद में लगाया गया। खास तौर पर उन परिवारों के बच्चों को सहायता दी जा रही है, जिनके किसान माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं।

इस आर्थिक मदद का उद्देश्य बच्चों की पढ़ाई को दोबारा शुरू कराने और उनकी शिक्षा का खर्च उठाने में सहयोग करना है।

250 बच्चों के भोजन की भी जिम्मेदारी

मेकर्स की सामाजिक पहल सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं है। जानकारी के मुताबिक, टीम करीब 250 बच्चों को रोजाना दो वक्त का भोजन उपलब्ध कराने में भी योगदान दे रही है।

प्रवीण तरडे ने इस पहल में सहयोग के लिए निर्माता कैलाश वाणी का आभार जताया। उन्होंने संकेत दिया कि टीम आने वाले वर्षों में भी इस तरह की मदद को जारी रखने की कोशिश करेगी।

फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर किया शानदार प्रदर्शन

‘देऊळ बंद 2’ कम बजट में बनाई गई फिल्मों में शामिल रही, लेकिन रिलीज के बाद इसे दर्शकों का अच्छा रिस्पॉन्स मिला। फिल्म का निर्माण करीब 8 से 10 करोड़ रुपये के बजट में हुआ था।

फिल्म ने भारत में करीब 87.11 करोड़ रुपये का ग्रॉस कलेक्शन किया, जबकि इसका नेट कलेक्शन लगभग 74.35 करोड़ रुपये बताया गया है।

फिल्म ने करीब 2.45 करोड़ रुपये की ओपनिंग के साथ शुरुआत की थी। अलग-अलग आंकड़ों के अनुसार, फिल्म की वर्ल्डवाइड कमाई 90 करोड़ रुपये के आसपास पहुंची।

शाहरुख खान ने भी की थी फिल्म की मदद

फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान से भी जुड़ा है।

फिल्म के निर्माण के दौरान इसके डिजिटल सिनेमा पैकेज यानी DCP को लेकर मेकर्स को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ा था। DCP तैयार और मैनेज करने की लागत बढ़कर करीब 42 लाख रुपये हो गई थी, जबकि निर्माताओं ने शुरुआत में इसके लिए काफी कम बजट का अनुमान लगाया था।

ऐसे समय में शाहरुख खान की कंपनी रेड चिलीज एंटरटेनमेंट की टीम ने मदद की। जब शाहरुख को फिल्म की स्थिति के बारे में बताया गया और उनकी टीम ने फिल्म को अच्छा बताया, तो उन्होंने अपनी टीम से फिल्म का बिल माफ करने के लिए कहा। इससे निर्माताओं को बड़ी आर्थिक राहत मिली।

‘देऊळ बंद’ का सीक्वल थी फिल्म

‘देऊळ बंद 2’ वर्ष 2015 में रिलीज हुई फिल्म ‘देऊळ बंद’ की अगली कड़ी थी। फिल्म की कहानी सामाजिक और संवेदनशील मुद्दों को केंद्र में रखती है और किसानों की आत्महत्या जैसी गंभीर समस्या पर भी ध्यान खींचती है।

फिल्म में मोहन जोशी और स्नेहल तरडे प्रमुख भूमिकाओं में नजर आए। इनके अलावा मंगेश देसाई, संस्कृति बालगुडे, देवेंद्र गायकवाड़ और प्रवीण तरडे ने भी महत्वपूर्ण किरदार निभाए।

फिल्म की कमाई के बाद मुनाफे को जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा और भोजन पर खर्च करने का फैसला ‘देऊळ बंद 2’ की व्यावसायिक सफलता को एक सामाजिक पहल से जोड़ देता है।

नेपाल आपदा पर सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह की मानवीय पहल : भारतीय पीड़ित परिवारों के लिए 11 लाख की सहायता

लखनऊ : नेपाल के रुकुम-नुवाकोट क्षेत्र में आई भीषण आपदा के बाद राहत एवं बचाव कार्यों के बीच सरोजिनी नगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने मानवीय संवेदना का परिचय देते हुए प्रभावित भारतीय परिवारों के लिए 11 लाख रुपये की प्रारंभिक सहायता की घोषणा की है। साथ ही सभी राष्ट्रीयताओं के लोगों के लिए सहायता एवं परिवार समन्वय डेस्क स्थापित करने तथा भारत-नेपाल के बीच दीर्घकालिक हिमालयी जलवायु एवं आपदा लचीलापन साझेदारी का प्रस्ताव रखा गया है।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि इस समय प्राथमिकता राजनीति या सीमाओं से ऊपर उठकर मानव जीवन की रक्षा, लापता लोगों की तलाश, घायलों का उपचार और प्रभावित परिवारों के साथ खड़े होने की है। उन्होंने नेपाल सेना, नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस बल, चिकित्सा दलों, हेलीकॉप्टर कर्मियों और स्वयंसेवकों के राहत एवं बचाव प्रयासों को नमन करते हुए भारत सरकार की त्वरित मानवीय प्रतिक्रिया की सराहना की।

भारतीय पीड़ित परिवारों के लिए 11 लाख रुपये की सहायता

Environment Warriors की ओर से इस आपदा में मारे गए अथवा लापता भारतीय नागरिकों के परिवारों के लिए 11 लाख रुपये की प्रारंभिक सहायता राशि उपलब्ध कराई जाएगी। सक्षम प्राधिकरणों के समन्वय से सत्यापित निकटतम परिजनों तक यह सहायता पहुंचाने की बात कही गई है।

डॉ. सिंह ने कहा कि किसी परिवार पर आई त्रासदी केवल आंकड़ा नहीं होती। यह उस परिवार के जीवन को बदल देने वाला संकट होता है। इसलिए राहत व्यवस्था में मानवीय संवेदना और त्वरित सहायता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

सभी राष्ट्रीयताओं के लिए सहायता एवं परिवार समन्वय डेस्क

डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने सरोजिनी नगर कार्यालय में सहायता एवं परिवार समन्वय डेस्क स्थापित करने का निर्देश दिया है। इस डेस्क के माध्यम से बाढ़ एवं आपदा में प्रभावित लोगों की सत्यापित जानकारी दर्ज की जाएगी और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित परिवारों को विदेश मंत्रालय, काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास तथा संबंधित राजनयिक मिशनों तक पहुंचाने में सहयोग किया जाएगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि सहायता राशि भारतीय नागरिकों के परिवारों के लिए है, जबकि सहायता डेस्क सभी के लिए खुला रहेगा।

शुरुआती आंकड़ों में 165 मौतें, 826 लोग लापता

प्रेस नोट में नेपाली अधिकारियों की ओर से जारी शुरुआती आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि 27 अगस्त की सुबह तक 165 शव बरामद किए जा चुके थे और 826 लोगों के लापता होने की सूचना थी। इनमें नेपाली नागरिकों के साथ सुरक्षा कर्मी, पर्यटक और बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक भी शामिल बताए गए हैं।

साथ ही यह भी कहा गया है कि खोज एवं बचाव अभियान लगातार जारी रहने के कारण आंकड़ों में बदलाव संभव है। लापता अथवा प्रभावित व्यक्तियों से संबंधित किसी भी जानकारी की पुष्टि संबंधित आधिकारिक स्रोतों से किए जाने पर जोर दिया गया है।

हिमालय से आई चेतावनी: आपदा प्रबंधन में हर मिनट महत्वपूर्ण

प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलनों का हवाला देते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बर्फ-शिला पतन अथवा अन्य प्राकृतिक घटनाओं से अचानक आपदा की स्थिति पैदा हो सकती है। प्रेस नोट में ICIMOD के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि त्रिशूली नदी में एक स्थान पर जलस्तर लगभग 30 मिनट में नौ मीटर तक बढ़ गया।

डॉ. सिंह के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में 30 मिनट की पूर्व चेतावनी भी कई जिंदगियां बचा सकती है, बशर्ते चेतावनी स्वचालित हो और सीमाओं को पार कर समय पर संबंधित लोगों तक पहुंचे।

उन्होंने कहा कि हिमालय केवल किसी एक देश की समस्या नहीं है। हिमालयी क्षेत्र में होने वाले पर्यावरणीय बदलाव भारत और नेपाल दोनों के लिए साझा चुनौती हैं।

Net Zero और आपदा प्रबंधन को साथ जोड़ने पर जोर

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि आपदा प्रबंधन और जलवायु कार्रवाई को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार Net Zero केवल पर्यावरण का नारा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आपदा जोखिम को कम करने की रणनीति भी है।

उन्होंने स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, हरित परिवहन, जल एवं अपशिष्ट प्रबंधन और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को विकास का अभिन्न हिस्सा बनाने की आवश्यकता बताई।

उन्होंने कहा कि हिमालयी ग्लेशियर, परमाफ़्रॉस्ट, चट्टानी ढलान, हिमनदीय झीलें और जलस्रोत तेजी से बदल रहे हैं, इसलिए इनके संरक्षण और वैज्ञानिक निगरानी को प्राथमिकता देना जरूरी है।

सरोजनी नगर के लिए पांच सूत्रीय संकल्प

Environment Warriors एवं Net Zero Sarojini Nagar अभियान की ओर से हिमालयी आपदा और पर्यावरण संरक्षण को लेकर पांच प्रमुख संकल्प सामने रखे गए हैं-

  1. वृक्षारोपण नहीं, वृक्ष संरक्षण – सफलता का आकलन तीन वर्ष बाद जीवित वृक्षों की संख्या से किया जाएगा।
  2. तालाब, नाले और प्राकृतिक जलधाराओं का संरक्षण।
  3. प्राकृतिक जल-निकासी मार्गों पर अतिक्रमण और अवैज्ञानिक निर्माण का विरोध।
  4. Net Zero Sarojini Nagar की अवधारणा को घर, विद्यालय और संस्थानों तक पहुंचाना।
  5. हिमालयी पारिस्थितिक सुरक्षा और सीमापार पूर्व चेतावनी को विधानसभा में प्रमुखता से उठाना।

डॉ. सिंह ने कहा कि यदि हिमालय को केवल किसी एक देश की समस्या मानकर देखा गया तो समाधान संभव नहीं होगा। भारत और नेपाल के बीच साझा वैज्ञानिक निगरानी, डेटा साझाकरण, पूर्व चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन सहयोग को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।

भारत-नेपाल के बीच दीर्घकालिक साझेदारी का प्रस्ताव

डॉ. राजेश्वर सिंह ने भारत-नेपाल हिमालयी जलवायु एवं आपदा लचीलापन साझेदारी का प्रस्ताव रखते हुए तीन प्राथमिकताएं सुझाईं—सीमा पार पूर्व चेतावनी, साझा निगरानी एवं डेटा तथा जोखिम-संवेदी विकास।

इसके तहत ग्लेशियरों, हिमनदीय झीलों, अस्थिर ढलानों और नदी प्रवाह की उपग्रह एवं सेंसर आधारित निगरानी को बढ़ाने तथा त्वरित डेटा साझाकरण की व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया गया।

उन्होंने प्रस्ताव रखा कि 2030 तक चिन्हित उच्च-जोखिम हिमनदीय झीलों, अस्थिर बर्फीली संरचनाओं और प्राथमिकता वाले ढलानों की मैपिंग कर उन्हें सतत निगरानी एवं स्वचालित क्षेत्रीय पूर्व चेतावनी तंत्र से जोड़ा जाए।

“पहले बचाव, फिर लचीलापन”

डॉ. सिंह ने कहा कि वर्तमान समय की सबसे बड़ी जिम्मेदारी लापता लोगों को खोजना, फंसे लोगों को बचाना, घायलों का उपचार कराना और शोकाकुल परिवारों के साथ खड़ा होना है। उन्होंने कहा कि राहत और बचाव के बाद दीर्घकालिक स्तर पर आपदा के प्रति लचीलापन विकसित करना भी उतना ही जरूरी है।

उन्होंने कहा, “पहली जिम्मेदारी है—लापता लोगों को खोजना, फंसे लोगों को बचाना, घायलों का उपचार करना और शोकाकुल परिवारों के साथ खड़ा होना। बाकी हर बात-मेरी बात भी-उनके मिलने तक प्रतीक्षा कर सकती है।”

डॉ. राजेश्वर सिंह ने हिमालयी क्षेत्र में लगातार बदलती परिस्थितियों को गंभीर चेतावनी बताते हुए कहा कि “हिमालय हमारे प्रोजेक्ट नहीं, हमसे बात कर रहा है।” उन्होंने भारत और नेपाल से साझा पर्यावरणीय भविष्य की रक्षा के लिए मिलकर काम करने का आह्वान किया।

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