मंत्री नरेंद्र कश्यप ने लखनऊ में ‘दिव्य दीपावली मेला-2024’ का उद्घाटन किया और स्टालों का निरीक्षण किया।
उन्होंने दिव्यांगजनों के उत्पादों की सराहना करते हुए समाज से उन्हें प्रोत्साहित करने की अपील की।
मेले में 25 संस्थाओं ने दिव्यांगजनों के बने दीपक, मोमबत्तियां, रंगोली आदि उत्पाद प्रदर्शित किए।
इस मेले का उद्देश्य दिव्यांगजनों की रचनात्मकता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है।
प्रमुख सचिव सुभाष चंद्र शर्मा सहित कई वरिष्ठ अधिकारी इस अवसर पर उपस्थित रहे।
लखनऊ: 29 अक्टूबर 2024: प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण एवं दिव्यांगजन सशक्तीकरण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नरेंद्र कश्यप ने दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग द्वारा आयोजित ‘दिव्य दीपावली मेला-2024’ का सहारागंज मॉल लखनऊ में शुभारंभ किया गया। मंत्री ने मेले में लगे विभिन्न स्टालों का निरीक्षण किया और दिव्यांगजन बच्चों से मिलकर उनका हौसला बढ़ाया।
इस अवसर पर दिव्यांगजन मंत्री ने दिव्यांगजनों के उत्पादों की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस प्रकार के मेलों का आयोजन दिव्यांगजनों को उनके कौशल के लिए एक मंच प्रदान करने में सहायक सिद्ध हो रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह की पहलें समाज में दिव्यांगजनों को मुख्यधारा में शामिल करने और उनके द्वारा निर्मित उत्पादों के प्रति जागरूकता बढ़ाने में भी सहायक होती हैं। मंत्री ने यह भी कहा कि मेले में दिव्यांगजनों के आत्मनिर्भर बनने के प्रयासों का समर्थन करना समाज की जिम्मेदारी है। इस अवसर पर उन्होंने समाज से आग्रह किया कि दिव्यांगजनों द्वारा निर्मित वस्तुओं का उपयोग करें ताकि उन्हें आर्थिक रूप से प्रोत्साहन मिल सके।
दिव्य दीपावली मेला-2024 में दिव्यांगजन द्वारा तैयार की गई वस्तुओं की भव्य प्रदर्शनी रही। यह मेला दिव्यांगजनों के कौशल, सृजनशीलता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया है। लगभग 25 सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं ने इस मेले में अपने स्टाल लगाए, जिनमें रंग-बिरंगे दीपक, फैंसी मोमबत्तियां, कलश, फ्लावर पॉट, रंगोली, आरती की थालियां, तोरण, लटकन, विभिन्न प्रकार की लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां, गोबर व मिट्टी के दीये, जूट के झोले और टेडी वियर जैसी अनेक वस्तुएं प्रदर्शित की गईं। इन वस्त्रों और सजावटी सामान का प्रदर्शन न केवल उनकी रचनात्मकता का प्रमाण है बल्कि उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है।
इस अवसर पर प्रमुख सचिव सुभाष चंद्र शर्मा, निदेशक भूपेंद्र एस. चौधरी और राज्य आयुक्त प्रो. हिमांशु शेखर झा सहित विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।
पंडित गणेश्वर शास्त्री के अनुसार, दीपावली का सर्वोत्तम मुहूर्त 1 नवंबर को है।
पंचांगों और शास्त्रों के अध्ययन से 1 नवंबर की उदया तिथि, प्रदोष काल और अमावस्या का संयोग शुभ।
महालक्ष्मी पूजन का सही समय सूर्यास्त के बाद 24 मिनट तक अमावस्या के संयोग में बताया गया।
पांच प्रमुख पंचांगों में से तीन ने भी 1 नवंबर को दीपावली का सही समय माना है।
इस विशेष योग में स्वाति नक्षत्र और प्रतिपदा भी शामिल, जो पूजन के लिए विशेष शुभ माना गया है।
वाराणसी: श्रीराम मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर का मुहूर्त देने वाले प्रख्यात पंडित गणेश्वर शास्त्री द्राविड़ ने इस साल दीपावली के महालक्ष्मी पूजन का सर्वोत्तम मुहूर्त 1 नवंबर बताया है। पंडित शास्त्री का कहना है कि देशभर से आए 250 से अधिक सवालों के जवाब में उन्होंने दो दिन तक विभिन्न शास्त्रों और पंचांगों का गहन अध्ययन किया। इसके बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि 1 नवंबर की उदया तिथि में प्रदोष काल और सूर्यास्त के बाद अमावस्या का संयोग बन रहा है, जो महालक्ष्मी पूजन के लिए विशेष शुभ माना गया है।
पंडित गणेश्वर शास्त्री ने बताया कि पांच प्रमुख पंचांगों में से तीन ने भी दीपावली का सही दिन 1 नवंबर माना है। शास्त्रों के अनुसार, महालक्ष्मी पूजन सूर्यास्त के तुरंत बाद प्रदोष काल में किया जाना चाहिए, और इसके लिए अमावस्या का सूर्यास्त के बाद कम से कम 24 मिनट तक रहना अनिवार्य है। यह विशेष संयोग 1 नवंबर को उदय तिथि के साथ बन रहा है, जिसमें स्वाति नक्षत्र और प्रतिपदा का शुभ योग भी शामिल है।
इन शास्त्रों और पंचांगों का किया अध्ययन:
पंडित शास्त्री ने बताया कि उन्होंने कृत्यसारसमुच्चय, जयसिंहकल्पद्रुम, शब्दकल्पद्रुम, प्रातिवार्षिक पूजा कथा संग्रह, पर्वनिर्णय और देश के पांच प्रमुख पंचांगों का अध्ययन कर इस निर्णय पर पहुंचे हैं।
पंचांगों के अनुसार 1 नवंबर को ही सही तिथि:
शास्त्री जी के अनुसार, हृषिकेश पंचांग 31 अक्टूबर को दीपावली मनाने की तिथि देता है, लेकिन गणेश आपा पंचांग और म.म. श्रीमद् बापूदेवशास्त्री प्रवर्तित दृक्सिद्ध पंचांग के अनुसार 1 नवंबर को सही तिथि है। इसके साथ श्री वेंकटेश्वर शताब्दी पंचांग भी 1 नवंबर को ही अमावस्या के सही समय का संयोग बनता देख रहा है। इस प्रकार, पंचांगों की गणना के आधार पर 1 नवंबर को ही महालक्ष्मी पूजन का सर्वोत्तम समय है।
महालक्ष्मी पूजन के लिए 1 नवंबर का महत्व:
शास्त्री जी ने सुझाव दिया कि जो लोग सूर्यास्त के बाद 24 मिनट अमावस्या का समय पा सकते हैं, उन्हें 1 नवंबर को महालक्ष्मी पूजन करना चाहिए। वहीं, जिन क्षेत्रों में यह संयोग 31 अक्टूबर को बनता है, वहां उसी दिन पूजन करने का विकल्प भी रहेगा।
• 1863 में मधुसूदन मुखोपाध्याय ने कैसरबाग में कालीबाड़ी मंदिर की स्थापना की।
• मंदिर में माँ काली की मिट्टी से बनी पंचमुण्डी स्वरूप की मूर्ति है।
• पंचमुण्डी स्वरूप तंत्र साधना के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
• दीपावली पर महास्नान के बाद अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।
• नवरात्र में महिषासुर मर्दिनी पाठ और ढाक प्रतियोगिता होती है।
लखनऊ: उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के कैसरबाग स्थित कालीबाड़ी मंदिर, जिसे नगर का सबसे पुराना कालीबाड़ी मंदिर माना जाता है, अपने आप में एक ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर है। इस मंदिर की स्थापना 1863 में बंगाल के रहने वाले साधक मधुसूदन मुखोपाध्याय द्वारा की गई थी। मंदिर का यह ऐतिहासिक सफर, उसकी प्राचीन परंपराओं और मां काली के अनूठे पंचमुण्डी स्वरूप की आराधना के साथ, श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का केंद्र बन गया है।
मंदिर का इतिहास: मधुसूदन मुखोपाध्याय का सपना
मंदिर की स्थापना का किस्सा बेहद दिलचस्प और धार्मिक महत्व से भरा है। मधुसूदन मुखोपाध्याय, जो मूल रूप से बंगाल के निवासी थे, ने इस मंदिर की नींव तब रखी, जब उन्होंने सपने में माँ काली के पंचमुण्डी स्वरूप का दर्शन किया। कहा जाता है कि सपना देखने के बाद उन्होंने माँ के आदेशानुसार मिट्टी से मूर्ति बनाई और 1863 में कैसरबाग के घसियारी मंडी इलाके में उसकी प्राण प्रतिष्ठा की।
मूर्ति की सबसे खास बात यह है कि यह पूरी तरह से मिट्टी की बनी हुई है और 161 साल बाद भी वैसी ही स्थिति में है। इस मूर्ति का स्वरूप पंचमुण्डी है, जिसमें माँ काली पाँच मुंडों की आधारशिला पर स्थापित हैं। पंचमुण्डी स्वरूप के तहत यहाँ पाँच जीवों—मानव, वानर, पक्षी (बादर), उल्लू, और सियार—के मुंडों का आधार है, जो देवी के तांत्रिक स्वरूप की अनूठी विशेषता को दर्शाता है।
माँ काली के पंचमुण्डी स्वरूप का महत्व
पंचमुण्डी आसन माँ काली के तांत्रिक स्वरूप का प्रतीक है। तंत्र साधना में माँ के इस स्वरूप की पूजा विशेष महत्व रखती है, जिसे आमतौर पर बंगाली परंपरा के लोग करते हैं। तंत्र साधना में, पंचमुण्डी आसन को ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। कहा जाता है कि देवी के इस स्वरूप के माध्यम से साधक तांत्रिक अनुष्ठानों को संपन्न करते हैं, जिसमें पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) का प्रतिनिधित्व भी सम्मिलित होता है। उत्तर प्रदेश में इस प्रकार का पंचमुण्डी आसन पर स्थापित देवी की मूर्ति अपने आप में एकमात्र अनूठी मूर्ति मानी जाती है।
पूजा विधि और विशेष अनुष्ठान
कालीबाड़ी मंदिर के पुजारी डॉ. अमित गोस्वामी जी पिछले 21 वर्षों से यहाँ नियमित पूजा-अर्चना कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मंदिर में माँ काली की पूजा खासतौर से दीपावली के अवसर पर विशेष महत्व रखती है। बंगाली मूल के लोग इस दिन को काली पूजा के रूप में मनाते हैं। इस अवसर पर पंचमुण्डी स्वरूप की मूर्ति का महास्नान (सात समुद्र के जल, 10 प्रकार के तेल और मिट्टी से स्नान) कराया जाता है।
इसके बाद, विशेष प्रकार की पूजा विधि का आयोजन होता है, जिसमें पंच उपचार, दस उपचार और 16 उपचार शामिल होते हैं। पूजा के दौरान, अन्नकूट का विशेष भोग लगाया जाता है, जिसे ‘महाप्रसाद’ के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि इस महाप्रसाद को ग्रहण करने वाले भक्तों के जीवन में कभी भी अन्न की कमी नहीं होती है।
नवरात्रि और अन्य उत्सव
कालीबाड़ी मंदिर में शारदीय नवरात्रि के दौरान महिषासुर मर्दिनी का विशेष अनुष्ठान होता है, जिसमें माँ दुर्गा की महिषासुर का वध करने की कथा का विशेष आयोजन होता है। इसके साथ ही, ढाक प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है, जिसमें ढाक वादकों की प्रतियोगिता होती है, जो इस पूजा को और भी रंगीन बना देती है। इस आयोजन में शहर भर के भक्त उत्साहपूर्वक हिस्सा लेते हैं और इस परंपरा को जीवंत बनाए रखते हैं।
कालीबाड़ी मंदिर का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
लखनऊ का कालीबाड़ी मंदिर धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान है। यहाँ की पूजा पद्धति और अनुष्ठान बंगाली परंपराओं से गहरे जुड़े हुए हैं। यहाँ की मिट्टी की मूर्ति और पंचमुण्डी स्वरूप का विशेष महत्व, तंत्र साधना के महत्व को दर्शाता है। यह स्थान न केवल बंगाली समाज के लिए, बल्कि तंत्र साधना में विश्वास रखने वाले साधकों के लिए भी एक तीर्थस्थल के रूप में प्रसिद्ध है। कालीबाड़ी मंदिर का यह इतिहास और उसकी पूजा विधि एक समृद्ध परंपरा का प्रतीक है, जो न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अद्वितीय है। यहां का हर त्योहार, हर अनुष्ठान, और हर पूजा विधि भक्तों के मन में श्रद्धा और आस्था की भावना को प्रज्वलित करती है।
धनतेरस का त्योहार धन, समृद्धि और आरोग्य की कामना से मनाया जाता है और यह दिवाली का पहला दिन होता है।
इस दिन सोने-चांदी की खरीदारी, लक्ष्मी पूजन, और दीप जलाना जैसे रिवाज निभाए जाते हैं।
समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत और आयुर्वेद के ज्ञान के साथ प्रकट हुए थे।
घर की सफाई, दान, और रंगोली बनाना इस दिन की प्रमुख परंपराएं हैं।
इस दिन सोना, चांदी, वाहन, और बर्तन खरीदना विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
लखनऊ: धनतेरस, जिसे ‘धन त्रयोदशी’ भी कहा जाता है, हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है, जो दिवाली से ठीक दो दिन पहले मनाया जाता है। इसे कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को मनाया जाता है। ‘धन’ का अर्थ है संपत्ति और ‘तेरस’ का मतलब तेरहवीं तिथि, जिससे यह नाम बना है। इस दिन को शुभ माना जाता है, विशेषकर धन, समृद्धि और स्वास्थ्य के क्षेत्र में।
धनतेरस का पर्व दो विशेष घटनाओं से जुड़ा है। सबसे पहले, समुद्र मंथन की कथा, जिसमें भगवान धन्वंतरि, जो स्वास्थ्य और आरोग्य के देवता हैं, अमृत कलश और आयुर्वेद के ज्ञान के साथ प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि का प्रकट होना हमें यह संदेश देता है कि धन और स्वास्थ्य दोनों ही मानव जीवन के महत्वपूर्ण पहलू हैं। दूसरी कथा राजा हेम की है, जिनके पुत्र की अकाल मृत्यु का योग था। कथा के अनुसार, राजा हेम के पुत्र को बचाने के लिए उनकी पत्नी ने दीपक जलाए और कीमती गहने रखे, जिससे मृत्यु के देवता यमराज का ध्यान भटक गया और उनके पुत्र की मृत्यु नहीं हुई।
इस प्रकार, धनतेरस का पर्व उन परंपराओं और विश्वासों का प्रतीक है, जिनसे जुड़े धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को आज भी लोग मानते हैं।
धनतेरस की परंपराएं और रीति-रिवाज
धनतेरस का पर्व भारतीय समाज में कई परंपराओं और रिवाजों से जुड़ा हुआ है, जो इस दिन को विशेष बनाते हैं। इस दिन का महत्व और इसकी खासियत नीचे विस्तार से दी गई है:
1. धन और आभूषण की खरीदारी
इस दिन सोना, चांदी, बर्तन और नए कपड़े खरीदना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तुएं घर में सकारात्मकता और समृद्धि लेकर आती हैं। विशेष रूप से, सोना और चांदी जैसी वस्तुओं को मां लक्ष्मी की कृपा का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा, लोग इलेक्ट्रॉनिक आइटम, वाहन, और अन्य कीमती सामान भी खरीदते हैं ताकि उनके घर में सुख-समृद्धि बढ़े।
2. लक्ष्मी पूजा और दीप जलाना
इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है, ताकि घर में धन-धान्य का वास हो और कभी किसी चीज की कमी न हो। घर के मुख्य द्वार पर दीप जलाना और रातभर इसे जलाए रखना भी शुभ माना जाता है। दीप जलाने की परंपरा का महत्व यह है कि यह घर के वातावरण को पवित्र और सकारात्मक बनाता है और बुरी शक्तियों को दूर रखता है।
3. भगवान धन्वंतरि की पूजा
स्वास्थ्य और आरोग्य के देवता, भगवान धन्वंतरि की पूजा धनतेरस का मुख्य आकर्षण है। धन्वंतरि जयंती पर लोग स्वास्थ्य और आरोग्य की कामना करते हैं, ताकि उनका परिवार हमेशा खुशहाल और निरोग रहे। इस दिन आयुर्वेद के महत्व को भी समझा जाता है, और लोग अपने स्वास्थ्य की देखभाल के लिए संकल्प लेते हैं।
4. यम दीपदान
धनतेरस पर यम दीपदान की परंपरा भी है, जो विशेष रूप से मृत्यु के देवता यमराज से जुड़ी है। इस दिन रात को एक दीपक जलाकर घर के बाहर दक्षिण दिशा में रखा जाता है। यह दीपक अकाल मृत्यु के भय को दूर करने के लिए जलाया जाता है और मान्यता है कि इससे परिवार के सदस्यों पर यमराज की कृपा बनी रहती है।
5. घर की सजावट और रंगोली
इस दिन घरों को साफ-सुथरा करके उन्हें रंग-बिरंगे रंगोली से सजाया जाता है। मुख्य द्वार पर रंगोली बनाना और उसे फूलों, दीयों और आभूषणों से सजाना मां लक्ष्मी के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। रंगोली की रंगीन सजावट सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है और घर में शांति का वातावरण बनाती है।
धनतेरस के दिन करने योग्य कार्य
धनतेरस का दिन सिर्फ पूजा-पाठ और खरीदारी के लिए नहीं है, बल्कि इस दिन कुछ विशेष कार्य करने से भी अत्यधिक लाभ मिलता है। आइए जानें इस दिन कौन-कौन से कार्य करना शुभ माना जाता है:
1. सफाई और सजावट
धनतेरस के दिन अपने घर की सफाई करना और उसे सजाना विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। लोग इस दिन घर के हर कोने को साफ करते हैं और उसे दीपों और रंगोलियों से सजाते हैं ताकि मां लक्ष्मी का वास हो।
2. धन और आभूषण की खरीदारी
इस दिन सोना, चांदी, वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स या बर्तन खरीदना बहुत शुभ माना जाता है। यह मान्यता है कि इस दिन की गई खरीदारी से आने वाले पूरे वर्ष में आर्थिक स्थिति में स्थिरता और वृद्धि होती है। खासतौर पर सोना-चांदी की खरीदारी समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।
3. लक्ष्मी पूजा और दीप जलाना
मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। लक्ष्मी पूजन के दौरान खासतौर पर दीप जलाना आवश्यक माना जाता है, जिससे नकारात्मकता दूर होती है और घर में सुख-शांति आती है।
4. यम दीपदान
अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति पाने के लिए यमराज को दीपदान करना आवश्यक है। इसे यमराज के प्रति सम्मान और आभार के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यह दीपदान घर के बाहर दक्षिण दिशा में रखा जाता है ताकि यमराज का आशीर्वाद प्राप्त हो।
5. दान और पुण्य कार्य
इस दिन जरूरतमंदों को दान करना और उन्हें भोजन, कपड़े और अन्य आवश्यक वस्तुएं देना बहुत शुभ माना जाता है। इससे पुण्य मिलता है और घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है। इस दिन गायों को भी अन्न खिलाना और पक्षियों को पानी देना पुण्य कार्य माने जाते हैं।
धनतेरस का पर्व सिर्फ आर्थिक समृद्धि की कामना के लिए नहीं बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को भी दर्शाता है। यह पर्व हमें धन, समृद्धि और स्वास्थ्य का महत्व सिखाता है और हमें सकारात्मकता के साथ अपने घर और जीवन में खुशियों का स्वागत करने के लिए प्रेरित करता है। धनतेरस की खरीदारी, पूजा-पाठ, दीपदान और दान-पुण्य के जरिए लोग न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने का प्रयास करते हैं बल्कि अपने जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करते हैं।
ग्रीन एनर्जी के लिए बड़ा कदम: विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने सरोजनीनगर में 124 सोलर लाइटें लगवाईं, कार्यकर्ताओं को दीवाली पर खास तोहफा।
सौर ऊर्जा का प्रसार: सरोजनीनगर क्षेत्र में 1,000 से अधिक सोलर लाइटें लगाकर जनता को सौर ऊर्जा के लाभ से जोड़ा।
ताराशक्ति केन्द्रों पर इको-फ्रेंडली बैग्स: 135 केन्द्रों पर 20,000 से अधिक बैग्स बनाए, बच्चों को पर्यावरण सुरक्षा के लिए प्रोत्साहित किया।
लखनऊ सोलर सिटी प्रोजेक्ट में योगदान: सरोजनीनगर में 40 मेगावाट सोलर ऊर्जा का उत्पादन, लखनऊ में 100 मेगावाट का बड़ा हिस्सा।
वृक्षारोपण अभियान: सावन में 200 से अधिक रुद्राक्ष के पौधे रोपे, पर्यावरण संरक्षण के लिए लगातार प्रयास।
लखनऊ: सरोजनीनगर विधानसभा क्षेत्र को मॉडल सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं और बूथ अध्यक्षों के सुझावों पर 124 सोलर लाइटें लगवाई हैं। डॉ. सिंह ने सोमवार को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर इस पहल की जानकारी दी। यह ग्रीन एनर्जी को प्रोत्साहित करने वाली योजना सरोजनीनगर के विभिन्न मंडलों के भाजपा बूथ अध्यक्षों के सहयोग से लागू की गई है, जिसमें आम जनता के समग्र विकास और संगठन को एक विशेष महत्व दिया गया है।
डॉ. सिंह लंबे समय से अपने क्षेत्र में ग्रीन एनर्जी के प्रसार के लिए कार्य कर रहे हैं। उन्होंने विभिन्न योजनाओं और निधियों के माध्यम से अब तक 1,000 से अधिक सोलर लाइटें स्थापित की हैं। इसके अलावा, उन्होंने क्षेत्रीय जनता को सौर ऊर्जा के प्रति जागरूक करने के लिए कई अभियान भी चलाए हैं। इसी क्रम में सरोजनीनगर में सृजित 40 मेगावाट सोलर ऊर्जा लखनऊ में संचालित 100 मेगावाट सोलर ऊर्जा का प्रमुख हिस्सा है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, विधायक ने सरोजनीनगर में 135 ताराशक्ति केन्द्र स्थापित किए हैं, जहां पर इको-फ्रेंडली बैग्स का निर्माण किया जा रहा है। अब तक इन केंद्रों से बने 20,000 बैग्स में से 13,000 बैग्स प्राइमरी स्कूल के बच्चों को वितरित किए गए हैं। इसके साथ ही सावन महीने में 200 से अधिक रुद्राक्ष के पौधे रोपकर उन्होंने वृक्षारोपण अभियान को गति दी है।
सरोजनीनगर में विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह की पर्यावरण के प्रति समर्पण और ग्रीन एनर्जी के प्रसार की यह पहल अन्य विधानसभा क्षेत्रों के लिए एक मिसाल बन सकती है। उनके द्वारा क्षेत्रीय विकास, ऊर्जा बचत, और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों से आम जनता में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, जो सरोजनीनगर को एक ग्रीन मॉडल सिटी बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।