
लखनऊ। राजधानी लखनऊ में महिला सुरक्षा और पुलिस की कार्यशैली से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मामला सामने आया है। विभूतिखंड थाने में एक युवती के साथ कथित मारपीट और जान से मारने की धमकी के आरोप में FIR दर्ज होने के बावजूद पीड़िता ने पुलिस पर ही गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पीड़िता का आरोप है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ उसने गंभीर आरोप लगाए और जिसके खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया, उसके खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई करने के बजाय पुलिस कथित रूप से उसी के प्रति नरमी बरत रही है।
पीड़िता ने आरोप लगाया है कि पुलिस आरोपी प्रेम कुमार सिंह उर्फ विपिन के साथ उठ-बैठ रही है, उसके साथ चाय पी रही है और उसे वह कार्रवाई नहीं झेलनी पड़ रही है जिसकी एक गंभीर आपराधिक शिकायत के बाद उम्मीद की जाती है।
यदि पीड़िता द्वारा लगाए गए ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो मामला केवल एक महिला के साथ कथित हिंसा का नहीं रहेगा, बल्कि पुलिस की निष्पक्षता, आरोपी को कथित संरक्षण और महिला की शिकायत को नजरअंदाज किए जाने का भी गंभीर मामला बन सकता है।
19 जुलाई 2026 को दर्ज हुई FIR, BNS की दो गंभीर धाराओं में मुकदमा
उपलब्ध FIR की प्रति के अनुसार मामला थाना विभूतिखंड, कमिश्नरेट लखनऊ का है। FIR संख्या 0247 दिनांक 19 जुलाई 2026 को दर्ज की गई। FIR में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115(2) और 351(3) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
पुलिस दस्तावेज में मामले की जांच SI गौरव कुमार को सौंपी गई है। FIR में आरोपी के तौर पर प्रेम कुमार सिंह उर्फ विपिन का नाम दर्ज है। पीड़िता ने SI गौरव के खिलाफ भी आरोपी से मिलीभगत के गंभीर आरोप लगाए हैं।
दस्तावेज के मुताबिक पुलिस को घटना की सूचना 19 जुलाई 2026 को रात 8:29 बजे मिली और उसी समय से संबंधित जनरल डायरी प्रविष्टि भी दर्ज की गई।
यानी यह कोई केवल मौखिक शिकायत या सोशल मीडिया पर लगाया गया आरोप नहीं है, बल्कि पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज FIR के रूप में मामला आधिकारिक रूप से दर्ज है।
मां तक पहुंची बेटी की परेशानी, सामने आया रिश्ते के भीतर कथित हिंसा का मामला
FIR में दर्ज तहरीर के अनुसार शिकायतकर्ता ने अपनी बेटी से संबंधित गंभीर आरोप पुलिस के सामने रखे हैं। दस्तावेज में बताया गया है कि युवती आरोपी प्रेम कुमार सिंह उर्फ विपिन के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही थी।
शिकायत के अनुसार युवती ने अपनी मां को फोन कर अपनी स्थिति बताई और आरोप लगाया कि उसके साथ मारपीट की जा रही है तथा उसे जान से मारने की धमकी दी जा रही है।
यहां मामला इसलिए संवेदनशील हो जाता है क्योंकि कथित हिंसा किसी सार्वजनिक विवाद में नहीं, बल्कि एक निजी रिश्ते के भीतर होने का आरोप है। ऐसे मामलों में पीड़िता कई बार परिवार, समाज और आरोपी के दबाव के बीच अपनी बात सामने नहीं रख पाती।
यही कारण है कि जब किसी महिला की ओर से घरेलू अथवा निजी रिश्ते के भीतर हिंसा और धमकी की शिकायत सामने आती है तो उसकी सुरक्षा और स्वतंत्र इच्छा को प्राथमिकता देना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
FIR के बाद पीड़िता ने पुलिस पर ही लगाए गंभीर आरोप
मामले में सबसे गंभीर और चिंताजनक पहलू FIR से आगे सामने आया है।
पीड़िता का आरोप है कि पुलिस आरोपी के खिलाफ यथोचित कार्रवाई नहीं कर रही है। इसके विपरीत उसका आरोप है कि पुलिस का व्यवहार आरोपी के प्रति बेहद नरम है और पुलिसकर्मी कथित तौर पर आरोपी के साथ उठ-बैठ रहे हैं तथा उसके साथ चाय पी रहे हैं। जोकि सामान्य आरोप नहीं है।
अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ महिला से मारपीट और जान से मारने की धमकी जैसे आरोपों में FIR दर्ज है और उसी मामले की पीड़िता यह आरोप लगाए कि पुलिस आरोपी के साथ सामान्य से भी अधिक घनिष्ठ व्यवहार कर रही है, तो इस आरोप की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।
क्योंकि यदि पुलिस और आरोपी के बीच कथित नजदीकी की बात गलत है तो पुलिस के पास तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अधिकार है। लेकिन यदि जांच में पीड़िता के आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक दर्ज मुकदमे के आरोपी के साथ पुलिस का ऐसा व्यवहार क्यों था?
क्या आरोपी को पुलिस से मिल रहा है कथित संरक्षण?
पीड़िता के आरोपों का सबसे गंभीर हिस्सा यही है। एक तरफ FIR में आरोपी के खिलाफ मारपीट और गंभीर धमकी के आरोप दर्ज हैं, दूसरी तरफ पीड़िता पुलिस की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या आरोपी के खिलाफ जांच उतनी ही निष्पक्षता से आगे बढ़ रही है जितनी किसी अन्य आरोपी के मामले में बढ़नी चाहिए?
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सिर्फ FIR दर्ज होने से कोई व्यक्ति दोषी साबित नहीं हो जाता और गिरफ्तारी भी हर मामले में स्वतः अनिवार्य नहीं होती। आरोपी के खिलाफ कार्रवाई कानून और जांच में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए।
लेकिन दूसरी तरफ, अगर पीड़िता लगातार यह शिकायत कर रही है कि उसे खतरा है और पुलिस आरोपी के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर रही, तो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा मामले की निगरानी और पीड़िता की सुरक्षा का स्वतंत्र मूल्यांकन बेहद जरूरी हो जाता है।
‘चाय पीने’ का आरोप क्यों बना गंभीर सवाल?
पहली नजर में किसी पुलिसकर्मी के किसी व्यक्ति से बातचीत करना या चाय पीना अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन किसी दर्ज आपराधिक मामले के आरोपी और जांच कर रही पुलिस के बीच कथित नजदीकी को लेकर पीड़िता सवाल उठा रही हो, तो उस व्यवहार की परिस्थितियों को जांचना जरूरी हो जाता है।
मसलन-
- आरोपी से पुलिसकर्मी की मुलाकात कब और कहां हुई?
- मुलाकात किस उद्देश्य से हुई?
- क्या उस समय आरोपी से पूछताछ या जांच संबंधी कोई प्रक्रिया चल रही थी?
- क्या कोई अन्य पुलिसकर्मी या स्वतंत्र व्यक्ति वहां मौजूद था?
- क्या आरोपी को थाने अथवा अन्य स्थान पर बुलाया गया था?
- क्या पीड़िता की शिकायत के बावजूद आरोपी के साथ पुलिस का असामान्य व्यवहार हुआ?
- क्या जांच अधिकारी को इस संपर्क की जानकारी थी?
इन सवालों का जवाब वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।
महिला सुरक्षा का असली सवाल: पीड़िता खुद पुलिस पर भरोसा क्यों नहीं कर पा रही?
महिला सुरक्षा का अर्थ केवल मुकदमा दर्ज करना नहीं है। जब कोई महिला पुलिस के पास जाती है तो उसे उम्मीद होती है कि पुलिस उसकी बात सुनेगी, उसे सुरक्षित महसूस कराएगी और यदि उसके साथ अपराध हुआ है तो निष्पक्ष तरीके से कार्रवाई करेगी। लेकिन इस मामले में पीड़िता खुद पुलिस की भूमिका पर सवाल उठा रही है।
यह स्थिति इसलिए गंभीर है क्योंकि अगर किसी महिला को कथित हिंसा के बाद आरोपी से खतरे के साथ-साथ पुलिस की निष्पक्षता पर भी संदेह होने लगे, तो उसके लिए न्याय की प्रक्रिया और भी कठिन हो सकती है।
ऐसे में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी सिर्फ आरोपी के खिलाफ जांच तक सीमित नहीं रह जाती। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पीड़िता को किसी दबाव, धमकी या प्रतिशोध का सामना न करना पड़े और वह स्वतंत्र रूप से अपना पक्ष रख सके।
पुलिस की जांच में इन सवालों का जवाब मिलना बेहद जरूरी
इस पूरे मामले में अब जांच केवल FIR में लगाए गए आरोपों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि पीड़िता ने पुलिस पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं तो उन आरोपों की भी जांच आवश्यक है।
जांच में यह देखा जा सकता है कि-
1. युवती के साथ कथित मारपीट कब-कब हुई?
क्या यह एक घटना थी या कथित तौर पर लंबे समय से ऐसा हो रहा था?
2. चोटों के कोई चिकित्सकीय साक्ष्य हैं या नहीं?
यदि चोट लगी थी तो मेडिकल परीक्षण और उसकी रिपोर्ट महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती है।
3. फोन कॉल और डिजिटल साक्ष्य क्या कहते हैं?
पीड़िता, आरोपी और परिवार के बीच हुई बातचीत, मैसेज, रिकॉर्डिंग अथवा अन्य उपलब्ध डिजिटल साक्ष्य मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
4. घटनास्थल के CCTV फुटेज की जांच हुई या नहीं?
यदि कथित घटना किसी ऐसे स्थान पर हुई जहां CCTV कैमरे मौजूद हैं तो फुटेज महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है।
5. पड़ोसियों अथवा प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए गए या नहीं?
6. आरोपी ने पीड़िता को कथित तौर पर धमकी क्यों दी और किस परिस्थिति में दी?
7. सबसे महत्वपूर्ण-पीड़िता द्वारा पुलिस पर लगाए गए आरोपों की जांच कौन करेगा?
वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में जांच क्यों जरूरी?
जब किसी FIR के आरोपी के खिलाफ कार्रवाई को लेकर पीड़िता स्वयं स्थानीय पुलिस पर सवाल उठाती है, तो निष्पक्षता का भरोसा कायम करने के लिए मामले की निगरानी किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा किया जाना महत्वपूर्ण हो जाता है।
ऐसे में लखनऊ पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को चाहिए कि वे पीड़िता की शिकायत को गंभीरता से लें और FIR की जांच, आरोपी के साथ पुलिस के कथित संपर्क और पीड़िता की सुरक्षा-तीनों पहलुओं की अलग-अलग समीक्षा करें।
यदि पुलिस पर लगाए गए आरोप निराधार हैं तो तथ्य सामने आ जाएंगे।
और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार पुलिसकर्मियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
अब सवाल सिर्फ आरोपी से नहीं, पुलिस से भी
इस पूरे मामले में अब कई सवाल लखनऊ पुलिस के सामने हैं-
- क्या आरोपी प्रेम कुमार सिंह उर्फ विपिन के खिलाफ FIR के बाद नियमानुसार कार्रवाई हुई?
- क्या पीड़िता की सुरक्षा का स्वतंत्र आकलन किया गया?
- क्या पीड़िता द्वारा पुलिस पर लगाए गए गंभीर आरोपों की जांच की गई?
- क्या पुलिस और आरोपी के बीच कथित नजदीकी की जांच होगी?
- क्या मामले की जांच वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में कराई जाएगी?
और सबसे महत्वपूर्ण-
अगर जांच में यह सामने आता है कि आरोपी को पुलिसकर्मियों की ओर से किसी तरह का अनुचित संरक्षण या विशेष सुविधा दी गई, तो क्या संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी विभागीय और कानूनी कार्रवाई होगी?
अब देखना यह है-आरोपी पर कार्रवाई या पुलिस की कथित मेहरबानी?
इस मामले में अब निगाहें लखनऊ पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों पर हैं।
एक तरफ पुलिस रिकॉर्ड में FIR मौजूद है। दूसरी तरफ महिला सुरक्षा से जुड़े गंभीर आरोप हैं। तीसरी तरफ पीड़िता स्वयं पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठा रही है।
ऐसे में यह मामला केवल ‘आरोपी गिरफ्तार हुआ या नहीं’ तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
जरूरी यह है कि पीड़िता को यह भरोसा मिले कि पुलिस आरोपी के पक्ष में नहीं, कानून के पक्ष में खड़ी है।
यदि आरोपी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य हैं तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि पीड़िता के आरोपों में तथ्य हैं तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। और यदि पुलिसकर्मियों पर लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो उनकी जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।
True News UP इस मामले में किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं कर रहा है। आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगी। लेकिन एक महिला द्वारा पुलिस की कार्यशैली पर लगाए गए गंभीर आरोपों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या इस खबर के बाद लखनऊ पुलिस पीड़िता की शिकायत को गंभीरता से लेकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएगी, आरोपी के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई करेगी और पुलिस पर लगे आरोपों की भी जांच कराएगी?
क्योंकि महिला सुरक्षा का भरोसा तभी कायम रहेगा, जब पीड़िता को यह महसूस हो कि कानून की ताकत उसके साथ है—और किसी आरोपी को पुलिस की कथित नजदीकी का सहारा नहीं।
नोट: इस रिपोर्ट में आरोपी के संबंध में लिखी गई बातें FIR में दर्ज आरोपों और पीड़िता द्वारा लगाए गए आरोपों पर आधारित हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस समय नहीं हुई है। आरोपी का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।


































