
लखनऊ। उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ की सरोजनी नगर विधानसभा से भाजपा विधायक सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र लिखकर भारत में एक व्यापक ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ लाने का आग्रह किया है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य लापरवाही अथवा अन्य नागरिक क्षति से प्रभावित लोगों को समयबद्ध, प्रभावी और उचित क्षतिपूर्ति उपलब्ध कराने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था तैयार करना है।
डॉ. राजेश्वर सिंह का कहना है कि भारत ने हाल के वर्षों में आपराधिक न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। अब नागरिक क्षति और उसके मुआवजे से जुड़े कानूनों को भी आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप व्यवस्थित करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा, “भारत ने दंड देने वाले कानून को आधुनिक बनाया है। अब समय है कि क्षति की भरपाई करने वाले कानून को भी आधुनिक बनाया जाए।”
नए आपराधिक कानूनों के बाद नागरिक क्षतिपूर्ति कानून में सुधार की जरूरत
डॉ. सिंह ने अपने पत्र में कहा है कि औपनिवेशिक दौर के आपराधिक कानूनों के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) लागू किए जाने के बाद अब नागरिकों को होने वाली क्षति और उसकी भरपाई से संबंधित कानूनी ढांचे पर भी व्यापक विचार किया जाना चाहिए।
उनके अनुसार, किसी दोषी को दंडित करना न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन जिस व्यक्ति को नुकसान हुआ है, उसके जीवन और अधिकारों की यथासंभव पुनर्स्थापना भी न्याय का महत्वपूर्ण पक्ष है।
सात दशकों से व्यापक कानून की आवश्यकता
डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने पत्र में भारत में सिविल रॉन्ग्स और क्षतिपूर्ति से जुड़े व्यापक कानून के इतिहास का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार, प्रथम विधि आयोग ने वर्ष 1956 में अपनी पहली रिपोर्ट में राज्य के दायित्व से संबंधित कानून बनाए जाने की सिफारिश की थी।
इसके बाद 1965 और 1967 में इस दिशा में विधेयक भी सामने आए, लेकिन वे कानून का रूप नहीं ले सके। परिणामस्वरूप आज भी भारत में नागरिक क्षति से संबंधित विभिन्न मामलों के लिए अलग-अलग कानूनी प्रावधानों और न्यायिक सिद्धांतों पर निर्भरता बनी हुई है।
डॉ. सिंह ने विशेष रूप से गलत तरीके से हुई मृत्यु से संबंधित दावों के लिए Fatal Accidents Act, 1855 के अस्तित्व का उल्लेख करते हुए नागरिक क्षतिपूर्ति कानून को आधुनिक बनाने की आवश्यकता बताई है।
सड़क दुर्घटनाओं से लेकर डेटा ब्रीच तक के मामलों को शामिल करने का प्रस्ताव
प्रस्तावित ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ के दायरे में आधुनिक समय में सामने आने वाली विभिन्न प्रकार की नागरिक क्षतियों को शामिल किया जा सकता है।
डॉ. सिंह ने चिकित्सा लापरवाही, खराब सड़क या भवन निर्माण, औद्योगिक दुर्घटनाओं, डीपफेक, डेटा ब्रीच, साइबर क्षति तथा पुलिस की ज्यादती जैसे मामलों के लिए स्पष्ट क्षतिपूर्ति व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया है।
भारत में सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा इस समस्या की गंभीरता को रेखांकित करता है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की Road Accidents in India–2023 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में देश में 4,80,583 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 1,72,890 लोगों की मौत हुई और 4,62,825 लोग घायल हुए।
ऐसे मामलों में जहां दुर्घटना के पीछे किसी सार्वजनिक एजेंसी, ठेकेदार अथवा अन्य संस्था की लापरवाही का आरोप हो, पीड़ितों के लिए जवाबदेही और क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है।
आम नागरिक को पांच सवालों का स्पष्ट जवाब देने वाली व्यवस्था
डॉ. राजेश्वर सिंह ने प्रस्तावित संहिता के माध्यम से आम नागरिक के लिए क्षतिपूर्ति प्रक्रिया को सरल और स्पष्ट बनाने की बात कही है।
उनके अनुसार कानून में कम से कम इन पांच सवालों का स्पष्ट उत्तर होना चाहिए-
- किसके विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा किया जा सकता है?
- दावा किस प्राधिकरण या न्यायिक मंच के समक्ष किया जाएगा?
- दावा कितने समय के भीतर दाखिल करना होगा?
- कितनी क्षतिपूर्ति का दावा किया जा सकता है?
- अंतिम निर्णय आने तक अंतरिम राहत की क्या व्यवस्था होगी?
इससे नागरिकों को अपनी क्षति के मामले में उपलब्ध कानूनी उपायों की स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी और क्षतिपूर्ति प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित किया जा सकेगा।
प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ाने पर जोर
डॉ. सिंह ने सरकारी विभागों और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़े प्रावधानों पर भी जोर दिया है। प्रस्ताव के अनुसार, संबंधित विभागों को नागरिकों द्वारा किए गए क्षतिपूर्ति दावों पर निर्धारित समयसीमा में जवाब देना अनिवार्य किया जा सकता है।
साथ ही, ईमानदारी और सद्भावना से लिए गए प्रशासनिक निर्णयों के लिए अधिकारियों को आवश्यक संरक्षण दिया जा सकता है, जबकि दुर्भावना या घोर लापरवाही साबित होने की स्थिति में संबंधित अधिकारी से क्षतिपूर्ति की वसूली जैसे प्रावधानों पर विचार किया जा सकता है।
इस संदर्भ में डॉ. सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के LDA v. M.K. Gupta मामले में स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख किया है। सुप्रीम कोर्ट के बाद के निर्णयों में भी इस मामले को सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा अनुचित तरीके से अधिकारों को प्रभावित किए जाने पर क्षतिपूर्ति के सिद्धांत के संदर्भ में उद्धृत किया गया है।
दावों का वार्षिक डेटा सार्वजनिक करने का सुझाव
प्रस्ताव में सरकारी विभागों और संबंधित संस्थाओं द्वारा प्राप्त क्षतिपूर्ति दावों का वार्षिक डेटा प्रकाशित करने की व्यवस्था पर भी विचार करने का सुझाव दिया गया है।
इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किन विभागों या क्षेत्रों में बार-बार एक जैसी शिकायतें और नागरिक क्षति के मामले सामने आ रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर प्रशासनिक कमियों की पहचान कर उनमें सुधार किया जा सकता है।
झूठे दावों से सुरक्षा और मध्यस्थता की व्यवस्था
डॉ. राजेश्वर सिंह ने प्रस्तावित कानून में नागरिकों के अधिकारों के साथ-साथ संस्थाओं और अधिकारियों के लिए आवश्यक सुरक्षा उपायों की जरूरत भी बताई है।
प्रस्ताव में झूठे एवं निराधार दावों के विरुद्ध सुरक्षा, सद्भावना से लिए गए निर्णयों का संरक्षण, किफायती ऑनलाइन विवाद समाधान व्यवस्था तथा मुकदमेबाजी से पहले मध्यस्थता जैसे प्रावधानों पर विचार करने की बात कही गई है।
इससे एक ओर वास्तविक पीड़ितों को समयबद्ध राहत देने का प्रयास किया जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर कानून के दुरुपयोग की संभावनाओं को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा व्यवस्था भी बनाई जा सकती है।
भारतीय विधि आयोग से समयबद्ध रिपोर्ट की मांग
डॉ. राजेश्वर सिंह ने केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री से इस महत्वपूर्ण विषय को भारतीय विधि आयोग के समक्ष भेजने और समयबद्ध रिपोर्ट प्राप्त करने का आग्रह किया है।
उन्होंने इसके बाद विशेषज्ञों की समिति गठित कर कानूनी विशेषज्ञों, न्यायविदों, प्रशासनिक अधिकारियों, उद्योग जगत, नागरिक संगठनों और आम नागरिकों के साथ व्यापक राष्ट्रव्यापी परामर्श की प्रक्रिया शुरू करने का सुझाव दिया है।
“क्षतिपूर्ति भी न्याय का हिस्सा है”
डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल दोषी को दंडित करना नहीं होना चाहिए, बल्कि जिस व्यक्ति को नुकसान हुआ है, उसके अधिकारों और जीवन की यथासंभव पुनर्स्थापना भी न्याय का हिस्सा है।
उन्होंने कहा, “जहां क्षति हुई है, वहां न्याय का अर्थ केवल निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि पीड़ित को यथासंभव पुनर्स्थापित करना भी होना चाहिए।”
प्रस्तावित ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ के माध्यम से नागरिक क्षति, जवाबदेही और मुआवजे से जुड़े प्रावधानों को एक व्यापक कानूनी ढांचे में लाने की दिशा में पहल का सुझाव दिया गया है।


































