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विश्व घड़ियाल दिवस 2026: कभी विलुप्ति के कगार पर था घड़ियाल, आज अमेरिका-जापान तक पहुंचा यूपी का संरक्षण मॉडल ; कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र बना दुनिया के लिए मिसाल, हर साल बढ़ रहे 140 से 160 नए घड़ियाल

लखनऊ : एक समय ऐसा था जब भारत की नदियों से घड़ियालों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा था और उनकी संख्या महज कुछ सौ तक सिमट गई थी। लेकिन आज उत्तर प्रदेश का कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र न केवल देश बल्कि पूरी दुनिया के लिए वन्यजीव संरक्षण का सफल मॉडल बन चुका है। यहां पले-बढ़े घड़ियाल अमेरिका के न्यूयॉर्क, जापान, भूटान और पाकिस्तान तक पहुंच चुके हैं और वन्यजीव प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

विश्व घड़ियाल दिवस (17 जून) के अवसर पर उत्तर प्रदेश का यह संरक्षण अभियान एक ऐसी प्रेरक कहानी प्रस्तुत करता है, जिसने विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके जीव को नया जीवन देने का काम किया है। यही वजह है कि नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी ने कुकरैल परियोजना को “Most Successful Conservation Project in India” की श्रेणी में शामिल किया है।

जब पूरे देश में बचे थे केवल 250 से 300 घड़ियाल

वर्ष 1970 में हुए सर्वेक्षण ने वन्यजीव विशेषज्ञों को चिंतित कर दिया था। उस समय पूरे भारत में घड़ियालों की संख्या घटकर मात्र 250 से 300 रह गई थी। नदियों में बढ़ते प्रदूषण, अवैध शिकार और प्राकृतिक आवासों के विनाश के कारण यह प्रजाति तेजी से समाप्ति की ओर बढ़ रही थी।

ऐसे कठिन समय में उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1975 में लखनऊ स्थित कुकरैल में घड़ियाल पुनर्वास केंद्र की स्थापना कर संरक्षण अभियान की नींव रखी। प्रारंभिक चरण में चंबल नदी से घड़ियालों के अंडे लाकर वैज्ञानिक निगरानी में हैचिंग कराई गई और यहीं से शुरू हुई घड़ियालों की नई जिंदगी की कहानी।

कैप्टिव ब्रीडिंग ने बदली तस्वीर

घड़ियाल संरक्षण की सबसे बड़ी सफलता बंदी प्रजनन (कैप्टिव ब्रीडिंग) कार्यक्रम को माना जाता है। वर्ष 1976 में जन्मे घड़ियालों को मदर स्टॉक के रूप में विकसित किया गया और वर्ष 1988 से नियमित रूप से उनके अंडों की हैचिंग शुरू हुई।

अंडों से निकलने वाले बच्चों को लगभग ढाई वर्षों तक विशेष देखभाल और सुरक्षित वातावरण में पाला जाता है। इसके बाद उन्हें उनके प्राकृतिक आवासों में छोड़ा जाता है, जहां वे नदी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते हैं।

इसी वैज्ञानिक प्रक्रिया के कारण आज कुकरैल केंद्र में 466 घड़ियाल मौजूद हैं, जबकि प्रतिवर्ष 140 से 160 नए घड़ियालों की वृद्धि दर्ज की जा रही है।

उत्तर प्रदेश से दुनिया तक पहुंचा संरक्षण का संदेश

कुकरैल में विकसित घड़ियाल अब केवल उत्तर प्रदेश या भारत तक सीमित नहीं हैं। यहां से तैयार घड़ियालों को देश के विभिन्न राज्यों के अलावा भूटान, पाकिस्तान, जापान और अमेरिका के न्यूयॉर्क तक भेजा गया है।

यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि उत्तर प्रदेश का संरक्षण मॉडल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार्यता प्राप्त कर चुका है। दुनिया के कई वन्यजीव संस्थान और संरक्षण विशेषज्ञ कुकरैल मॉडल को अध्ययन और अनुसरण के योग्य मानते हैं।

गंगा से चंबल तक लौट रही घड़ियालों की आबादी

कुकरैल में पाले गए घड़ियालों को बाद में गंगा, घाघरा, गेरुआ, चंबल और गंडक जैसी प्रमुख नदियों में छोड़ा जाता है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक आवासों में उनकी संख्या बढ़ाना और नदियों के जैविक संतुलन को मजबूत करना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि घड़ियाल नदी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे मछलियों की प्रजातियों के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में मदद करते हैं और जल निकायों के स्वास्थ्य का संकेतक माने जाते हैं।

पर्यटकों के लिए बन चुका है आकर्षण का बड़ा केंद्र

लखनऊ का कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र अब केवल संरक्षण परियोजना नहीं, बल्कि एक प्रमुख ईको-टूरिज्म डेस्टिनेशन भी बन चुका है।

यहां आने वाले पर्यटकों के लिए म्यूजियम, इंटरप्रिटेशन सेंटर, घड़ियाल मॉडल, पेयजल व्यवस्था, शौचालय और विश्राम हेतु बेंच जैसी सुविधाएं विकसित की गई हैं। हर वर्ष लगभग दो लाख घरेलू पर्यटक और 100 से अधिक विदेशी पर्यटक यहां पहुंचते हैं।

वन्यजीव प्रेमियों, छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए यह केंद्र प्रकृति संरक्षण को समझने का जीवंत उदाहरण बन चुका है।

इन स्थानों पर भी देखे जा सकते हैं घड़ियाल

उत्तर प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में कई ऐसे स्थान हैं जहां प्राकृतिक वातावरण में घड़ियालों को देखा जा सकता है। इनमें प्रमुख हैं—

  • राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य
  • दुधवा नेशनल पार्क
  • कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य
  • हस्तिनापुर क्षेत्र
  • महराजगंज की नदियां
  • बाराबंकी क्षेत्र की नदी प्रणालियां
  • बहराइच के नदी क्षेत्र

इन स्थानों पर घड़ियालों के साथ-साथ कई दुर्लभ वन्यजीव और पक्षी भी देखने को मिलते हैं।

देवी गंगा के वाहन के रूप में भी मिलता है उल्लेख

भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं में भी घड़ियाल और मगरमच्छ का विशेष महत्व है। हिन्दू धर्मग्रंथों में देवी गंगा का वाहन ‘मकर’ बताया गया है, जिसे मगरमच्छ के रूप में भी देखा जाता है।

मकर को जलीय जीवों में अत्यंत शक्तिशाली और तीव्र गति वाला प्राणी माना गया है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में भी इन जीवों का संरक्षण प्रकृति और आस्था दोनों से जुड़ा हुआ विषय माना जाता है।

देश-विदेश से पर्यटक आ रहे हैं: जयवीर सिंह

उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश ईको-टूरिज्म की दृष्टि से देश का महत्वपूर्ण राज्य है। विश्व में जो वन्यजीव अत्यंत दुर्लभ हैं, उनमें घड़ियाल प्रमुख हैं और उत्तर प्रदेश में उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। इसी वजह से देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक घड़ियालों को देखने यहां पहुंच रहे हैं।

इस वर्ष 500 अंडों की हैचिंग का लक्ष्य

वन संरक्षक के अनुसार, भारत सरकार की नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत वर्ष 2026 में 500 घड़ियाल अंडों को प्राकृतिक आवासों से लाकर कुकरैल में हैच कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इससे आने वाले वर्षों में घड़ियालों की संख्या में और उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।

संरक्षण की वैश्विक मिसाल बना उत्तर प्रदेश

कभी केवल 250-300 की संख्या तक सिमट चुके घड़ियाल आज उत्तर प्रदेश की धरती से निकलकर दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुके हैं। कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र ने यह साबित कर दिया है कि यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मजबूत इच्छाशक्ति और दीर्घकालिक संरक्षण नीति के साथ कार्य किया जाए तो विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी प्रजातियों को भी नया जीवन दिया जा सकता है।

विश्व घड़ियाल दिवस पर यह सफलता केवल उत्तर प्रदेश की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की जैव विविधता संरक्षण यात्रा की एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक कहानी है।

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