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वृंदावन योजना की 32 एकड़ भूमि पर बनेगा भव्य कन्वेंशन सेंटर, डॉ.राजेश्वर सिंह ने सीएम योगी का जताया आभार

  • जय श्रीराम के नारों के बीच कल्ली पूरब गांव से रवाना हुई 31 वीं रामरथ श्रवण अयोध्या यात्रा
  • बुजुर्गों, महिलाओं को निरंतर अयोध्या दर्शन करवा रहे डॉ. राजेश्वर सिंह, कल्ली पश्चिम से रवाना हुई 31वीं रामरथ श्रवण अयोध्या बस सेवा
  • आजादी कभी मुफ्त में नहीं मिलती, क्रांतिकारियों के साहस, बलिदान से प्रेरणा लें युवा- डॉ. राजेश्वर सिंह
  • 23 साल की उम्र में भगत सिंह फांसी चढ़े, 10 साल से ज्यादा सावरकर ने काटी काला पानी की सजा, क्रांतिकारियों के सपनों के एकजुट-आत्मनिर्भर भारत के निर्माण को आगे आएं युवा

लखनऊ: सरोजनीनगर विधायक डॉ.राजेश्वर सिंह ने तेलीबाग, लखनऊ स्थित वृंदावन योजना में देश के दूसरे सबसे बड़े कन्वेशन सेंटर की स्वीकृति पर क्षेत्रवासियों को बधाई देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “वृंदावन योजना में प्रस्तावित यह इंटरनेशनल एग्जीबिशन कम कन्वेंशन सेंटर 32 एकड़ भूमि पर विस्तृत होगा जिसमें 10 हजार दशकों के बैठने की व्यवस्था होगी। आधुनिकता की चमक और संस्कृति की आभा से परिपूर्ण यह केंद्र लखनऊ को नई पहचान दिलाएगा।”

  • विधायक ने आगे लिखा, “सरोजनीनगर विधानसभा क्षेत्र में इस भव्य केंद्र के निर्माण की स्वीकृति हेतु श्रद्धेय योगी आदित्यनाथ जी का कोटिशः वंदन, अभिनंदन एवं हृदय से आभार!”
  • 31वीं रामरथ श्रवण अयोध्या यात्रा (निःशुल्क बस सेवा) के माध्यम से कल्ली पश्चिम वासियों ने किया भव्य राममंदिर के दर्शन
  • वृहस्पतिवार को सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह द्वारा अपनी मां तारा सिंह की स्मृति में अनवरत संचालित रामरथ श्रवण अयोध्या यात्रा का संचालन ग्राम पंचायत कल्ली पूरब से किया गया
  • इस निःशुल्क बस सेवा के माध्यम से कल्ली पश्चिम गांव के बुजुर्गों और महिलाओं को अयोध्या लाने, ले जाने से लेकर रास्ते में उनके भोजन, नाश्ता और सुलभता पूर्वक दर्शन कराने की व्यवस्था भी विधायक की टीम द्वारा की गई
  • डॉ. राजेश्वर सिंह ने क्रांतिकारियों के बलिदान को किया याद, क्रांतिकारियों के सपनों के भारत के निर्माण को युवाओं का किया आह्वान्

सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने वृहस्पतिवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स(ट्विटर) पर पोस्ट कर स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के बलिदान को याद करते हुए लिखा कि स्वतंत्रता अमूल्य है, लोकतंत्र को बनाए रखना और भारत की संप्रभुता की रक्षा करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। प्रत्येक पीढ़ी हमारे देश के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने ट्वीट में क्रांतिकारियों को हुए कारावास से संबंधित आंकड़े प्रस्तुत करते हुए आगे लिखा असहयोग और भारत छोड़ो आंदोलन सहित विभिन्न आंदोलनों के नेतृत्व के दौरान महात्मा गांधी 2,088 दिन जेल में रहे। 1941 में नजरबंदी के दौरान भागने से पहले नेता जी सुभाष चंद्र बोस अनुमानित तीन साल जेल में रहे। अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण विनायक दामोदर सावरकर को सेलुलर जेल में 10 वर्षों से अधिक समय बिताना पड़ा। बाल गंगाधर तिलक को लगभग छह साल जेल में बिताना पड़ा जिसमें उन्हें दो साल मांडले, बर्मा में बंद रहे। कई आंदोलनों के दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल लगभग दो साल जेल में बंद रहे।

युवा स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को याद करते हुए डॉ. सिंह ने आगे लिखा 23 मार्च 1931 को 23 साल की उम्र में भगत सिंह को फाँसी पर लटका दिया गया। सुखदेव थापर को 23 मार्च 1931 को 23 साल की उम्र में फाँसी दी गई, शिवराम राजगुरु को 23 मार्च 1931 को 22 साल की उम्र में फाँसी दी गई, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को 17 जून 1926 को 29 साल की उम्र में फाँसी दी गई, उधम सिंह को माइकल ओ’डायर की हत्या के लिए 31 जुलाई 1940 को 40 साल की उम्र में फांसी दी गई।

सरोजनीनगर विधायक ने आगे लिखा ये आंकड़े हमें याद दिलाते हैं कि आज़ादी कभी मुफ़्त में नहीं मिलती, अपने बलिदान से आजादी दिलाने वाले क्रांतिकारियों के साहस और प्रतिबद्धता से आज के युवाओं को आगे बढ़ने, लोकतंत्र की रक्षा और न्याय के लिए खड़े होने की प्रेरणा मिलनी चाहिए।

डॉ. सिंह ने आगे जोड़ा जिस तरह हम क्रांतिकारियों की विरासतों का सम्मान करते हैं, आइए यह सुनिश्चित करें कि हम उस भारत के निर्माण में योगदान करें जिसकी इन नायकों ने कल्पना की थी- एक एकजुट, आत्मनिर्भर राष्ट्र।

नवाबों के शहर लखनऊ से शेख़ों के शहर दुबई तक: डॉ. पीयूष शुक्ला को होम्योपैथी में अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान

  • ऑफलाइन चिकित्सा से लेकर ऑनलाइन कंसल्टेशन तक के इस दौर में सफल इलाज
  • होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के बारे में डॉ०पीयूष का कहना है कि यह पद्धति बीमारियों का जड़ से इलाज करती है और शरीर का संतुलन बनाए रखती है
  • डॉ. पीयूष शुक्ला की चिकित्सकीय यात्रा: उन्होंने भारत और विदेशों में शिक्षा प्राप्त कर होम्योपैथी को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया
  • अंतरराष्ट्रीय सम्मान: उन्हें हाल ही में दुबई में मिले “प्राइड ऑफ होम्योपैथी अवार्ड” समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिल चुके हैं
  • उनकी क्लीनिक में ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से मिल रही हैं होम्योपैथी में आधुनिक चिकित्सा सेवाएँ
  • चिकित्सा सेवा में परिवार का योगदान: डॉ. शुक्ला और उनकी पत्नी अपने पिता की होम्योपैथी धरोहर को आगे बढ़ा रहे हैं, साथ ही उनका पूरा परिवार चिकित्सा सेवा से जुड़ा हुआ है

लखनऊ: उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में चिकित्सा सेवाओं का क्षेत्र दिनोंदिन विकसित हो रहा है। शहर की चिकित्सा पद्धतियों में होम्योपैथी एक ऐसी विधा है, जिसने बीमारियों का जड़ से इलाज करने के लिए अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है। इस विधा में लखनऊ के डॉ. पीयूष शुक्ला का नाम एक प्रतिष्ठित और विश्वसनीय होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में उभर कर सामने आया है। उनके क्लीनिक, डॉ. पीयूष होम्योपैथी (A Unit of Anand Homeo Care), ने न केवल स्थानीय बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी चिकित्सा सेवाओं का विस्तार किया है।

होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति: एक ऐतिहासिक पद्धति

होम्योपैथी की उत्पत्ति 18वीं सदी में हुई, लेकिन इसके सिद्धांत आज भी उतने ही प्रभावी माने जाते हैं। इसमें किसी बीमारी का इलाज उसकी जड़ से किया जाता है, जिससे मरीज की समग्र स्वास्थ्य स्थिति बेहतर हो जाती है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह दवाइयाँ शरीर के प्राकृतिक संतुलन को नुकसान पहुंचाए बिना रोगों को ठीक करती हैं। यही कारण है कि आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के बावजूद, होम्योपैथी का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है।

डॉ. पीयूष शुक्ला: एक चिकित्सकीय धरोहर

डॉ. पीयूष शुक्ला का चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान एक पारिवारिक धरोहर से जुड़ा है। उनके पिता, डॉ. शिव कुमार (S.K.) शुक्ला, ने लखनऊ के लाल कुआं इलाके में अपने होम्योपैथी क्लीनिक की शुरुआत की थी और पिछले 50 वर्षों से वे लोगों की सेवा कर रहे हैं। अपने पिता से चिकित्सा की गहनता को देखते हुए, डॉ. पीयूष ने भी इस पद्धति में रुचि ली और इसे ही अपने जीवन का उद्देश्य बनाया।

डॉ. शुक्ला ने होम्योपैथी को केवल एक पारंपरिक व्यवसाय के रूप में नहीं अपनाया, बल्कि इसे अपनी लगन, मेहनत और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ जोड़कर इसे एक नई ऊंचाई तक पहुँचाया। इसी लगन की वजह से आज उन्होंने न सिर्फ़ लखनऊ, उत्तरप्रदेश व भारत बल्कि विश्व के नामचीन होम्योपैथी डॉक्टरों के बीच दुबई में भी सम्मान प्राप्त किया है।

डॉ. पीयूष शुक्ला की शैक्षणिक यात्रा और विशेषज्ञता

डॉ. शुक्ला ने होम्योपैथी चिकित्सा में अपनी शिक्षा भारत से शुरू की और फिर विदेशों में जाकर इस पद्धति के विभिन्न आयामों का अध्ययन किया। उन्होंने पुणे स्थित भारतीय विद्यापीठ डीम्ड यूनिवर्सिटी से BHMS (बैचलर ऑफ होम्योपैथिक मेडिसिन एंड सर्जरी) की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड से PGDEMS (पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन इमरजेंसी मेडिकल सर्विसेज) की डिग्री हासिल की। इसके साथ ही, मुंबई से उन्होंने CCH (Certificate in Child Health), CGO (Certificate in Gynecology and Obstetrics), PGDEMLT (Post Graduate Diploma in Emergency Medical Laboratory Techniques) जैसे प्रतिष्ठित पाठ्यक्रम भी पूरा किए।

उनकी शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान अर्जित करना नहीं था, बल्कि मरीजों की जटिल समस्याओं का समाधान ढूंढना था। इसके लिए उन्होंने अपनी शैक्षणिक योग्यताओं का सही उपयोग कर, प्रैक्टिकल अनुभव के साथ इसे नई दिशा दी।

पेशेवर सफर: लखनऊ के लालबाग से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक का सफ़र

डॉ. पीयूष शुक्ला का चिकित्सा सफर 2008 में लखनऊ के लालबाग इलाके से शुरू हुआ। उनकी क्लीनिक, जो लालबाग चौराहे पर स्थित है, स्थानीय मरीजों के लिए एक भरोसेमंद केंद्र बन चुकी है। धीरे-धीरे उनके मरीजों की संख्या में इज़ाफा होता गया, और आज उनकी सेवाएँ देशभर में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहुंच चुकी हैं। उनकी क्लीनिक आधुनिक तकनीक से लैस है, जहाँ पर ऑनलाइन कंसल्टेशन की सुविधा भी उपलब्ध है। सोशल मीडिया पर उनकी क्लीनिक की मजबूत उपस्थिति ने उन्हें नए दौर के मरीजों से जोड़ने में मदद की है।

डॉक्टर अंजू शुक्ला: धर्मपत्नी के रूप में एक सशक्त सहायक

डॉ.पीयूष शुक्ला के सफर में उनकी पत्नी डॉ.अंजू शुक्ला का भी अहम योगदान है। वह खुद भी होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति की विशेषज्ञ हैं और लाल कुआं व लालबाग स्थित क्लीनिक में अपने मरीजों का इलाज करती हैं। इस प्रकार, यह चिकित्सा सेवा शुक्ला परिवार के लिए केवल व्यवसाय नहीं बल्कि जनसेवा का एक माध्यम है।

डॉ. पीयूष शुक्ला एक संयुक्त परिवार में रहते हैं, जहाँ उनके परिवार के अधिकांश सदस्य चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। यह परिवार समाज सेवा की भावना से ओत-प्रोत है और चिकित्सा के माध्यम से लोगों की भलाई के लिए कार्यरत है। शुक्ला परिवार के सभी सदस्य अपने-अपने क्षेत्र में विशेषज्ञ हैं, और जनसेवा को ही अपना प्रमुख उद्देश्य मानते हैं।

डॉ. पीयूष होम्योपैथी की मुख्य विशेषताएँ

डॉ.पीयूष शुक्ला की क्लीनिक कई गंभीर और जटिल बीमारियों के इलाज के लिए प्रसिद्ध है। उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएँ निम्नलिखित हैं:

  1. जटिल रोगों का जड़ से निदान: चाहे वह स्टोन की समस्या हो, एलोपेसिया (बाल झड़ने की समस्या), हार्मोनल डिसऑर्डर, या महिलाओं से संबंधित स्वास्थ्य समस्याएँ, डॉ. पीयूष ने इन बीमारियों का जड़ से इलाज किया है।
  2. मानसिक स्वास्थ्य का उपचार: वह मानसिक समस्याओं जैसे कि डिप्रेशन, अनिद्रा, तनाव, और चिंता (एंजायटी) का भी सफल इलाज करते हैं। उनके होम्योपैथिक इलाज ने कई मरीजों को मानसिक शांति और स्वास्थ्य प्रदान किया है।
  3. ऑनलाइन कंसल्टेशन: दूर-दराज़ के मरीजों की सुविधा के लिए उनकी क्लीनिक ऑनलाइन कंसल्टेशन की सुविधा भी प्रदान करती है, जिससे मरीज घर बैठे अपनी स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान प्राप्त कर सकते हैं।
  4. सोशल मीडिया पर सक्रियता: वर्तमान डिजिटल युग को ध्यान में रखते हुए, उनकी क्लीनिक सभी प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय है। इससे मरीज आसानी से उनकी सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान

होम्योपैथी चिकित्सा में डॉ.पीयूष शुक्ला के योगदान को न केवल भारत में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है। जुलाई 2024 में, उन्हें “प्राइड ऑफ होम्योपैथी अवार्ड” से सम्मानित किया गया, जो उन्हें दुबई (UAE) में आयोजित वर्ल्ड होम्योपैथी समिट-2 में प्रदान किया गया। यह सम्मान बुर्ज-अल-अरब, दुबई में आयोजित एक समारोह में दिया गया, जहाँ विश्व के 18 देशों से पहुंचे होम्योपैथी चिकित्सकों के बीच चुनिंदा भारतीय होम्योपैथी चिकित्सकों का सम्मान किया गया।

इसके अतिरिक्त, उन्हें नेशनल होमियोकॉन आइकॉनिक अवार्ड, आदर्श गौरव सम्मान, होम्योपैथी चिकित्सा रत्न सम्मान, होम्योपैथी विभूषण सम्मान, और होम्योपैथी गौरव सम्मान जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भारत में भी मिल चुके हैं।

डॉ०शुक्ला की भविष्य की योजनाएँ

डॉ. पीयूष शुक्ला की योजनाओं में उनकी सेवाओं को और व्यापक बनाना शामिल है। वे होम्योपैथी चिकित्सा को और भी प्रभावी बनाने के लिए अनुसंधान और विकास पर जोर दे रहे हैं। साथ ही, वह चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग इस पद्धति का लाभ उठाएँ, इसलिए वह ऑनलाइन कंसल्टेशन और टेलीमेडिसिन सेवाओं को और भी उन्नत बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

डॉ. पीयूष शुक्ला ने अपने अथक परिश्रम, समर्पण और होम्योपैथी चिकित्सा के प्रति असीम विश्वास से लखनऊ में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली चिकित्सा सेवाएँ केवल शारीरिक बीमारियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और समग्र कल्याण के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। उनकी सेवाओं से न केवल लखनऊ के लोग लाभान्वित हो रहे हैं, बल्कि देश और विदेश से भी लोग उनके पास इलाज कराने आते हैं। डॉ.पीयूष शुक्ला का यह सफर निरंतर आगे बढ़ रहा है और वे समाज के प्रति अपनी सेवा भावना को और भी मजबूती से आगे ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

उत्तर प्रदेश विधान सभा उपचुनाव 2024: 9 विधानसभा सीटों पर 13 नवम्बर को मतदान, मिल्कीपुर सीट पर चुनाव टला

यूपी सहित देश के अन्य राज्यों की 45/46 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव 13 नवंबर को, मिल्कीपुर पर नहीं होगी वोटिंग

लखनऊ: भारत निर्वाचन आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने मंगलवार को यूपी सहित अन्य राज्यों की 45/46 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव की घोषणा कर दी है। उत्तर प्रदेश की 9 विधानसभा सीटों पर 13 नवंबर 2024 को मतदान होगा। हालांकि, अयोध्या के मिल्कीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव की तारीख घोषित नहीं की गई है।

उत्तर प्रदेश उपचुनाव 2024 की मुख्य बातें:

• उपचुनाव की तारीख: 13 नवंबर 2024

• मतदान की तारीख: 13 नवंबर को यूपी की 9 विधानसभा सीटों पर

• मतगणना: 23 नवंबर 2024 को नतीजे घोषित होंगे

किन सीटों पर होंगे उपचुनाव ?

1. कटेहरी

2. खैर

3. गाजियाबाद शहर

4. मीरापुर

5. कुंदरकी

6. सीसामऊ

7. फूलपुर

8. मिर्जापुर की मझवां

9. मैनपुरी की करहल

मिल्कीपुर सीट पर क्यों नहीं होगा उपचुनाव?

अयोध्या की मिल्कीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा नहीं की गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने जानकारी दी है कि मिल्कीपुर सीट पर चुनाव को लेकर मामला हाईकोर्ट में लंबित है। 2022 विधानसभा चुनाव में हारने के बाद पूर्व विधायक गोरखनाथ बाबा ने मिल्कीपुर सीट से जीते उम्मीदवार अवधेश प्रसाद के खिलाफ चुनाव याचिका दायर की थी। इस याचिका पर फैसला अभी पेंडिंग है, जिसके चलते निर्वाचन आयोग ने इस सीट पर उपचुनाव की तारीख नहीं घोषित की।

श्री कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद: मामले के पक्षकार वीरेंद्र सिंह ने की सीएम योगी से मुलाकात

  • अखिल क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष हैं कौशाम्बी के टेंवा निवासी वीरेंद्र सिंह
  • कौशाम्बी की ज़िला पंचायत अध्यक्ष कल्पना सोनकर व पूर्व ब्लॉक प्रमुख सिराथू जितेन्द्र कुमार सोनकर भी साथ में रहे मौजूद

लखनऊ: भगवान श्री कृष्ण जन्मभूमि मथुरा व शाही ईदगाह विवाद के पक्षकार अखिल क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष व कौशांबी प्रधान संघ के पूर्व अध्यक्ष रहे वीरेंद्र सिंह ने सीएम योगी से मुलाकात की। इस दौरान उनके साथ कौशांबी की जिला पंचायत अध्यक्ष कल्पना सोनकर व सिराथू के पूर्व ब्लाक प्रमुख जितेंद्र सोनकर भी मौजूद थे।

इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रहे भगवान श्री कृष्ण जन्मभूमि विवाद की तात्कालिक स्थिति से अवगत कराया। इसके अलावा उन्होंने उत्तर प्रदेश व विशेष रूप से कौशांबी जनपद के राजनीतिक व सामाजिक परिस्थितियों की जानकारी भी मुख्यमंत्री को दी।

ज्ञात हो कि कौशांबी के टेवा निवासी वीरेंद्र सिंह भगवान श्री कृष्ण जन्मभूमि विवाद में अपने पुत्र विजय सिंह के साथ पक्षकार हैं। इसके अलावा उनके सुपुत्र समाज सेवी विजय सिंह ने वाराणसी स्थित ज्ञानवापी मामले पर भी जिला न्यायालय में एक मुकदमा कर रखा है।

धर्म युद्ध का संकल्प: जिहाद पर अंतिम प्रहार- एडवोकेट रीना नेहरू सिंह

लखनऊ: सनातन धर्म के अनुयायियों पर सदियों से अत्याचार होते आए हैं, चाहे वह मुगल काल हो या अंग्रेजों का शासन। इतिहास साक्षी है कि कभी भी किसी हिंदू ने दूसरे धर्म को नष्ट करने का प्रयास नहीं किया। हम हिंदू गुरु गोबिंद सिंह के मासूम बेटों फतेह सिंह और जोरावर सिंह के बलिदान को नहीं भूले, जिन्हें इस्लाम न अपनाने पर दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया था। इसी तरह, हम टीपू सुल्तान के अत्याचारों को भी याद रखते हैं, जिसने लाखों हिंदुओं का नरसंहार किया था।

विभाजन और उसका दर्द

1947 में भारत का विभाजन दुनिया का पहला और अंतिम विभाजन था जो मजहब के आधार पर हुआ। इस विभाजन के दौरान हजारों महिलाओं को बलात्कार, हत्या और धर्मांतरण का सामना करना पड़ा। कई महिलाओं ने खुदकुशी कर अपनी जान बचाई, और उनकी लाशों से कुएं भर गए। विभाजन के समय कुछ जिलों में हिंदू और सिख आबादी 30% से घटकर मात्र 1% रह गई। यह जिहाद नहीं तो और क्या था?

सदियों से हिंदुत्व पर आघात

विदेशी आक्रमणकारियों ने हजारों साल पहले हिंदुत्व को खत्म करने के इरादे से हिंदुस्तान की जमीन पर कदम रखा था। बाबर से लेकर अंग्रेजों तक, हिंदू मंदिरों का विध्वंस और निर्दोष हिंदुओं की हत्या एक क्रमिक जिहाद का हिस्सा रही है। विभाजन के बाद भी यह जहर खत्म नहीं हुआ, बल्कि हमारी पहचान और संस्कृति पर लगातार सवाल खड़े होते रहे।

कश्मीरी पंडितों का विस्थापन

1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों को अपने पूर्वजों की भूमि से विस्थापित होना पड़ा। आज तक संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं हुई है। आखिर हर बार हिंदू ही क्यों पीड़ित होते हैं? क्या यह उनकी सहनशीलता की सजा है?

लव जिहाद और छद्म षड्यंत्र

आज के युग में, मुस्लिम युवक हिंदू नाम रखकर हिंदू युवतियों को प्रेम जाल में फंसा रहे हैं। इसे लव जिहाद कहा जाता है, और इसके लिए उन्हें मौलवियों से धनराशि भी मिलती है। सनातन धर्म को इन विभिन्न प्रकार के जिहादों से लड़ते हुए हजारों साल हो गए हैं, और अब समय आ गया है कि हम एक संगठित होकर इसका सामना करें।

धर्म युद्ध का आह्वान

रीना एन सिंह ने यह भी लिखा कि हमें यह समझना होगा कि अब धर्म की रक्षा के लिए हमें धर्म युद्ध का संकल्प लेना होगा। हमारा सनातन धर्म शास्त्र के साथ शस्त्र की भी शिक्षा देता है। हमें यह दिखाना होगा कि हम न केवल माला जप सकते हैं, बल्कि तलवार भी चला सकते हैं। अगर हमें अपनी पहचान की रक्षा करनी है, तो हमें इस जिहाद के खिलाफ खड़ा होना ही होगा।

उन्होंने लिखा कि भगवान कृष्ण के समय महाभारत का युद्ध हुआ था, और आज हमें भी एक नए धर्म युद्ध के लिए तैयार होना होगा। हमें संकल्प लेना होगा कि किसी भी हाल में हमारी पहचान और संस्कृति पर कोई आघात न हो।

ध्यान दें: यह लेख सनातन धर्म और हिंदू संस्कृति की सुरक्षा के संदर्भ में लिखा गया है। इसका उद्देश्य धार्मिक सहिष्णुता और आत्मरक्षा की भावना को जागृत करना है।