अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति अब अमेरिका में ही राजनीतिक और आर्थिक विवाद का कारण बन गई है। ट्रंप प्रशासन की ओर से लगाए गए कई आयात शुल्क को लेकर कानूनी लड़ाई के बाद सरकार को बड़ी रकम वापस करनी पड़ी है।
अमेरिकी सीमा शुल्क अधिकारियों के अनुसार, अदालत के फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन ने करीब 100 अरब डॉलर की टैरिफ राशि वापस कर दी है। यह रिफंड उन शुल्कों से जुड़ा है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम यानी IEEPA के तहत लगाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शुरू हुई रिफंड प्रक्रिया
ट्रंप प्रशासन ने अप्रैल 2025 में दुनिया के कई देशों से आने वाले सामान पर रेसिप्रोकल टैरिफ लागू करना शुरू किया था। इसके बाद अमेरिका और उसके व्यापारिक साझेदारों के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ा और कई देशों के साथ टैरिफ को लेकर विवाद पैदा हुआ।
टैरिफ को चुनौती देने वाली कानूनी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन को बड़ा झटका दिया। अदालत ने माना कि राष्ट्रपति ने IEEPA का इस्तेमाल करके व्यापक आयात शुल्क लगाने के लिए अपनी शक्तियों की सीमा पार की।
अदालत के फैसले के बाद सरकार को ऐसे टैरिफ के तहत जमा की गई रकम वापस करने की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी।
सरकार ने लौटाए करीब 100 अरब डॉलर
अमेरिकी सीमा शुल्क अधिकारियों ने अदालत में दाखिल दस्तावेजों में बताया कि अब तक करीब 100 अरब डॉलर की राशि वापस की जा चुकी है।
बताया गया है कि रिफंड में ब्याज की रकम भी शामिल है। यह प्रक्रिया अमेरिकी सीमा शुल्क विभाग की रिफंड व्यवस्था के जरिए पूरी की गई और संबंधित राशि को वित्त विभाग को भेज दिया गया।
यह राशि उन कारोबारियों और आयातकों से जुड़े शुल्क की वापसी है, जिन्होंने सरकार को टैरिफ के रूप में भुगतान किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ को क्यों बताया था गलत?
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, IEEPA कानून का निर्माण 1977 में राष्ट्रीय आपात स्थितियों से निपटने के लिए किया गया था। अदालत ने माना कि इस कानून के जरिए राष्ट्रपति को दुनिया भर से आने वाले सामान पर व्यापक स्तर पर टैरिफ लगाने की असीमित शक्ति नहीं मिलती।
अदालत ने इसी आधार पर ट्रंप प्रशासन की ओर से लगाए गए IEEPA आधारित कई टैरिफ को कानूनी अधिकार से बाहर माना।
इस फैसले के बाद प्रशासन के सामने उन आयातकों को भुगतान लौटाने की चुनौती खड़ी हो गई, जिन्होंने इन शुल्कों को पहले ही जमा कर दिया था।
अमेरिकी उपभोक्ताओं को रिफंड क्यों नहीं?
टैरिफ रिफंड को लेकर अमेरिका में एक नया राजनीतिक विवाद भी खड़ा हो गया है। आलोचकों का कहना है कि सरकार जिन कारोबारियों और आयातकों को पैसा वापस कर रही है, जरूरी नहीं कि वही लोग टैरिफ का वास्तविक आर्थिक बोझ उठाने वाले हों।
टैरिफ लगने के बाद कई कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी की थी। इसका सीधा असर अमेरिकी उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ा। यानी सामान खरीदते समय आम लोगों को पहले की तुलना में ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी।
अब जब सरकार टैरिफ की रकम वापस कर रही है, तो यह पैसा मुख्य रूप से उन आयातकों और कंपनियों को मिल रहा है जिन्होंने शुल्क सरकार को जमा किया था। आलोचकों का सवाल है कि जिन उपभोक्ताओं ने महंगे सामान के रूप में इसका अप्रत्यक्ष बोझ उठाया, उन्हें इस रिफंड में कोई सीधा हिस्सा नहीं मिल रहा।
ट्रंप की टैरिफ नीति पर फिर उठे सवाल
टैरिफ का उद्देश्य अमेरिकी उद्योगों और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना तथा विदेशी व्यापार पर अमेरिका की स्थिति मजबूत करना बताया गया था। लेकिन इसके साथ ही कीमतों में बढ़ोतरी और व्यापारिक तनाव को लेकर ट्रंप प्रशासन की नीति पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
करीब 100 अरब डॉलर के रिफंड के बाद यह मुद्दा अमेरिकी राजनीति में और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। अब बहस सिर्फ टैरिफ की वैधता तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात पर भी हो रही है कि टैरिफ से पैदा हुए आर्थिक बोझ का असली असर किस पर पड़ा और रिफंड का फायदा किसे मिल रहा है।


































