अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक बार फिर अमेरिकी कानून ‘वॉर पावर्स रेजोल्यूशन’ चर्चा में है। वजह यह है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास अब सीमित समय बचा है, जिसके भीतर उन्हें सैन्य कार्रवाई जारी रखने के लिए कांग्रेस की मंजूरी लेनी होगी। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करेंगे या पहले के राष्ट्रपतियों की तरह इसे नजरअंदाज करेंगे।
दरअसल, अमेरिका ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी और 2 मार्च को इसकी जानकारी संसद को दी गई। इसी तारीख से 60 दिनों की समयसीमा गिनी जाती है, जो 1 मई को पूरी हो रही है। इस कानून के तहत अगर राष्ट्रपति बिना कांग्रेस की अनुमति के सेना का इस्तेमाल करते हैं, तो उन्हें 60 दिनों के भीतर मंजूरी लेना जरूरी होता है।
‘वॉर पावर्स रेजोल्यूशन’ को 1973 में लागू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों पर नियंत्रण रखना और कांग्रेस की भूमिका को मजबूत करना था। कानून कहता है कि तय समयसीमा के भीतर मंजूरी न मिलने पर सैन्य कार्रवाई को रोक देना चाहिए।
मंजूरी के लिए प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में साधारण बहुमत जरूरी होता है। लेकिन मौजूदा हालात में यह आसान नहीं दिख रहा है, क्योंकि ट्रंप की अपनी पार्टी के कुछ सांसद भी इस कार्रवाई के विरोध में हैं। ऐसे में बहुमत जुटाना चुनौती बन सकता है।
हालांकि, यह पहला मौका नहीं है जब यह कानून विवाद में आया हो। इससे पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों—जैसे निक्सन, रीगन, बिल क्लिंटन, जॉर्ज डब्ल्यू बुश, बराक ओबामा और खुद ट्रंप—ने इसे पूरी तरह नहीं माना। उनका कहना रहा है कि यह कानून राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों में हस्तक्षेप करता है, खासकर तब जब राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल हो और तुरंत फैसले लेने की जरूरत पड़े।
अगर कांग्रेस से मंजूरी नहीं मिलती, तब भी राष्ट्रपति अक्सर कानूनी व्याख्याओं या राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क के आधार पर सैन्य कार्रवाई जारी रखने की कोशिश करते रहे हैं। ऐसे मामलों में अमेरिका की कार्यपालिका (राष्ट्रपति) और विधायिका (कांग्रेस) के बीच टकराव की स्थिति भी बन जाती है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि तय समयसीमा के बाद ट्रंप क्या कदम उठाते हैं—कानून का पालन या फिर परंपरा के मुताबिक उसे दरकिनार।


































