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Health Tips: क्या एक ही ब्लड ग्रुप वाले कपल को संतान उत्पत्ति में होती है कोई परेशानी?

अक्सर लोगों में यह मिसकंसेप्शन होता है कि अगर कपल का ब्लड ग्रुप सेम हो तो उन्हें बच्चा पैदा करने में दिक्कत आती है. रियलिटी में ऐसा नहीं है. सेम ब्लड ग्रुप वाले कपल्स को बेबी कंसीव करने में आमतौर पर कोई इश्यू नहीं होता है.

क्या सेम ब्लड ग्रुप वाले कपल को बच्चा पैदा करने में दिक्कत आती है?

    • नहीं, सेम ब्लड ग्रुप होने से बेबी कंसीव करने में कोई प्रॉब्लम नहीं आती है. एक्सपर्ट्स के अनुसार, स्पर्म और एग पर ब्लड ग्रुप एंटीजन नहीं होते हैं. इसलिए फर्टिलाइजेशन और भ्रूण के डेवलपमेंट पर इसका कोई डायरेक्ट असर नहीं पड़ता.
    • मुख्य प्रॉब्लम ब्लड ग्रुप के आरएच फैक्टर से जुड़ी होती है, न कि ब्लड ग्रुप के मेन टाइप (ए, बी, एबी, ओ) से.

आरएच इम्कम्पेटिबिलिटी की प्रॉब्लम कब आती है?

यह प्रॉब्लम तब आती है जब मां का ब्लड ग्रुप आरएच-नेगेटिव हो और पिता का ब्लड ग्रुप आरएच-पॉजिटिव हो. इस सिचुएशन में, अगर बेबी आरएव-पॉजिटिव होता है, तो मां की बॉडी बेबी के ब्लड को “फॉरेन” मान सकती है और एंटीबॉडी बनाना स्टार्ट कर सकती है.

    • इफेक्ट: फर्स्ट प्रेग्नेंसी में यूजुअली यह बड़ी प्रॉब्लम नहीं होती, लेकिन फ्यूचर की प्रेग्नेंसी में ये एंटीबॉडीज बेबी की रेड ब्लड सेल्स को डिस्ट्रॉय  कर सकती हैं, जिससे आरएच इम्कम्पेटिबिलिटी नामक सीरियस कंडीशन पैदा हो सकती है.
    • बेबी पर असर: इससे बेबी में एनीमिया, जॉन्डिस या कुछ मामलों में ब्रेन रिलेटेड प्रॉब्लम्स भी हो सकती हैं.
    • ट्रीटमेंट: आजकल इस प्रॉब्लम को एंटी-डी इम्यूनोग्लोबुलिन इंजेक्शन के जरिए आसानी से मैनेज किया जा सकता है, जो आरएच-नेगेटिव प्रेग्नेंट वीमेन को दिया जाता है.

शादी से पहले ब्लड टेस्ट पर क्यों जोर देते हैं डॉक्टर्स?

डॉक्टर्स शादी से पहले ब्लड टेस्ट पर जोर इसलिए देते हैं ताकि पोटेंशियल हेल्थ प्रॉब्लम्स को डिटेक्ट करके उन्हें रोका या मैनेज किया जा सके. इसका मेन रीजन ब्लड ग्रुप की इम्कम्पेटिबिलिटी से कहीं ज़्यादा है.

शादी से पहले ब्लड टेस्ट से कई इम्पोर्टेंट बातें पता चलती हैं,

    • आरएच फैक्टर इम्कम्पेटिबिलिटी: जैसा कि ऊपर बताया गया है, यह सबसे इम्पोर्टेंट रीजन्स में से एक है. मां के आरएच-नेगेटिव और पिता के आरएच-पॉजिटिव होने पर बेबी की हेल्थ पर पड़ने वाले प्रभावों को प्रिवेंट करने के लिए इसे पहले ही जानना जरूरी) होता है.
    • थैलेसीमिया: यह एक सीरियस ब्लड डिसऑर्डर है. अगर पेरेंट्स दोनों थैलेसीमिया के कैरियर हैं, तो उनके बेबी में थैलेसीमिया मेजर होने की 25% पॉसिबिलिटी होती है, जो बेबी के लिए लाइफ-थ्रेटनिंग हो सकता है. इस टेस्ट से इसका पता लगाया जा सकता है.
    • सिकल सेल एनीमिया: यह भी एक जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर है, जिसकी जांच भी मैरिज से पहले की जाती है.
    • सेक्शुअली ट्रांसमिटेड इन्फेक्शन्स: एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, सिफलिस, गोनोरिया आदि जैसे इन्फेक्शन्स की जांच की जाती है, ताकि उनका ट्रीटमेंट किया जा सके और पार्टनर या बेबी में इन्फेक्शन फैलने से रोका जा सके.
    • जनरल हेल्थ चेकअप: हीमोग्लोबिन लेवल (एनीमिया), ब्लड शुगर, किडनी और लिवर फंक्शन आदि की जनरल जांच भी की जाती है, ताकि कोई अंडरलाइंग हेल्थ प्रॉब्लम हो तो उसका पता चल सके.

शादी से पहले ब्लड टेस्ट का उद्देश्य फ्यूचर संतान की हेल्थ को प्रोटेक्ट और कपल की हैप्पी और हेल्दी मैरिड लाइफ को सुनिश्चित करना है. यह किसी भी पोटेंशियल खतरे को पहले ही आइडेंटिफाई कर उसे प्रभावी ढंग से मैनेज करने का मौका देता है.

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

यूक्रेन को हथियार भेजने के अमेरिकी निर्णय पर NATO में मतभेद! एक सदस्य देश ने साफ कहा– ‘हम एक भी रुपया नहीं देंगे’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नाटो (NATO) के सदस्य देश हंगरी ने झटका दिया है. अमेरिका नाटो के जरिए यूक्रेन को सप्लाई करना चाहता है, जिसका समर्थन करने से हंगरी ने इनकार कर दिया है. हंगरी के विदेश मंत्री पीटर सिज्जार्टो ने कहा कि यदि यूरोपीय यूनियन के सामने इस तरह की कोई आधिकारिक प्रस्ताव आता है तो हंगरी इसमें भाग नहीं लेगा।

यूक्रेन नहीं भेजे जाएंगे एक भी हथियार- हंगरी

पीटर सिज्जार्टो ने कहा ने कहा कि किसी भी हालत में हगंरी का एक भी पैसा, हथियार या सैनिक यूक्रेन नहीं भेजे जाएंगे. इस बीच अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार (14 जुलाई 2025) को नाटो सहयोगियों के साथ यूक्रेन को और हथियार भेजने के समझौते की घोषणा की है. उन्होंने नाटो महासचिव मार्क रूट के साथ ओवल ऑफिस में एक बैठक के दौरान ये बातें कहा है।

नाटो के जरिए यूक्रेन को हथियार देगा अमेरिका

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार (10 जुलाई 2024) को कहा कि अमेरिका नाटो के माध्यम से यूक्रेन को हथियार भेजेगा और नाटो इन हथियारों का पूरा खर्च देगा. बताया जा रहा है कि अमेरिका 300 मिलियन डॉलर (2.5 हजार करोड़ रुपये) का हथियार यूक्रेन को भेजने की तैयारी कर रहा है, जिसमें पैट्रियट मिसाइल सिस्टम और मीडियम रेंज के रॉकेट शामिल हैं।

नाटो महासचिव मार्क रूट के मुताबिक यह यूक्रेन को हथियारों की सिर्फ पहली खेप होगी और आगे भी उसे हथियार भेजे जाएंगे. रूसी हवाई हमलों के खिलाफ यूक्रेन की सुरक्षा के लिए पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलें काफी अहम हैं. अमेरिका में बना यह घातक हथियार ही रूसी  बैलिस्टिक मिसाइलों को मार गिराने में सक्षम है।

ट्रंप ने जंग खत्म करने को लेकर पुतिन को दी धमकी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को धमकी देते हुए कहा कि अगर 50 दिनों के भीतर यूक्रेन में जंग खत्म करने के लिए कोई समझौता नहीं हुआ तो रूस पर 100 फीसदी सेकेंडरी टैरिफ लगाया जाएगा. उन्होंने कहा, “मैं व्यापार का उपयोग कई चीजों के लिए करता हूं, लेकिन यह जंग को खत्म करने में अच्छा साबित होगा।”

अंतरिक्ष यात्रा के बाद शुभांशु शुक्ला को किन बीमारियों का हो सकता है सामना? जानिए इससे जुड़े संभावित खतरे

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन यानी आईएसएस पर 18 दिन बिताने के बाद भारतीय एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला 14 जुलाई को दोपहर 3 बजे पृथ्वी के लिए रवाना हो गए. वह 15 जुलाई को पृथ्वी पर लैंड करेंगे. हालांकि, सवाल यह उठता है कि स्पेस में इतने दिन बिताने के बाद शुभांशु शुक्ला किस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं? अब पृथ्वी के वातावरण में उनके लिए क्या-क्या खतरे होंगे?

सेहत के लिए कितनी खतरनाक है स्पेस यात्रा?

अंतरिक्ष यात्रा इंसान के शरीर के लिए असाधारण अनुभव है, लेकिन इससे कई फिजिकल और मेंटल प्रॉब्लम्स होने का खतरा भी रहता है. यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ईएसए) के फ्लाइट सर्जन डॉ. ब्रिगिट गोडार्ड के मुताबिक, अंतरिक्ष यात्रियों को माइक्रोग्रैविटी के कारण कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं. इनमें फ्लूड शिफ्ट, हड्डियों की डेंसिटी में कमी, मसल्स लॉस और स्पेस मोशन सिकनेस आदि चीजें शामिल हैं. शुभांशु शुक्ला को भी इन खतरों का सामना करना पड़ सकता है.

स्पेस मोशन सिकनेस (Space Motion Sickness)

डॉ. गोडार्ड के मुताबिक, शुभांशु शुक्ला को स्पेस में शुरुआती दिनों में स्पेस मोशन सिकनेस का अनुभव हुआ था, जिसमें सिर में भारीपन और चक्कर जैसी दिक्कतें शामिल थीं. यह कंडीशन माइक्रोग्रैविटी के कारण होती है, जहां शरीर का संतुलन और दिशा-ज्ञान प्रभावित होता है. वहीं, अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी पर लौटने के बाद भी इस तरह की दिक्कतें हो सकती हैं. आमतौर पर ये परेशानियां कुछ दिनों में ठीक हो जाती हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह कंडीशन लंबे समय तक बनी रह सकती है.

नासा के हालिया रिसर्च के मुताबिक, करीब 70 पर्सेंट अंतरिक्ष यात्रियों को इस कंडीशन से जूझना पड़ता है. हालांकि, शुभांशु  फाइटर पायलट हैं. ऐसे में उनका अनुभव इस कंडीशन से निपटने में मददगार रहा है. इसके बावजूद पृथ्वी पर आने के बाद सात दिन के पुनर्वास कार्यक्रम में उन पर नजर रखी जाएगी.

बोन और मसल्स लॉस

अंतरिक्ष में माइक्रोग्रैविटी के कारण हड्डियों और मांसपेशियों पर खराब असर पड़ता है. शुभांशु ने अपने मिशन के दौरान ‘मायोजेनेसिस’ नामक प्रयोग किया, जिसमें माइक्रोग्रैविटी में मांसपेशियों के कमजोर होने की प्रक्रिया की स्टडी की गई. अंतरिक्ष में हड्डियों की डेंसिटी में 1-2% प्रति माह की दर से कमी आ सकती है. इससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसी दिक्कतें होने का खतरा रहता है.

रेडिएशन का खतरा

अंतरिक्ष में रेडिएशन का खतरा भी रहता है. शुभांशु ने अपने मिशन के दौरान रेडिएशन के खतरे से निपटने को लेकर एक्सपेरिमेंट किए, जो भविष्य के लंबे मिशनों के लिए अहम हैं. ह्यूस्टन, टेक्सास के नासा जॉनसन स्पेस सेंटर में कार्यरत डॉ. एलिजाबेथ जॉन्स के मुताबिक, अंतरिक्ष में कॉस्मिक रेज और सोलर रेडिएशन के कारण डीएनए लॉस और कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. शुभांशु और उनके साथी एस्ट्रेनॉट्स ने ‘रेड नैनो डोसीमीटर’ का इस्तेमाल करके रेडिएशन चेक किया, जिससे भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों को बेहतर सुरक्षा मिलेगी.

मेंटल हेल्थ और टेंशन

अंतरिक्ष में काफी वक्त तक रहने से मेंटल हेल्थ पर भी असर पड़ता है. शुभांशु ने अपने मिशन के दौरान कई एक्सपेरिमेंट किए, जिनमें ब्रेन के ब्लड फ्लो और आंखों की गति पर स्टडी की गई. ये रिसर्च मेंटल हेल्थ और न्यूरोलॉजिकल इफेक्ट को समझने में मदद करेंगे.

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

Health Tips: पैक्ड फूड सेहत के लिए कितना हानिकारक है? जानिए क्यों इसे माना जाता है सेहत के लिए खतरे का संकेत

आजकल की भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल में डिब्बा बंद खाना हमारे लिए एक आसान और तेज ऑप्शन बन गया है. ये चीजें बेशक हमारा टाइम बचाती हैं, लेकिन हेल्थ के लिए एक बड़ी खतरे की घंटी साबित हो सकती हैं. आइए जानते हैं कि डिब्बा बंद खाना हमारी सेहत के लिए कितना खतरनाक है और क्यों.

डिब्बा बंद खाना क्यों है खतरे की घंटी?

    • हाई सोडियम और शुगर: डिब्बा बंद खाने में टेस्ट और प्रिजर्वेशन) के लिए सोडियम और शुगर की क्वांटिटी बहुत ज्यादा होती है. ज्यादा सॉल्ट हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज का रिस्क बढ़ाता है. वहीं, ज्यादा शुगर से ओबेसिटी , टाइप-2 डायबिटीज और इंसुलिन रेसिस्टेंस जैसी प्रॉब्लम्स हो सकती हैं.
    • अनहेल्दी फैट्स: इन प्रोडक्ट्स में अक्सर ट्रांस फैट और सैचुरेटेड फैट का यूज होता है, जो हेल्थ के लिए बेहद हार्मफुल हैं. ये बैड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाते हैं और गुड कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं, जिससे हार्ट डिजीज और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है.
    • प्रिजर्वेटिव्स और आर्टिफिशियल एडिटिव्स: डिब्बा बंद खाने को लॉन्ग टाइम तक फ्रेश रखने और कलर व टेस्ट बेहतर करने के लिए केमिकल प्रिजर्वेटिव्स, आर्टिफिशियल कलर्स और फ्लेवर मिलाए जाते हैं. ये केमिकल्स बॉडी में इनर इम्बैलेंस क्रिएट कर सकते हैं और एलर्जी , डाइजेस्टिव प्रॉब्लम्स और कुछ केसेज मामलों में कैंसर जैसी सीरियस डिजीज से भी जुड़े हो सकते हैं.
    • न्यूट्रिएंट्स की कमी: प्रोसेसिंग के दौरान डिब्बा बंद खाने में मौजूद कई जरूरी विटामिन्स, मिनरल्स और फाइबर कम हो जाते हैं या फिनिश हो जाते हैं. न्यूट्रिएंट्स की कमी से बॉडी में वीकनेस आती है, इम्यून सिस्टम कमजोर होता है और लॉन्ग टाइम में मालन्यूट्रिशन का खतरा बढ़ता है. वहीं, फाइबर की कमी से डाइजेस्टिव प्रॉब्लम्स जैसे कॉन्स्टिपेशन और ब्लोटिंग हो सकती हैं.
    • बिस्फेनॉल ए का रिस्क: कई डिब्बाबंद फूड प्रोडक्ट्स के कंटेनर की इनर लेयर पर बीपीण् नामक केमिकल का यूज होता है. स्टडीज से पता चला है कि बीपीए बॉडी में हार्मोनल इम्बैलेंस क्रिएट कर सकता है और कुछ हेल्थ प्रॉब्लम्स जैसे ओबेसिटी, डायबिटीज और रिप्रोडक्टिव प्रॉब्लम्स से जुड़ा हो सकता है.
    • अस्थमा और एलर्जी का रिस्क: कुछ रिसर्च बताती हैं कि डिब्बाबंद प्रोसेस्ड मीट में नाइट्राइट की क्वांटिटी ज्यादा होती है, जिससे ब्रीदिंग पाइप में स्वेलिंग हो सकती है और अस्थमा की प्रॉब्लम बढ़ सकती है.
    • डाइजेस्टिव प्रॉब्लम्स: डिब्बा बंद खाना हमारे डाइजेस्टिव सिस्टम पर ज्यादा प्रेशर डालता है, जिससे यह नॉर्मली वर्क करने में  असमर्थ हो सकता है. इससे पेट से रिलेटेड प्रॉब्लम्स जैसे इनडाइजेशन, गैस, और इर्रेगुलर बाउल मूवमेंट की प्रॉब्लम हो सकती है.
    • अर्ली एजिंग: कुछ रिसर्च बताती हैं कि अत्यधिक प्रोसेस्ड और डिब्बाबंद फूड का कंजम्पशन सेल्स और टिश्यूज को तेजी से बूढ़ा कर सकता है, जिससे बायोलॉजिकल एज या जैविक उम्र बढ़ जाती है.

ऐसे में क्या करें आप?

    • जितना हो सके फ्रेश और होममेड (घर का बना) खाना खाएं.
    • पैकेज्ड फूड के लेबल को केयरफुली पढ़ें और कम सोडियम, शुगर और अनहेल्दी फैट वाले प्रोडक्ट्स चूज करें.
    • फ्रूट्स, वेजिटेबल्स, पल्सेस और होल ग्रेन को अपनी डाइट का मेन पार्ट बनाएं.
    • अगर डिब्बा बंद खाना खाना ही पड़े, तो उसे मॉडरेशन या कम मात्रा में खाएं.
    • कुल मिलाकर, डिब्बा बंद खाना हमारी सुविधा के लिए तो अच्छा है, लेकिन हमारी हेल्थ के लिए यह साइलेंट किलर साबित हो सकता है. इसलिए, हमें अपनी डाइट के प्रति सचेत रहना चाहिए और नेचुरल व होल फूड्स  को प्रेफरेंस देनी चाहिए.

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

‘सन ऑफ सरदार 2’ में रवि किशन निभाएंगे दमदार भूमिका: संसद से लेकर बॉलीवुड तक जीत रहे हैं लोगों का दिल

भाजपा सांसद और स्टार अभिनेता रवि किशन कि आगामी फिल्म ‘सन ऑफ सरदार 2’ जल्द ही सिनेमाघर में रिलीज होने वाली है. इस फिल्म में वे नए अवतार में नजर आएंगे. फिल्म का टीजर रिलीज होने के साथ ही रवि किशन की अभिनय की चर्चा आम हो गई है. उनके सभी चाहने वाले फिल्म के रिलीज का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. हिंदी भोजपुरी सहित अलग-अलग भाषाओं में 700 से अधिक फिल्में कर चुके रवि किशन संसद से लेकर बॉलीवुड तक अपने अनुशासन और सहजता से लोगों का दिल जीत रहे हैं. उन्हें हाल ही में आइफा अवार्ड मिल चुका है. 26 जुलाई को उन्हें संसद रत्न सम्मान से सम्मानित किया जाएगा.

राजनीती के साथ बॉलीवुड में भी चमक रहा है नाम 

गोरखपुर से लगातार दूसरी बार सांसद बने रवि किशन ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीट पर चुनाव लड़कर साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अपना परचम लहराया. संत के सानिध्य में उन्होंने भाजपा का झंडा बुलंद किया. साल 2019 में चुनाव जीतने के बाद भी उनका बॉलीवुड, भोजीवुड और टॉलीवुड का सफर थमा नहीं. वे लगातार जहां फिल्में करते रहे, तो वहीं गोरखपुर ली जनता और संसद में उपस्थित के साथ सबसे अधिक सवाल करने का रिकार्ड भी अपने नाम करते रहे. गोरखपुर का सांसद होने के नाते हुए विकास के विभिन्न कार्यों से जुड़ी गतिविधियों को गति देने के लिए संबंधित विभाग के मंत्रियों से मिलकर उस काम को भी पूरा करते रहे।

साल 2019 के चुनाव जीतने के बाद पांच साल गुजर गए. साल 2024 का लोकसभा चुनाव भी सिर पर आ गया. तमाम तरह की चर्चाएं भी होने लगी. लेकिन इन चर्चाओं के बीच सांसद रवि किशन का कद बढ़ता गया और 2024 के चुनाव में भाजपा ने दोबारा उन्हें प्रत्याशी घोषित कर दिया. विपरीत लहर के बीच भी उन्होंने शीर्ष नेतृत्व का विश्वास जीत और लगातार दूसरी बार चुनाव जीतकर यह साबित कर दिया कि उनका कोई सानी नहीं है.

‘सन ऑफ सरदार 2‘  में कैसा होगा रवि किशन का रोल?

देवगन फिल्म्स के बैनर तले बनी अजय देवगन और रवि किशन अभिनीत फिल्म ‘सन ऑफ सरदार 2’ में उनका नया अवतार दर्शकों को देखने को मिलेगा. ये फ़िल्म सिनेमाघरों और मल्टीप्लेक्स में 25 जुलाई को रिलीज़ होगी. फिल्मों में अपने तीखे संवाद और मजबूत परफॉर्मेंस के लिए पहचाने जाने वाले रवि किशन अब ‘सन ऑफ सरदार 2’ में एक बिल्कुल नए अवतार में नजर आएंगे. फिल्म 25 जुलाई 2025 को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज़ हो रही है.

‘बॉलीवुड ने मुझे अपनाया’

इसमें वे एक सरदार किरदार में नज़र आएंगे. जो दमदार, प्रभावशाली और एक्शन से भरपूर है. रवि किशन ने फिल्म के निर्देशक और को-स्टार अजय देवगन का विशेष रूप से आभार जताते हुए कहा है कि “बॉलीवुड ने उन्हें फिर से अपनाया है. इसके लिए अजय देवगन वे वे थैंक्स कहते हैं. यह फिल्म उनके लिए सिर्फ एक किरदार नहीं, संघर्ष के बाद मिली स्वीकृति का प्रतीक है।”

‘लापता लेडीज़‘ से ऑस्कर तक की यात्रा

रवि किशन की पिछली चर्चित फिल्म ‘लापता लेडीज़’, जिसमें वे केंद्रीय भूमिका में थे, भारत की ओर से ऑस्कर 2025 के लिए आधिकारिक नामांकन बन चुकी है. यह उनके अभिनय के प्रति इंडस्ट्री के सम्मान और दर्शकों के प्रेम का प्रतीक है. यह फिल्म सामाजिक विषयों को हास्य और संवेदनशीलता के साथ पेश करती है, जिसमें रवि किशन की भूमिका दर्शकों के दिल में घर कर जाती है.

आईफा अवॉर्ड से भी हुए सम्मानित

हाल ही में रवि किशन को IIFA अवॉर्ड  से भी नवाज़ा गया. यह पुरस्कार उनकी एक्टिंग जर्नी और कंटेंट ड्रिवन रोल्स के लिए दिया गया. OTT पर भी उनके प्रदर्शन ने लोगों को हैरान किया है. गोरखपुर से सांसद बनकर उन्होंने अपने क्षेत्र में रेलवे सुविधाओं में सुधार, युवा रोजगार केंद्र की पैरवी, सड़क व जलनिकासी योजनाओं में गति और फिल्म सिटी पूर्वांचल में लाने के प्रयास शुरू किए हैं. उनकी कोशिश है कि पूर्वांचल सिर्फ गौरव की भूमि ही नहीं, संभावनाओं का केंद्र भी बने. रवि किशन शुक्ला की कहानी सिर्फ एक सफल अभिनेता की नहीं, बल्कि एक साधारण परिवार से निकलकर राष्ट्रीय पहचान बनाने वाले संघर्षशील बेटे की है।