Home Blog Page 578

नीतिगत निरंतरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए डॉ. राजेश्वर सिंह का ऐतिहासिक प्रस्ताव : उत्तर प्रदेश स्ट्रैटेजी एवं डेवलपमेंट कमीशन (UP-SDC)” की स्थापना की मांग

लखनऊ। उत्तर प्रदेश को 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने और भारत @2047 के विज़न में अग्रणी भूमिका दिलाने के लिए, सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर “उत्तर प्रदेश स्ट्रैटेजी एवं डेवलपमेंट कमीशन (UP-SDC)” की स्थापना का प्रस्ताव रखा है।

क्यों ज़रूरी है नीतिगत थिंक-टैंक

डॉ. सिंह का मानना है कि उत्तर प्रदेश आज जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है—कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ई-मोबिलिटी, सेमीकंडक्टर, जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और कृषि सुधार—उनका समाधान केवल पारंपरिक प्रशासनिक ढांचे से संभव नहीं है। इन जटिल और तकनीकी मुद्दों पर दीर्घकालिक दृष्टि और वैश्विक तुलना आवश्यक है। इसके लिए एक स्थायी और विशेषज्ञ-आधारित आयोग अनिवार्य है।

वैश्विक मॉडल से प्रेरणा

पत्र में डॉ. सिंह ने उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका का Council of Economic Advisers (CEA) और Congressional Budget Office (CBO), ब्रिटेन का Office for Budget Responsibility (OBR), सिंगापुर का Committee on the Future Economy (CFE), चीन का National Development and Reform Commission (NDRC) और दक्षिण कोरिया का Presidential Advisory Council on Science & Technology जैसे संस्थान इन देशों की आर्थिक प्रगति में निर्णायक रहे हैं।

भारत में भी नीति आयोग और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद मौजूद है, वहीं राज्यों में केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र इस दिशा में प्रयोग कर चुके हैं।

निजी कंसल्टेंसी से अलग क्यों होगा UP-SDC

डॉ. सिंह ने कहा कि निजी कंसल्टेंसी कंपनियां जैसे PwC, Deloitte, McKinsey अक्सर लाभ-केन्द्रित रिपोर्ट बनाती हैं, जिनमें स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकताओं की अनदेखी हो जाती है। उत्तर प्रदेश को ऐसी रिपोर्ट-निर्माता एजेंसी नहीं, बल्कि विधिक शक्ति प्राप्त, जवाबदेह और दीर्घकालिक दृष्टि वाली संस्था चाहिए।

प्रस्तावित ढांचा : UP-SDC

संरचना – अर्थशास्त्र, प्रौद्योगिकी, कृषि, कानून, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग व आधारभूत ढांचे के विशेषज्ञों के साथ वरिष्ठ जनप्रतिनिधि व प्रमुख नौकरशाह।

कार्य – UP Vision 2047 दस्तावेज तैयार करना, नीतियों का वित्तीय एवं नियामकीय आकलन करना, विश्वविद्यालयों व उद्योग जगत से सरकार को जोड़ना, योजनाओं के परिणामों की समीक्षा करना, पॉलिसी इनोवेशन लैब बनाना।

स्वतंत्रता – निश्चित कार्यकाल, सुरक्षित बजट और डेटा तक विधिक पहुँच।

संभावित लाभ

  • विश्वस्तरीय और प्रतिस्पर्धी नीतियों का निर्माण।
  • निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में यूपी की विश्वसनीयता बढ़ना।
  • राजनीतिक व प्रशासनिक बदलावों से परे नीतिगत निरंतरता बनाए रखना।
  • 1 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी का लक्ष्य शीघ्र पूरा होना।
  • योजनाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन और सतत सुधार सुनिश्चित करना।
  • “ऐतिहासिक कदम” – डॉ. राजेश्वर सिंह

डॉ. सिंह ने अपने पत्र में इसे ऐतिहासिक पहल बताते हुए मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि आयोग की स्थापना के लिए विधायी प्रक्रिया शीघ्र प्रारंभ की जाए।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से राज्य निर्माण सहकारी संघ के निदेशक डॉ. प्रवीण सिंह जादौन ने की मुलाकात : गौशाला प्रबंधन को सहकारी समितियों के हवाले करने का रखा सुझाव

  • डॉ. प्रवीण सिंह जादौन ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से गौशालाओं के संचालन को सहकारी समितियों (बी-पैक्स) के माध्यम से कराने का प्रस्ताव रखा।
  • सहकारी समितियों को शामिल करने से किसानों और ग्रामीण महिलाओं को रोजगार और आय के नए अवसर मिलेंगे।
  • गोबर से जैविक खाद बनाने से खेती टिकाऊ बनेगी और मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि होगी।
  • ग्रामीण महिलाएँ गोबर आधारित उत्पाद (जैसे अगरबत्ती, पैलेट, ऊर्जा ब्रिकेट्स) बना कर आत्मनिर्भर बन सकेंगी।
  • सहकारिता आंदोलन के माध्यम से ‘आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को बल मिलेगा।

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से शुक्रवार को लखनऊ स्थित उनके सरकारी आवास पर उत्तर प्रदेश राज्य निर्माण सहकारी संघ लखनऊ के निदेशक डॉ. प्रवीण सिंह जादौन ने मुलाकात की। इस शिष्टाचार भेंट के दौरान डॉ. जादौन ने मुख्यमंत्री को एक सुझाव पत्र सौंपा, जिसमें प्रदेश की गौशालाओं को सहकारी समितियों (बी पैक्स) के माध्यम से संचालित करने का प्रस्ताव रखा गया।

सहकारी समितियों के जरिए गौशालाओं का प्रबंधन क्यों ज़रूरी?

डॉ. प्रवीण सिंह जादौन ने मुख्यमंत्री के समक्ष तर्क देते हुए कहा कि सहकारी समितियाँ गाँव-गाँव तक अपनी मजबूत पकड़ रखती हैं और ग्रामीण समाज से गहराई से जुड़ी हुई हैं। ये समितियाँ न केवल किसानों बल्कि ग्रामीण महिलाओं को भी सीधे तौर पर जोड़ने का काम करती हैं।

उन्होंने कहा कि यदि गौशालाओं का प्रबंधन सहकारी समितियों को सौंपा जाता है, तो—

  • सहकारिता आंदोलन को नई गति मिलेगी।
  • समितियों के स्तर पर ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
  • ग्रामीण स्तर पर गोबर आधारित जैविक खाद का उत्पादन होगा, जिससे किसानों को आसानी से सस्ती और गुणवत्तापूर्ण खाद उपलब्ध हो सकेगी।
  • खेती को टिकाऊ बनाने और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद मिलेगी।

ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का अवसर

डॉ. जादौन ने बताया कि सहकारी समितियों के जरिए ग्रामीण महिलाओं को भी सीधा लाभ मिलेगा। महिलाएँ गाय के गोबर से बने विभिन्न उत्पादों का उत्पादन कर सकती हैं, जैसे—

  • अगरबत्ती
  • दीये और दीपक
  • खाद पैलेट
  • ऊर्जा ब्रिकेट्स

इन उत्पादों का स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर विपणन किया जा सकता है। इससे महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी।

आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में पहल

डॉ. जादौन ने मुख्यमंत्री से कहा कि इस नए दृष्टिकोण के माध्यम से गौ-संरक्षण भी सुनिश्चित होगा और साथ ही किसानों व ग्रामीण समाज को बहुआयामी लाभ मिलेगा। सहकारिता आंदोलन को इस दिशा में जोड़ने से “आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश” और “आत्मनिर्भर भारत” की दिशा में एक मजबूत कदम साबित होगा।

आलू उत्पादक किसानों की समस्याओं पर विमल कटियार की चर्चा

इस अवसर पर उत्तर प्रदेश आलू विपणन सहकारी संघ के अध्यक्ष विमल कटियार भी मौजूद रहे। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से आलू उत्पादक किसानों की समस्याओं पर विस्तार से बातचीत की।

कटियार ने मुख्यमंत्री को बताया कि आलू किसानों को उत्पादन की लागत के अनुरूप मूल्य नहीं मिल पा रहा है और विपणन व्यवस्था में भी कई खामियाँ हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की कि—

  • किसानों को उचित मूल्य दिलाने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएँ।
  • विपणन व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ और पारदर्शी बनाया जाए।
  • ठंडे घरों (कोल्ड स्टोरेज) और मंडी व्यवस्था में सुधार कर किसानों को राहत प्रदान की जाए।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दोनों प्रतिनिधियों के सुझावों को गंभीरता से सुना और भरोसा दिलाया कि सरकार किसानों व गौशालाओं से जुड़े मुद्दों पर सकारात्मक पहल करेगी।

यह मुलाकात न केवल गौशालाओं के बेहतर प्रबंधन की दिशा में नए रास्ते खोल सकती है, बल्कि किसानों और ग्रामीण महिलाओं के लिए भी रोजगार और आत्मनिर्भरता का बड़ा माध्यम बन सकती है। सहकारिता आंदोलन को इसमें जोड़ने से गाँवों में नई ऊर्जा और विकास की लहर दौड़ सकती है।

Health Tips:अगर ये 5 आदतें नहीं छोड़ेंगे तो फैटी लिवर बन सकता है कैंसर, तुरंत करें बदलाव

फैटी लिवर आज के समय में बहुत ही आम बीमारी बन गई है. इसमें लिवर के अंदर चर्बी जमा हो जाती है. इसके दो मुख्य प्रकार होते हैं पहला  alcoholic fatty liver disease (AFLD) और दूसरा nonalcoholic fatty liver disease (NAFLD). खासकर NAFLD उन लोगों में ज्यादा देखा जाता है जो शराब नहीं पीते या बहुत कम पीते हैं. अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह धीरे-धीरे NASH (nonalcoholic steatohepatitis), cirrhosis और आखिरकार लिवर कैंसर तक का रूप ले सकता है.

लिवर को स्वस्थ रखने के लिए हमें अपनी रोजमर्रा की आदतों पर ध्यान देना चाहिए. आइए जानते हैं 5 ऐसी आदतें, जो फैटी लिवर को कैंसर में बदल सकती हैं और उनसे बचाव का तरीका क्या है.

 ज्यादा मीठा और पैकेज्ड खाना

अगर आप रोज़ाना कोल्ड ड्रिंक, कैंडी, बिस्किट, चिप्स, पैकेज्ड स्नैक्स या फास्ट फूड खाते हैं तो यह सीधे लिवर में चर्बी जमा करता है. रिसर्च कहती है कि जो लोग ज्यादा शुगर-ड्रिंक लेते हैं, उन्हें फैटी लिवर का खतरा 40 प्रतिशत ज्यादा होता है. लंबे समय तक ऐसा करने से सूजन होती है और कैंसर का रिस्क बढ़ जाता है. आप इससे बचने के लिए ताजी सब्जियां, फल, साबुत अनाज, ड्राई फ्रूट्स और हेल्दी प्रोटीन खाना शुरू करें.

घंटों बैठकर रहना

आजकल लोग कहते हैं “Sitting is the new smoking” यानी ज्यादा देर बैठना भी उतना ही नुकसानदायक है. लंबे समय तक बैठे रहने से फैट मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है और लिवर में चर्बी जमा होने लगती है. इससे बचने के लिए आप हर हफ्ते 150 मिनट वॉक, साइकलिंग या स्विमिंग जैसी एक्टिविटी करें. फोन पर बात करते वक्त टहलें या सीढ़ियों का इस्तेमाल करें.

तली-भुनी चीजें और जंक फूड

फ्राइड फूड, पिज़्ज़ा, बर्गर, पैकेज्ड नूडल्स जैसी चीजों में सैचुरेटेड और ट्रांस फैट होता है. ये लिवर को ओवरलोड कर देते हैं और लंबे समय में सिरोसिस और लिवर कैंसर का खतरा बढ़ा देते हैं. इससे बचने के लिए आप अपने खाने में ओलिव ऑयल, मछली, बीज (seeds), एवोकाडो शामिल करें. लाल मांस (red meat) कम खाएं और Mediterranean diet को फॉलो करें.

 मोटापा और पेट पर चर्बी

ओवरवेट होना फैटी लिवर का सबसे बड़ा कारण है. खासकर अगर चर्बी पेट पर ज्यादा जमा है तो लिवर पर सीधा असर पड़ता है. मोटापा इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाता है और लिवर में चर्बी तेजी से जमा होती है. 5 से 10 प्रतिशत वजन घटाने से ही लिवर टेस्ट के रिज़ल्ट बेहतर हो जाते हैं. इसके लिए संतुलित डाइट, छोटे-छोटे पोर्शन, ज्यादा पानी और एक्सरसाइज जरूरी है.

 शराब और स्मोकिंग

शराब और सिगरेट दोनों ही लिवर के लिए ज़हर से कम नहीं हैं. शराब से लिवर सेल्स को नुकसान होता है और स्मोकिंग से शरीर में टॉक्सिन्स जाते हैं जो लिवर में सूजन और कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं. शराब को पूरी तरह छोड़ दें या बहुत कम करें और स्मोकिंग को तुरंत बंद करें. पानी, ब्लैक कॉफी और हर्बल टी बेहतर विकल्प हैं.

फैटी लिवर धीरे-धीरे खतरनाक बीमारियों में बदल सकता है, लेकिन अगर आप रोज़ की कुछ आदतें बदल लें तो इससे आसानी से बचा जा सकता है. हेल्दी डाइट, नियमित व्यायाम, शराब और स्मोकिंग से दूरी यही वो रास्ते हैं जो आपको फैटी लिवर से कैंसर तक जाने से रोक सकते हैं.

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

‘कुली’ की कम होती कमाई ने बढ़ाई मेकर्स की चिंता, फिल्म हिट होगी या घाटे में जाएगी?

रजनीकांत स्टारर ‘कुली’ ने 14 अगस्त को सिनेमाघरों में दस्तक दी थी. फिल्म का ऋतिक रोशन और जूनियर एनटीआर की वॉर 2 से क्लैश हुआ था. हालांकि ‘कुली’ पर इसका कोई असर नहीं हुआ और ये बॉक्स ऑफिस नंबर्स में वॉर 2 से आगे ही चल रही है. हालांकि वीकडेज में रजनीकांत की फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर मिक्स्ड से लेकर निगेटिव रिव्यू के बीच कमज़ोर पड़ रही है. सोमवार के बाद मंगलवार को भी इसके कलेक्शन में भारी गिरावट दर्ज की गई. चलिए यहां जानते हैं ‘कुली’ ने रिलीज के 7वें दिन यानी बुधवार को कितना कलेक्शन किया है?

‘कुली’ ने 7वें दिन कितनी की कमाई?
लोकेश कनगराज निर्देशित ‘कुली’ ने बॉक्स ऑफिस पर एक हफ्ता पूरा कर लिया है. इस फिल्म में रजनीकांत के अलावा नागार्जुन, श्रुति हासन, आमिर खान, पूजा हेगड़े और उपेंद्र सहित कई दमदार कलाकार हैं. ये फिल्म पांच भाषाओं में रिलीज की गई थी तमिल, तेलुगु, हिंदी, मलयालम और कन्नड़, जिससे इसकी पैन इंडिया अपील बढ़ गई थी. उम्मीद के मुताबिक इस मूवी की  रिकॉर्ड तोड़ शुरुआत हुई थी और ओपनिंग वीकेंड पर भी इसने तूफानी रफ्तार से कमाई की. लेकिन वीकडेज में इसका डब्बा गोल हो गया हैं और ये मंदी का शिकार हो गई. सोमवार से ‘कुली’ की कमाई में गिरावट जारी है जो अब मेकर्स की टेंशन बढ़ा रही है.

    • वहीं फिल्म के कलेक्शन की बात करें तो ‘कुली’ ने रिलीज के पहले दिन 65 करोड़, दूसरे दिन 54.75 करोड़, तीसरे दिन 39.5 करोड़, चौथे दिन 35.25 करोड़, पांचवें दिन 12 करोड़ और छठे दिन 9.51 करोड़ का कलेक्शन किया.
    • अब सैकनिल्क की अर्ली ट्रेंड रिपोर्ट के मुताबिक ‘कुली’ ने रिलीज के 7वें दिन 8 करोड़ का कलेक्शन किया है.
    • इसी के साथ ‘कुली’ की 7 दिनों की कुल कमाई अब 222.5 करोड़ रुपये हो गई है.

क्या ‘कुली’ वसूल पाएगी बजट? 
‘कुली’ के शुरुआती कारोबार को देखकर लग रहा था कि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सारे रिकॉर्ड ब्रेक कर देगी. हालांकि रिलीज के 7 दिन बाद भी ये फिल्म भारतीय बॉक्स ऑफिस पर 250 करोड़ का आंकड़ा पार नहीं कर पाई है. वहीं ये फिल्म 300 से 400 करोड़ के भारी-भरकम बजट में बनी हुई बताई जा रही है. ऐसे में घटती कमाई को देखते हुए ‘कुली’ के लिए अपना बजट वसूलना हर गुजरते दिन के साथ मुश्किल होता जा रहा है. हालांकि मेकर्स को उम्मीद है कि फिल्म की कमाई में दूसरे वीकेंड पर तेजी आएगी. देखने वाली बात होगी कि ‘कुली’ दूसरे शनिवार और दूसरे रविवार को कितना कलेक्शन करती है. अगर इसकी कमाई नहीं बढ़ी तो ये फिल्म हिट होते-होते फ्लॉप होने के कागार पर पहुंच जाएगी.

Medicine in Fever:बुखार होने पर तुरंत दवा ले लेना सही है या नहीं, डॉक्टर्स क्या सलाह देते हैं

 बुखार ऐसा लक्षण है, जिसे सुनते ही ज्यादातर लोग तुरंत दवाई लेने की सोचने लगते हैं. लेकिन क्या सच में बुखार चढ़ते ही गोली खा लेनी चाहिए? यह सवाल अक्सर हर किसी के मन में आता है. कई बार लोग हल्का-सा तापमान होते ही पैरासिटामोल या दूसरी दवाइयां खा लेते हैं, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि, हर बार ऐसा करना जरूरी या सही नहीं होता. दरअसल, बुखार अपने आप में कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर का एक संकेत है कि अंदर कोई इंफेक्शन या गड़बड़ी हो रही है. ऐसे में दवा कब लेनी चाहिए और कितना इंतजार करना चाहिए, इस बारे में डॉक्टरों की राय जानना जरूरी है.

डॉ. महेश हीरानंदानी का कहना है कि, बुखार आने पर तुरंत दवा लेना सही नहीं है. हल्के बुखार में शरीर को अपने आप संक्रमण से लड़ने का मौका देना चाहिए. अगर तापमान 100 या 101 डिग्री तक है और मरीज को ज्यादा परेशानी नहीं है, तो दवा लेने की आवश्यकता नहीं होती. लेकिन अगर बुखार 102 डिग्री से ऊपर चला जाए, सिरदर्द, शरीर में दर्द या कमजोरी ज्यादा हो, तो डॉक्टर से सलाह लेकर ही दवा लेनी चाहिए.

कब लेनी चाहिए दवा?

    • अगर बुखार 101-102 डिग्री से ज्यादा हो
    • बच्चे, बुजुर्ग या पहले से बीमार व्यक्ति को तेज बुखार हो
    • बुखार के साथ सांस लेने में तकलीफ, चक्कर या उल्टी हो
    • बुखार 2 दिन तक लगातार बना रहे
    • तुरंत दवा न खाने के फायदे
    • शरीर की इम्यूनिटी मजबूत होती है
    • इंफेक्शन से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता बनी रहती है
    • बिना जरूरत दवा खाने से बचाव होता है, जिससे लिवर और किडनी पर दबाव नहीं पड़ता

कब डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें?

    • अगर बच्चे को बुखार हो और साथ में झटके आएं
    • बुखार के साथ सांस फूलना या तेज खांसी हो
    • बुखार लगातार 3 दिन तक बना रहे
    • बुखार के साथ बेहोशी या भ्रम की स्थिति हो

बुखार शरीर का एक नैचुरल अलार्म है जो हमें यह बताता है कि शरीर के अंदर कुछ गड़बड़ है. हर बार बुखार आने पर तुरंत दवा खाना सही तरीका नहीं है. हल्के बुखार में आराम और पर्याप्त पानी पीना ही काफी होता है. लेकिन अगर बुखार ज्यादा बढ़ जाए या लंबे समय तक बना रहे, तो डॉक्टर की सलाह लेना ही सबसे सुरक्षित उपाय है.

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.