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Health Tips:“बदलते मौसम में इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए इन चीजों को अपनी डाइट में जरूर शामिल करें”

मौसम बदलते ही बहुत से लोग सर्दी, जुकाम, बुखार या गले के संक्रमण की चपेट में आ जाते हैं.  इन संक्रमण का सबसे बड़ा कारण कमजोर इम्यूनिटी होती है. जब शरीर की इम्यूनिटी कमजोर होती हैं तो वह बदलते तापमान और संक्रमण से प्रभावी ढंग से नहीं लड़ पाती है. ऐसे में जरूरी होता है कि आप बदलते मौसम के साथ आप अपनी डाइट में ऐसी चीजें शामिल करें जो शरीर को अंदर से मजबूत बनाएं और इम्यूनिटी को बूस्ट करें.

डाइट में शामिल करें ये चीजें

बादाम 

बादाम में हेल्दी फैट्स और विटामिन-ई भरपूर मात्रा में होता है, जो कोशिकाओं को डैमेज होने से बचाता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है. ऐसे में बदलते मौसम के साथ रोजाना कुछ बादाम भिगोकर खाने से शरीर को पर्याप्त पोषण मिलता है और थकान भी दूर होती है.

आंवला 

आंवला इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए सबसे बेहतर फल माना जाता है. इसमें विटामिन-सी भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जो शरीर में एंटीऑक्सीडेंट्स बढ़ाता है और इम्यून सेल्स को एक्टिव करता है. रोजाना एक आंवला खाने से शरीर मजबूत बनता है और बदलते मौसम के साथ सर्दी जुकाम जैसी समस्याएं भी दूर रहती है. ऐसे में आप इसका जूस या मुरब्बा बनाकर भी खा सकते हैं.

हल्दी 

हल्दी में मौजूद करक्यूमिन नामक तत्व में शक्तिशाली एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं सर्दियों के मौसम में रोज रात को हल्दी वाला दूध पीना बहुत फायदेमंद होता है. यह न सिर्फ शरीर को अंदर से गर्म रखता है, बल्कि संक्रमण से भी बचाता है.

संतरा 

सर्दी के मौसम में संतरा एक जरूरी फल माना जाता है. इसमें मौजूद विटामिन-सी शरीर को संक्रमणों से बचाते हैं और व्हाइट ब्लड सेल्स के उत्पादन को बढ़ाते हैं. रोज एक संतरा खाने से सर्दी जुकाम जैसी मौसमी बीमारियां दूर रहती है और शरीर ऊर्जावान महसूस करता है.

मेवे और बीज 

मेवे और बीज जैसे अखरोट, सूरजमुखी के बीज और कद्दू के बीच में जिंक ओमेगा-3 फैटी एसिड और विटामिन ए पाया जाता है, जो इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने में मदद करते हैं. इन्हें डाइट में शामिल करने से शरीर की इम्यूनिटी मजबूत होती है.

नींबू पानी 

बदलते मौसम के साथ आप अपनी डाइट में नींबू पानी भी शामिल कर सकते हैं. सुबह के समय गुनगुना नींबू पानी पीना शरीर के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है. यह शरीर को डिटॉक्स करता है और पाचन को बेहतर बनाता है. नींबू में मौजूद विटामिन-सी संक्रमण से बचने और इम्यूनिटी बढ़ाने में भी मदद करता है.

बदलते मौसम के साथ इन बातों का भी रखिए ध्यान 

    • अच्छी नींद लें- नींद की कमी से इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ जाता है, ऐसे में बदलते मौसम के साथ रोजाना 7 से 8 घंटे की नींद लें.
    • योग और ध्यान करें- तनाव इम्यूनिटी पर नकारात्मक असर डालता है. रोज थोड़ी देर ध्यान और योग करने से मेंटल और फिजिकल दोनों हेल्थ बेहतर रहती है.
    • पर्याप्त पानी पिएं- कोशिश करें कि बदलते मौसम के साथ भी दिन भर हाइड्रेट रहे. इससे शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं और संक्रमण का खतरा कम होता है.

भविष्य की शिक्षा होगी AI आधारित : सरोजिनी नगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपा “AI संचालित शिक्षा नीति 2050” का प्रस्ताव

  • डॉ. राजेश्वर सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को “AI संचालित शिक्षा नीति 2050” का प्रस्ताव सौंपा।
  • प्रस्ताव में उत्तर प्रदेश को शिक्षा नवाचार और वैश्विक ज्ञान केंद्र बनाने की परिकल्पना की गई।
  • 2030 तक एक लाख AI-सक्षम स्मार्ट स्कूल स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।
  • हर छात्र को डिजिटल उपकरण और इंटरनेट सुविधा देकर शिक्षा में समानता सुनिश्चित की जाएगी।
  • “फ्यूचर लर्निंग मिशन 2050” के जरिए यूपी को भारत की शिक्षा क्रांति का अग्रदूत बनाने की योजना है।

लखनऊ, True News UP: उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप तैयार करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए सरोजनीनगर के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने सोमवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को “AI आधारित व्यक्तिगत शिक्षा नीति 2050 (Future Learning Vision Policy)” का प्रस्ताव सौंपा। इस नीति का उद्देश्य उत्तर प्रदेश को न केवल शिक्षा नवाचार की राजधानी बनाना है, बल्कि उसे एक ऐसे वैश्विक ज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित करना है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए दिशा तय करे।

शिक्षा का नया अध्याय – पाठ्यपुस्तकों से टेक्नोलॉजी और क्लाउडरूम तक

डॉ. राजेश्वर सिंह ने प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए कहा कि किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूंजी उसकी शिक्षा है। जब पूरी दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) की ओर अग्रसर हो रही है, तब उत्तर प्रदेश को भी शिक्षा के भविष्य की दिशा में निर्णायक कदम उठाने की आवश्यकता है। उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विद्वान हावर्ड गार्डनर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2050 तक पारंपरिक कक्षाओं की जगह AI-संचालित, जिज्ञासा-आधारित और परियोजना-केंद्रित शिक्षा प्रणाली लेगी, जिसमें विद्यार्थी केवल जानकारी प्राप्त नहीं करेंगे, बल्कि सृजन और नवाचार के केंद्र में होंगे।

डॉ. सिंह के अनुसार, आने वाले वर्षों में शिक्षा का परिदृश्य पूरी तरह बदल जाएगा। अब बच्चे पुस्तकों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वे क्लाउडरूम्स, इंटरएक्टिव प्लेटफॉर्म और वर्चुअल लैब्स के माध्यम से अपनी सीखने की प्रक्रिया को नया आयाम देंगे। शिक्षा अब विषयों का बोझ नहीं रहेगी, बल्कि अनुभव का विस्तार बनेगी।

शिक्षकों की भूमिका में परिवर्तन – अध्यापन से मार्गदर्शन तक की यात्रा

इस नीति का सबसे बड़ा आधार शिक्षकों की भूमिका में मूलभूत परिवर्तन है। डॉ. राजेश्वर सिंह ने स्पष्ट किया कि भविष्य की शिक्षा में शिक्षक अब केवल पढ़ाने वाले नहीं होंगे, बल्कि ‘लर्निंग मेंटर’, यानी सीखने की प्रक्रिया में मार्गदर्शक की भूमिका निभाएंगे। वे विद्यार्थियों की जिज्ञासा को दिशा देंगे, उन्हें परियोजना-आधारित शिक्षा के माध्यम से वास्तविक समस्याओं के समाधान सिखाएंगे और नवाचार के प्रति प्रेरित करेंगे।

AI-सक्षम उपकरणों के माध्यम से शिक्षक हर छात्र की सीखने की गति, उसकी रुचियों और कमजोरियों का विश्लेषण कर सकेंगे। इस तरह शिक्षा प्रणाली ‘एक जैसा सबके लिए’ नहीं, बल्कि ‘हर बच्चे के लिए विशेष’ बन सकेगी। यह परिवर्तन अध्यापन को मानवीय संवेदना और तकनीकी दक्षता दोनों से जोड़ता है।

डिजिटल समानता की क्रांति – हर बच्चे तक पहुंचे शिक्षा का अवसर

डॉ. राजेश्वर सिंह के प्रस्ताव में डिजिटल इक्विटी को एक सामाजिक न्याय की अवधारणा के रूप में रखा गया है। उनका कहना है कि शिक्षा तभी सार्थक होगी जब वह हर बच्चे तक समान रूप से पहुंचे। इसी उद्देश्य से उन्होंने ₹10,000 करोड़ का डिजिटल इक्विटी फंड स्थापित करने का सुझाव दिया है, जिसके अंतर्गत हर विद्यार्थी को टैबलेट, इंटरनेट और विश्वसनीय बिजली की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।

वर्ष 2030 तक एक लाख AI-सक्षम स्मार्ट स्कूलों की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है। यह न केवल शिक्षण पद्धति में बदलाव लाएगा, बल्कि ग्रामीण और शहरी शिक्षा के बीच की गहराई को भी खत्म करेगा। उत्तर प्रदेश के किसी भी गांव का बच्चा अब शिक्षा के अवसरों में लखनऊ या नोएडा के छात्र से पीछे नहीं रहेगा।

मूल्यांकन प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव – अब रटना नहीं, समझना और सृजन करना होगा आधार

डॉ. सिंह के अनुसार, वर्तमान परीक्षा प्रणाली छात्रों को केवल अंकों तक सीमित करती है, जबकि भविष्य की शिक्षा को रचनात्मकता और समस्या-समाधान क्षमता को प्रोत्साहित करना चाहिए। नई नीति में मूल्यांकन की प्रक्रिया को AI आधारित निरंतर मूल्यांकन प्रणाली से जोड़ा जाएगा।

अब छात्रों का आकलन केवल याददाश्त पर नहीं, बल्कि उनकी सोचने की क्षमता, नवाचार के स्तर और वास्तविक जीवन की चुनौतियों को हल करने की योग्यता पर किया जाएगा। इसके लिए अर्ली इंटरवेंशन एनालिटिक्स का उपयोग होगा, जिससे कमजोर छात्रों की पहचान समय रहते की जा सकेगी और उन्हें विशेष सहायता प्रदान की जा सकेगी। यह शिक्षा को न केवल अधिक न्यायसंगत बनाएगा, बल्कि विद्यार्थियों की आत्मविश्वास वृद्धि में भी सहायक होगा।

शिक्षक सशक्तिकरण – दस लाख अध्यापकों को AI साक्षर बनाने का संकल्प

शिक्षा सुधार का मूल स्तंभ शिक्षक हैं। डॉ. राजेश्वर सिंह ने प्रस्ताव में एक महत्वाकांक्षी योजना शामिल की है, AI टीचर ट्रेनिंग मिशन, जिसके तहत उत्तर प्रदेश के 10 लाख शिक्षकों को भविष्य की शिक्षा प्रणाली के अनुरूप प्रशिक्षित किया जाएगा।

इन शिक्षकों को डिजिटल अकादमियों, ऑनलाइन सिमुलेशन और क्षेत्रीय शिक्षण केंद्रों के माध्यम से प्रशिक्षण दिया जाएगा। यह प्रशिक्षण उन्हें न केवल AI उपकरणों का उपयोग सिखाएगा, बल्कि यह भी बताएगा कि तकनीक को मानवीय मूल्यों के साथ कैसे जोड़ा जाए। जो शिक्षक AI-संयुक्त शिक्षण पद्धति को अपनाएंगे, उन्हें राज्य सरकार की ओर से विशेष मान्यता और प्रोत्साहन भी दिया जाएगा।

हर भाषा में शिक्षा – तकनीक से मिटेगी भाषाई बाधा

उत्तर प्रदेश जैसे विविध भाषाओं वाले राज्य में भाषा अक्सर शिक्षा की राह में बाधा बनती है। डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने प्रस्ताव में इस समस्या के समाधान के लिए एक अद्भुत दृष्टि प्रस्तुत की है। उन्होंने सुझाव दिया कि AI अनुवाद उपकरणों की मदद से शिक्षण सामग्री को सभी प्रमुख भारतीय और क्षेत्रीय भाषाओं में तैयार किया जाए।

इसके माध्यम से ग्रामीण, जनजातीय और अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों को भी समान अवसर मिलेंगे। हिंदी, भोजपुरी, अवधी, बुंदेलखंडी, उर्दू और अन्य स्थानीय भाषाओं में AI आधारित डिजिटल पुस्तकालयों और इंटरएक्टिव कंटेंट का निर्माण किया जाएगा। इससे भाषा अब शिक्षा की दीवार नहीं, बल्कि उसका पुल बनेगी।

AI नैतिकता और डेटा गोपनीयता – जिम्मेदार तकनीक की ओर कदम

डॉ. राजेश्वर सिंह के प्रस्ताव में यह भी सुनिश्चित किया गया है कि शिक्षा में तकनीक का उपयोग बिना जिम्मेदारी के नहीं होगा। उन्होंने “AI in Education Regulatory Board” की स्थापना का सुझाव दिया है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रयोग में नैतिकता और पारदर्शिता बनाए रखेगा।

यह बोर्ड विद्यार्थियों के डेटा की सुरक्षा, गोपनीयता और एल्गोरिदमिक निष्पक्षता के मानक तय करेगा, ताकि किसी भी छात्र के साथ डिजिटल असमानता या भेदभाव न हो। यह पहल उत्तर प्रदेश को शिक्षा के साथ-साथ तकनीकी नैतिकता में भी अग्रणी बनाएगी।

‘फ्यूचर लर्निंग मिशन 2050’ – उत्तर प्रदेश का बड़ा कदम

इस प्रस्ताव का केंद्रीय उद्देश्य “उत्तर प्रदेश फ्यूचर लर्निंग मिशन 2050” की स्थापना है। यह मिशन राज्य की शिक्षा प्रणाली में AI, IoT और वर्चुअल रियलिटी आधारित शिक्षण उपकरणों को सम्मिलित करेगा।

सरकारी और निजी दोनों स्कूलों में एक समान नवाचार-आधारित शिक्षा व्यवस्था लागू की जाएगी। इसके साथ ही वैश्विक विश्वविद्यालयों और एडटेक कंपनियों के साथ साझेदारी कर ज्ञान और तकनीक का आदान-प्रदान सुनिश्चित किया जाएगा। लखनऊ-कानपुर क्षेत्र को AI शिक्षा और नवाचार कॉरिडोर के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इस क्षेत्र में AI अनुसंधान प्रयोगशालाएं, शिक्षक अकादमियां और स्मार्ट विश्वविद्यालय परिसरों का निर्माण होगा, जिन्हें उत्तर प्रदेश के डिफेंस कॉरिडोर और AI सिटी प्रोजेक्ट्स से जोड़ा जाएगा।

ज्ञान, समानता और नवाचार – उत्तर प्रदेश की नई पहचान

इस नीति के संभावित लाभों पर डॉ. सिंह ने कहा कि यह पहल उत्तर प्रदेश को भारत की AI शिक्षा राजधानी बनने की दिशा में ले जाएगी। राज्य में रचनात्मकता, नवाचार और आलोचनात्मक सोच को नई ऊँचाइयाँ मिलेंगी। ग्रामीण और शहरी शिक्षा के बीच की खाई समाप्त होगी और युवाओं को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का अवसर मिलेगा।

उन्होंने जोर देकर कहा कि यह नीति किसी राजनीतिक सोच से प्रेरित नहीं, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के ज्ञान, समानता और सशक्तिकरण में निवेश का संकल्प है। यह वह मार्ग है, जो उत्तर प्रदेश को भारत की शिक्षा क्रांति का अग्रदूत बना सकता है।

भविष्य की कक्षा होगी डिजिटल

अपने प्रस्ताव के अंत में डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा, “उत्तर प्रदेश को भारत की शिक्षा क्रांति का नेतृत्व करना चाहिए, पीछे नहीं चलना चाहिए। भविष्य की कक्षा डिजिटल, गतिशील और समावेशी होगी – यही हमारे बच्चों का भविष्य और हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।”

“रोजर मूर का जन्मदिन: जानिए कैसे एक दर्जी का बेटा बन गया जेम्स बॉन्ड”

रोजर मूर, जो दुनिया को जेम्स बॉन्ड के सूट में नजर आए, लेकिन असलियत में वे अब भी दर्जी के बेटे थे, जो तकदीर से टक्सीडो (सूट) पहन बैठे. 14 अक्टूबर 1927 को लंदन में जॉर्ज अल्फ्रेड मूर और कलकत्ता में जन्मीं लिलियन के घर हुआ. जन्मदिन के मौके पर जानिए उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें

कैसे हुई फिल्मी करियर की शुरुआत?
पिता टेलर और फिर पुलिसकर्मी बने. घर में अनुशासन था, तो संघर्ष भी कम नहीं. मां-पिता की इस इकलौती संतान ने बाद में आर्ट स्कूल में दाखिला लेकर चित्रकारी शुरू की, पर एक दिन प्रोफेसर ने कहा—’तुम्हें पेंट नहीं, कैमरा संभालना चाहिए.’ यही संवाद उनकी जिंदगी में नया मोड़ ले आया. घर में अनुशासन था, लेकिन सपनों के लिए जगह नहीं.

फिल्मों में शुरुआत आसान नहीं थी. कभी टूथपेस्ट मॉडल, कभी टीवी में बैकग्राउंड चेहरे, कभी विज्ञापनों में मुस्कुराता शख्स—रोजर मूर को कोई गंभीरता से नहीं लेता था. लोग कहते थे, ‘चेहरे पर मत चलो, करियर दिमाग से बनता है.’ मगर वे शांत थे. इंतजार करते रहे. आखिरकार 1973 में ‘लिव एंड लेट डाई’ ने किस्मत के दरवाजे पर दस्तक दी. इस नए जेम्स बॉन्ड के लिए सब कुछ आसान नहीं था. वे सीन कॉनरी के बाद आए थे, और तुलना कोई रोक नहीं सकता था.

जेम्स बॉन्ड के नए रूप में जाने जाते थे रोजर मूर
वहीं रोजर मूर ने जेम्स बॉन्ड को नया रूप दिया—गुस्से की जगह व्यंग्य, क्रोध की जगह आंखों की धूर्त मुस्कान. उनकी ‘माइ नेम इज बॉन्ड… जेम्स बॉन्ड’ लाइन तलवार की तरह नहीं, रेशमी रूमाल की तरह लहराती थी. वे सिर्फ बॉन्ड नहीं बने—वे सबसे उम्रदराज बॉन्ड भी बने. आशंकाओं और संभावनाओं के बीच सवाल भी पूछे गए. किसी ने पूछा 45 की उम्र में पहली बार बॉन्ड और 58 की उम्र में आखिरी बार? जब इस उम्र पर सवाल हुआ, तो हंसकर बोले—’अगर बॉन्ड बुलेट्स (गोलियों) से बच सकता है तो उम्र क्या चीज है.’

भारत से हमेशा रहा खास रिश्ता 
मूर का भारत से भी खास संबंध रहा. एक तो मां वाला और दूसरा फिल्मों वाला! 1983 में ऑक्टोपसी की शूटिंग के लिए वो भारत आए थे. इस पूरे किस्से का जिक्र उन्होंने अपनी जीवनी माई वर्ड इज माई बॉन्ड में किया है. ये अंश बताते हैं कि उनके लिए भारत क्या अहमियत रखता था.किस्सा कुछ यूं है कि शूटिंग के दौरान वो भारत आए, उदयपुर, झीलें, महल, भीड़ और गर्मी सबको पूरे दिल से अपनाया.

एक शूट के दौरान एक भारतीय स्टंट कलाकार नाव से गिरते-गिरते बची. जानते हैं क्यों, क्योंकि मूर ने अपनी परवाह किए बिना उसे ऊपर खींच लिया. यूनिट के लोग दंग रह गए. वे मुस्कुराए और बोले ‘अ बॉन्ड मस्ट सेव लाइव्स इवन विद्आउट कैमरास’ (कैमरे के सामने ही नहीं इतर भी बॉन्ड जिंदगी बचाता है) साथ ही भारत को उन्होंने अपने शब्दों में अव्यवस्था की कविता कहा. लिखा ‘इंडिया इज केऑस एंड चार्म, टुगैदर.’

अपनी मुस्कान से जीत लिया सबका दिल 
उदयपुर की गलियों में वे बिना किसी सुरक्षा घेरे के घूमे, बच्चों के साथ फोटो ली, चाय पी, और हर जगह यही कहा—’यू डोंट विजिट इंडिया…इंडिया विजिट्स यू फॉरएवर.’ अपनी आत्मकथा ‘माई वर्ड इज माई बॉन्ड’ में लिखते हैं—’मैं हीरो नहीं था, बस एक सज्जन आदमी था जिसे कभी-कभी बंदूक थमाई जाती थी.’
23 मई 2017 को मूर का निधन हो गया. उन्होंने गोलियां नहीं चलाईं, बस मुस्कान से जीतते रहे. वे सिर्फ 007 नहीं थे; वे वो बॉन्ड थे जो उम्रदराज होकर भी दिलों में जवान रहे और आज भी हैं.

NHS fertility treatment: “यह देश करता है बांझपन का मुफ्त इलाज, IVF से लेकर डिलीवरी तक का पूरा खर्च सरकार उठाती है”

दुनियाभर में महिलाओं के सामने जितनी भी सबसे बड़ी समस्या हैं, उनमें से एक है बच्चा पैदा न होना. भारत समेत दुनिया के कई ऐसे देश हैं, जहां मां न बन पाने वाली महिलाओं को लोग तरह-तरह की बातें बोलते हैं, बुरा भला कहते हैं. कई कपल्स इस दिक्कत से बचने के लिए मेडिकल का सहारा लेते हैं, लेकिन उनको इसके लिए काफी पैसे देने होते हैं. यही कारण है कि गरीब या मिडिल क्लास फैमली इसको अफोर्ड नहीं कर पाती है.

ब्रिटेन उन देशों में शामिल है, जहां सरकार की स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था (NHS) के तहत अब तक बांझपन के इलाज का पूरा खर्च उठाया जाता रहा है. IVF से लेकर डिलीवरी तक का सारा खर्च सरकार की ओर से कवर किया जाता है. लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं. इंग्लैंड के बाथ और नॉर्थ ईस्ट समरसेट इलाके की क्लिनिकल कमीशनिंग ग्रुप ने नई योजना पेश की है, जिसके मुताबिक अगर किसी महिला के पति का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) 30 से ऊपर है यानी वे मोटापे की कैटेगरी में आते हैं, तो ऐसे कपल्स को IVF फंडिंग नहीं दी जाएगी.
   
विवाद क्यों उठा?

NHS मैनेजर्स का कहना है कि उन्हें बेहद कठिन वित्तीय हालात का सामना करना पड़ रहा है. इसलिए यह कदम उठाना पड़ रहा है. उनका तर्क है कि मोटापे से प्रभावित कपल्स में गर्भधारण की संभावना कम हो जाती है. लेकिन एक्सपर्ट इस दावे को खारिज कर रहे हैं. ऑक्सफोर्ड फर्टिलिटी के प्रोफेसर टिम चाइल्ड ने इसे “IVF को सीमित करने का बहाना” बताया है. वहीं, कैंपेन ग्रुप Fertility Fairness की सारा नॉर्क्रॉस ने कहा कि वह इस फैसले से “हैरान और आहत” हैं.

नए दिशा-निर्देश भी चर्चा में

इसी बीच, नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड केयर एक्सीलेंस (NICE) ने नई गाइडलाइन जारी की है. इसमें IVF के दौरान अपनाए जाने वाले कई लोकप्रिय “एड-ऑन ट्रीटमेंट्स” पर रोक लगाने की सिफारिश की गई है. इनमें एंडोमेट्रियल स्क्रैच, हिस्टेरोस्कोपी और कुछ एक्सपेरिमेंटल टेस्ट शामिल हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि ये इलाज मरीजों को झूठी उम्मीद देते हैं और अक्सर किसी वैज्ञानिक प्रमाण के बिना कराए जाते हैं.

आगे क्या?

अगर NHS इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो ब्रिटेन के हजारों कपल्स जो अब तक IVF और डिलीवरी तक की मुफ्त सुविधा का लाभ उठा रहे थे, उन्हें इलाज के लिए निजी क्लीनिकों पर निर्भर होना पड़ेगा. इससे कई परिवारों का माता-पिता बनने का सपना अधूरा रह सकता है. इस तरह से ब्रिटेन में अभी तक जो लोग इसका फायदा उठा रहे थे, अब उनको इलाज के लिए अपनी जेब से पैसे देने होंगे.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

“गाजा शांति समझौते पर ट्रंप ने कहा – ‘3000 साल लग गए’; शहबाज की तारीफों ने चापलूसी की सारी हदें पार कर दीं”

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मिस्र के शहर शर्म अल शेख में गाजा शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए इसे बहुत खास बताया. ट्रंप ने मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी के साथ मिलकर इस सम्मेलन का नेतृत्व किया. अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने प्रशासन की तारीफ करते हुए कहा कि मैंने सोचा था कि यह सबसे मुश्किल काम होगा, लेकिन हमारी शानदार टीम और इन देशों की मदद से यह हो गया.

‘इस मुकाम तक पहुंचने में 3,000 साल लग गए’

ट्रंप ने गाजा में अगले कदमों के बारे में कहा, “अब पुनर्निर्माण शुरू हो रहा है. मुझे लगता है कि हमने सबसे कठिन काम काफी हद तक कर लिया है क्योंकि बाकी सब एक साथ मिलकर किया जाता है. हम सभी पुनर्निर्माण करना जानते हैं और हम दुनिया में किसी से भी बेहतर निर्माण करना जानते हैं. संयुक्त राष्ट्र और अन्य का अनुमान है कि गाजा के बुनियादी ढांचे और घरों के पुनर्निर्माण के लिए अरबों डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी.” उन्होंने कहा कि इस मुकाम तक पहुंचने में 3,000 साल लग गए.

शहबाज ने पार की चापलूसी की हद

ट्रंप ने अपनी शुरुआती टिप्पणी समाप्त करने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को बोलने के लिए बुलाया. माइक देखते ही शहबाज शरीफ एक बार फिर ट्रंप की चापलूसी में लग गए. उन्होंने अपने भाषण में ट्रंप की प्रशंसा करते हुए कहा कि वह वह अमेरिकी राष्ट्रपति को फिर से नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट करेंगे.

इस प्रतिक्रिया देते हुए ट्रंप ने खुशी से कहा कि उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी. शरीफ को जवाब देते हुए ट्रंप ने कहा, “वाह…मुझे इसकी उम्मीद नहीं थी.” शहबाज शरीफ की ओर से नोबेल शांति पुरस्कार के लिए दोबारा नामांकित किए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “चलो सब लोग घर चलते हैं.”

ट्रंप को मिलेगा मिस्र का सर्वोच्च सम्मान

मिस्र के राष्ट्रपति ने तुर्किए, कतर और संयुक्त राज्य अमेरिका का धन्यवाद किया और मध्य पूर्व में नई शुरुआत की बात की. उन्होंने फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता पर आधारित टू स्टेट सॉल्यूशन पर जोर दिया. मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतेह अल-सीसी ने कहा कि वह ट्रंप को मिस्र के सर्वोच्च राजकीय सम्मान, ऑर्डर ऑफ द नाइल से सम्मानित करेंगे.

घरों को लौट रहे नागरिक: ट्रंप

ट्रंप ने विश्व नेताओं को संबोधित करते हुए गाजा से सशस्त्र बलों को हटाने का आह्वान किया. उन्होंने कहा, “हम इस बात पर भी सहमत हुए हैं कि गाजा के पुनर्निर्माण के लिए और सुरक्षित माहौल बनाने के लिए एक एक नए ईमानदार नागरिक पुलिस बल की स्थापना की जाए.”

ट्रंप ने कहा, “नागरिक अपने घरों को लौट रहे हैं. यह खूबसूरत है. मैं बस इसे पर्दे के पीछे से देख रहा हूं. मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा.यह वह दिन है जिसके लिए पूरे क्षेत्र और दुनिया भर के लोग काम कर रहे थे. किसी ने नहीं सोचा था कि ऐसा हो सकता है.”