Home Blog Page 123

Health Update:मछली खाने के बाद दूध पीने से होते हैं सफेद दाग? जानिए क्या कहती है मेडिकल साइंस और आयुर्वेद

भारतीय घरों में अक्सर यह सलाह दी जाती है कि मछली खाने के बाद दूध नहीं पीना चाहिए। माना जाता है कि ऐसा करने से त्वचा पर सफेद दाग पड़ सकते हैं या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। वर्षों से चली आ रही इस धारणा को कई लोग सच मानते हैं, लेकिन क्या वास्तव में मछली और दूध का संयोजन सफेद दाग जैसी बीमारी का कारण बन सकता है? आइए जानते हैं विशेषज्ञों और आयुर्वेद की राय।

क्या होते हैं सफेद दाग?

सफेद दाग, जिसे चिकित्सकीय भाषा में विटिलिगो (Vitiligo) कहा जाता है, एक त्वचा संबंधी स्थिति है। इसमें त्वचा के कुछ हिस्सों का प्राकृतिक रंग धीरे-धीरे खत्म होने लगता है और वहां सफेद धब्बे दिखाई देने लगते हैं। यह समस्या तब होती है जब त्वचा को रंग देने वाली कोशिकाएं, जिन्हें मेलानोसाइट्स कहा जाता है, काम करना बंद कर देती हैं या नष्ट हो जाती हैं।

यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है और शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका संबंध मुख्य रूप से प्रतिरक्षा प्रणाली, आनुवंशिक कारणों और कुछ पर्यावरणीय कारकों से होता है।

मछली और दूध को लेकर क्यों फैली यह मान्यता?

पारंपरिक मान्यताओं और आयुर्वेद में मछली और दूध को कुछ मामलों में “विरुद्ध आहार” की श्रेणी में रखा गया है। इसी वजह से लंबे समय से यह धारणा बनी हुई है कि दोनों का एक साथ सेवन शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है। हालांकि यह मान्यता मुख्य रूप से पाचन संबंधी प्रभावों से जुड़ी रही है, न कि सीधे सफेद दाग जैसी बीमारी से।

विशेषज्ञों की क्या है राय?

त्वचा रोग विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है, जो यह साबित करता हो कि मछली और दूध एक साथ खाने से विटिलिगो या सफेद दाग होते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार विटिलिगो एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से त्वचा की रंग बनाने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगती है। इसके अलावा आनुवंशिक कारण और अन्य जैविक कारक भी इस बीमारी के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।

अब तक की वैज्ञानिक शोधों में मछली और दूध के संयुक्त सेवन तथा सफेद दाग के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं हुआ है।

आयुर्वेद का दृष्टिकोण

आयुर्वेद के अनुसार दूध की प्रकृति शीतल मानी जाती है, जबकि मछली को अपेक्षाकृत उष्ण माना जाता है। इस कारण दोनों का एक साथ सेवन कुछ लोगों में पाचन संबंधी समस्याएं पैदा कर सकता है। जैसे कि:

  • अपच
  • गैस
  • पेट में भारीपन
  • एसिडिटी

हालांकि आयुर्वेद भी यह स्पष्ट रूप से नहीं कहता कि इस संयोजन से हर व्यक्ति को त्वचा रोग या सफेद दाग हो जाएंगे।

मछली खाने के बाद दूध पीने से सफेद दाग होने की धारणा का कोई मजबूत वैज्ञानिक आधार नहीं है। विटिलिगो एक जटिल त्वचा रोग है, जिसका संबंध प्रतिरक्षा प्रणाली, आनुवंशिकता और अन्य चिकित्सकीय कारणों से है। हालांकि कुछ लोगों को मछली और दूध साथ लेने पर पाचन संबंधी परेशानी हो सकती है, इसलिए यदि किसी व्यक्ति को ऐसा अनुभव होता है तो वह इस संयोजन से बच सकता है।

स्वास्थ्य संबंधी किसी भी निर्णय के लिए केवल परंपरागत मान्यताओं पर निर्भर रहने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह लेना अधिक उचित माना जाता है।

Health Update:पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में नई उम्मीद, ट्रायल में दवा ने बढ़ाई मरीजों की जीवित रहने की अवधि

पैंक्रियाटिक कैंसर को सबसे गंभीर और जानलेवा कैंसरों में से एक माना जाता है। इसकी पहचान अक्सर तब होती है जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है और शरीर के अन्य हिस्सों तक फैल जाती है। ऐसे मामलों में उपचार के विकल्प सीमित हो जाते हैं। हालांकि, हाल ही में सामने आए एक क्लीनिकल ट्रायल ने इस क्षेत्र में नई उम्मीद जगाई है।

वैज्ञानिकों द्वारा विकसित एक नई दवा ने उन्नत अवस्था के पैंक्रियाटिक कैंसर से जूझ रहे मरीजों में सकारात्मक परिणाम दिखाए हैं। शुरुआती अध्ययन के अनुसार, इस दवा ने मरीजों की औसत जीवन अवधि में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है, जिससे इसे कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति माना जा रहा है।

क्लीनिकल ट्रायल में मिले उत्साहजनक नतीजे

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित एक प्रमुख कैंसर सम्मेलन में प्रस्तुत शोध के अनुसार, नई दवा “डाराक्सोनरासिब” ने एडवांस स्टेज पैंक्रियाटिक कैंसर के मरीजों में बेहतर परिणाम दिए। अध्ययन में शामिल मरीजों में दवा लेने वालों की औसत जीवित रहने की अवधि पारंपरिक उपचार प्राप्त करने वाले मरीजों की तुलना में काफी अधिक देखी गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह परिणाम पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में लंबे समय बाद मिली एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा सकता है। इस बीमारी में पिछले कई वर्षों से उपचार के क्षेत्र में सीमित प्रगति हुई थी।

कैसे काम करती है यह दवा?

यह दवा KRAS नामक प्रोटीन को लक्षित करती है, जो पैंक्रियाटिक कैंसर के अधिकांश मामलों में कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, बड़ी संख्या में मरीजों में KRAS जीन में बदलाव पाया जाता है, जिसके कारण कैंसर तेजी से बढ़ता है।

नई दवा इस प्रक्रिया को बाधित कर कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को धीमा करने का प्रयास करती है, जिससे बीमारी की प्रगति पर नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है।

विशेषज्ञों ने बताया महत्वपूर्ण उपलब्धि

कैंसर विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध भविष्य में पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज की दिशा बदल सकता है। कई विशेषज्ञों ने इसे पिछले कुछ दशकों में इस क्षेत्र की सबसे अहम उपलब्धियों में से एक बताया है।

उनका कहना है कि यदि आगामी चरणों के परीक्षण भी सफल रहते हैं और दवा को व्यापक स्तर पर मंजूरी मिल जाती है, तो इससे हजारों मरीजों को बेहतर जीवन और अधिक समय मिल सकता है।

मरीजों के लिए बढ़ी उम्मीद

पैंक्रियाटिक कैंसर के मरीजों और उनके परिवारों के लिए यह अध्ययन आशा की नई किरण लेकर आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक लक्षित उपचार (Targeted Therapy) भविष्य में कैंसर के इलाज को और प्रभावी बना सकते हैं।

हालांकि, अभी इस दवा पर आगे भी कई परीक्षण और नियामकीय प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी हैं। इसके बाद ही यह तय होगा कि इसे आम मरीजों के लिए कब और किस रूप में उपलब्ध कराया जाएगा।

Disclaimer: यह लेख स्वास्थ्य संबंधी सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी बीमारी के उपचार या दवा के उपयोग से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

Health News:भारत में घटी शिशु मृत्यु दर, फिर भी कई राज्यों में पहले जन्मदिन तक नहीं पहुंच पा रहे बच्चे

भारत में शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार देश में शिशु मृत्यु दर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है, जो स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और संस्थागत प्रसव में बढ़ोतरी का सकारात्मक परिणाम माना जा रहा है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति बेहतर हुई है, लेकिन राज्यों के बीच अब भी बड़ा अंतर बना हुआ है।

रिपोर्ट के मुताबिक, देश में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर शिशु मृत्यु दर घटकर 24 तक पहुंच गई है। कुछ वर्ष पहले यह आंकड़ा 30 के आसपास था। यह सुधार स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बढ़ने, मातृ एवं शिशु देखभाल कार्यक्रमों के विस्तार और अस्पतालों में प्रसव की संख्या बढ़ने से संभव हुआ है।

हर 42 में से एक शिशु नहीं देख पाता पहला जन्मदिन

आंकड़े बताते हैं कि देश में अभी भी हर 42 बच्चों में से एक बच्चा अपना पहला जन्मदिन नहीं मना पाता। ग्रामीण इलाकों में स्थिति अपेक्षाकृत अधिक चुनौतीपूर्ण बनी हुई है, जहां शिशु मृत्यु दर शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है।

अस्पतालों में प्रसव बढ़ने का दिखा असर

पिछले कुछ वर्षों में संस्थागत प्रसव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अब अधिकांश प्रसव अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में हो रहे हैं, जिससे मां और नवजात दोनों की सुरक्षा बेहतर हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार सुरक्षित प्रसव व्यवस्था ने शिशु मृत्यु दर कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

हालांकि वे यह भी बताते हैं कि केवल अस्पताल में प्रसव कराना पर्याप्त नहीं है। जन्म के बाद नवजात की देखभाल, टीकाकरण, पोषण और समय पर चिकित्सा सुविधा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

किन राज्यों में स्थिति अधिक चिंताजनक?

राज्यवार आंकड़ों में कुछ प्रदेश अभी भी चिंता का विषय बने हुए हैं। छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक दर्ज की गई है। इन राज्यों में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर भी अपेक्षाकृत ज्यादा बनी हुई है, जो स्वास्थ्य सेवाओं में और सुधार की आवश्यकता को दर्शाती है।

इन राज्यों ने किया बेहतर प्रदर्शन

दूसरी ओर गोवा, सिक्किम और केरल जैसे राज्यों ने शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है। इन राज्यों में शिशु मृत्यु दर देश में सबसे कम दर्ज की गई है। इसके अलावा तमिलनाडु, दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश भी राष्ट्रीय औसत से बेहतर स्थिति में हैं।

नवजात शिशुओं की मौत अब भी बड़ी चुनौती

विशेषज्ञों के अनुसार सबसे बड़ी चिंता जन्म के पहले 28 दिनों के भीतर होने वाली मौतें हैं। कुल शिशु मृत्यु के अधिकांश मामले इसी अवधि में दर्ज किए जाते हैं। इसका मतलब है कि गर्भावस्था के दौरान देखभाल, सुरक्षित प्रसव और जन्म के बाद शुरुआती दिनों में गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है।

आगे क्या करने की जरूरत है?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि शिशु मृत्यु दर को और कम करने के लिए निम्न क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना होगा:

  • गर्भवती महिलाओं की नियमित स्वास्थ्य जांच
  • मातृ पोषण में सुधार
  • सुरक्षित और संस्थागत प्रसव को बढ़ावा
  • नवजात शिशुओं की विशेष देखभाल
  • समय पर टीकाकरण
  • ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत बनाना

भारत ने शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में लंबी प्रगति की है, लेकिन लक्ष्य हासिल करने के लिए अभी भी कई राज्यों में व्यापक सुधार और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत बनी हुई है।

मुज्तबा खामेनेई पर अटकलों के बीच अमेरिकी दावा, ईरान के फैसलों में अब भी निभा रहे सक्रिय भूमिका

ईरान की राजनीतिक स्थिति और नेतृत्व को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दावा किया है कि ईरान के सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई जीवित हैं और सार्वजनिक रूप से नजर न आने के बावजूद देश के महत्वपूर्ण मामलों में सक्रिय रूप से भूमिका निभा रहे हैं।

अमेरिकी सीनेट की एक बैठक के दौरान रुबियो ने कहा कि उपलब्ध सूचनाओं से संकेत मिलता है कि मुज्तबा खामेनेई पर्दे के पीछे रहकर शासन और रणनीतिक फैसलों पर प्रभाव डाल रहे हैं। हालांकि वे लंबे समय से सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई नहीं दिए हैं, लेकिन सरकारी तंत्र के माध्यम से उनकी भागीदारी जारी है।

सार्वजनिक अनुपस्थिति के बावजूद सक्रिय भूमिका

रुबियो के मुताबिक, हाल के महीनों में ऐसे कई संकेत मिले हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व में मुज्तबा खामेनेई की भूमिका बनी हुई है। उनका कहना है कि सुरक्षा कारणों से वे सार्वजनिक जीवन से दूर हैं, लेकिन शासन से जुड़े प्रमुख निर्णयों में उनकी भागीदारी लगातार बनी हुई है।

बताया जा रहा है कि क्षेत्रीय संघर्षों और सुरक्षा चुनौतियों के चलते ईरान के शीर्ष नेतृत्व ने अपने सार्वजनिक कार्यक्रमों को सीमित कर दिया है। इसी वजह से मुज्तबा खामेनेई की गतिविधियों को लेकर विभिन्न तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं।

क्षेत्रीय तनाव ने बढ़ाई चिंताएं

मध्य पूर्व में जारी तनाव और सैन्य गतिविधियों के कारण ईरान लगातार अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के साथ संबंधों में तनाव के बीच ईरान की रणनीतिक नीतियां वैश्विक चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व की सक्रियता आने वाले समय में क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि मुज्तबा खामेनेई की स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार नजर रखी जा रही है।

परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों पर बना हुआ गतिरोध

अमेरिका ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर उसकी चिंताएं बरकरार हैं। वाशिंगटन का कहना है कि जब तक ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों और संवर्धन कार्यक्रमों पर ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक प्रतिबंधों में किसी बड़ी राहत की संभावना नहीं है।

साथ ही, क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े मुद्दे भी दोनों देशों के बीच तनाव के प्रमुख कारण बने हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या दोनों देश बातचीत के जरिए किसी नए समझौते तक पहुंच पाएंगे या नहीं।

शांति वार्ता पर अनिश्चितता कायम

हालांकि अमेरिका ने बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं किए हैं, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए किसी त्वरित समाधान की संभावना कम नजर आ रही है। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक क्षेत्रीय संघर्षों में कमी नहीं आती, तब तक ईरान और अमेरिका के बीच रिश्तों में सुधार की राह कठिन बनी रहेगी।

फिलहाल, मुज्तबा खामेनेई को लेकर दिए गए अमेरिकी बयान ने एक बार फिर ईरान की आंतरिक राजनीति और मध्य पूर्व की बदलती परिस्थितियों को वैश्विक बहस के केंद्र में ला दिया है।

‘कॉकटेल 2’ में कृति-रश्मिका की जोड़ी पर उठे सवाल, लेस्बियन रोमांस की अटकलों पर कृति सेनन का जवाब

बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन अपनी आगामी फिल्म ‘कॉकटेल 2’ को लेकर लगातार सुर्खियों में बनी हुई हैं। फिल्म में उनके साथ शाहिद कपूर और रश्मिका मंदाना भी मुख्य भूमिकाओं में नजर आएंगे। हाल ही में सोशल मीडिया पर फिल्म की कहानी और किरदारों को लेकर कई तरह की चर्चाएं सामने आईं, जिनमें कृति और रश्मिका के किरदारों के बीच विशेष रिश्ते को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही थीं। अब इन चर्चाओं पर खुद कृति सेनन ने प्रतिक्रिया दी है।

कृति ने अफवाहों को बताया गलत

फिल्म के ट्रेलर लॉन्च कार्यक्रम के दौरान कृति सेनन ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि अक्सर दर्शक दो महिला किरदारों की गहरी दोस्ती को गलत नजरिए से देखने लगते हैं। उन्होंने कहा कि अगर दो पुरुष किरदारों के बीच मजबूत दोस्ती दिखाई जाती है तो उसे सामान्य माना जाता है, लेकिन दो महिलाओं के मामले में लोग अलग-अलग तरह की धारणाएं बना लेते हैं।

कृति ने कहा कि महिला मित्रता को भी उसी सहजता से देखा जाना चाहिए, जिस तरह पुरुष मित्रता को देखा जाता है। उनके अनुसार, हर करीबी रिश्ता रोमांटिक नहीं होता और फिल्मों में दोस्ती को भी उसी रूप में समझा जाना चाहिए।

निर्देशक ने भी दी सफाई

फिल्म के निर्देशक होमी अदजानिया ने भी इन अटकलों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि फिल्म की कहानी को लेकर सोशल मीडिया पर जो बातें कही जा रही हैं, वे वास्तविक कहानी से मेल नहीं खातीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिल्म में ऐसा कोई कथानक नहीं है, जैसा कुछ लोग अनुमान लगा रहे हैं।

निर्देशक के मुताबिक, कृति और रश्मिका की ऑफ-स्क्रीन दोस्ती काफी अच्छी है, जिसकी वजह से लोगों ने अलग-अलग तरह की कहानियां बनानी शुरू कर दीं। उन्होंने कहा कि फिल्म का फोकस रिश्तों, भावनाओं और मनोरंजन पर है, न कि उन अफवाहों पर जो सोशल मीडिया पर फैल रही हैं।

फिल्म को लेकर बढ़ी उत्सुकता

‘कॉकटेल 2’ इस साल की चर्चित फिल्मों में से एक मानी जा रही है। यह लोकप्रिय फिल्म ‘कॉकटेल’ की अगली कड़ी है, जिसने रिलीज के समय दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई थी। नए भाग में नई कहानी और नए किरदारों के साथ दर्शकों को एक अलग अनुभव देने की कोशिश की गई है।

कब होगी रिलीज?

शाहिद कपूर, कृति सेनन और रश्मिका मंदाना अभिनीत यह फिल्म 19 जून को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है। ट्रेलर और स्टारकास्ट को मिले सकारात्मक प्रतिक्रिया के बाद फिल्म को लेकर दर्शकों की उत्सुकता लगातार बढ़ती जा रही है।