भारत में शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार देश में शिशु मृत्यु दर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है, जो स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और संस्थागत प्रसव में बढ़ोतरी का सकारात्मक परिणाम माना जा रहा है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति बेहतर हुई है, लेकिन राज्यों के बीच अब भी बड़ा अंतर बना हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक, देश में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर शिशु मृत्यु दर घटकर 24 तक पहुंच गई है। कुछ वर्ष पहले यह आंकड़ा 30 के आसपास था। यह सुधार स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बढ़ने, मातृ एवं शिशु देखभाल कार्यक्रमों के विस्तार और अस्पतालों में प्रसव की संख्या बढ़ने से संभव हुआ है।
हर 42 में से एक शिशु नहीं देख पाता पहला जन्मदिन
आंकड़े बताते हैं कि देश में अभी भी हर 42 बच्चों में से एक बच्चा अपना पहला जन्मदिन नहीं मना पाता। ग्रामीण इलाकों में स्थिति अपेक्षाकृत अधिक चुनौतीपूर्ण बनी हुई है, जहां शिशु मृत्यु दर शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है।
अस्पतालों में प्रसव बढ़ने का दिखा असर
पिछले कुछ वर्षों में संस्थागत प्रसव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अब अधिकांश प्रसव अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में हो रहे हैं, जिससे मां और नवजात दोनों की सुरक्षा बेहतर हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार सुरक्षित प्रसव व्यवस्था ने शिशु मृत्यु दर कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हालांकि वे यह भी बताते हैं कि केवल अस्पताल में प्रसव कराना पर्याप्त नहीं है। जन्म के बाद नवजात की देखभाल, टीकाकरण, पोषण और समय पर चिकित्सा सुविधा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
किन राज्यों में स्थिति अधिक चिंताजनक?
राज्यवार आंकड़ों में कुछ प्रदेश अभी भी चिंता का विषय बने हुए हैं। छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक दर्ज की गई है। इन राज्यों में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर भी अपेक्षाकृत ज्यादा बनी हुई है, जो स्वास्थ्य सेवाओं में और सुधार की आवश्यकता को दर्शाती है।
इन राज्यों ने किया बेहतर प्रदर्शन
दूसरी ओर गोवा, सिक्किम और केरल जैसे राज्यों ने शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है। इन राज्यों में शिशु मृत्यु दर देश में सबसे कम दर्ज की गई है। इसके अलावा तमिलनाडु, दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश भी राष्ट्रीय औसत से बेहतर स्थिति में हैं।
नवजात शिशुओं की मौत अब भी बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार सबसे बड़ी चिंता जन्म के पहले 28 दिनों के भीतर होने वाली मौतें हैं। कुल शिशु मृत्यु के अधिकांश मामले इसी अवधि में दर्ज किए जाते हैं। इसका मतलब है कि गर्भावस्था के दौरान देखभाल, सुरक्षित प्रसव और जन्म के बाद शुरुआती दिनों में गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है।
आगे क्या करने की जरूरत है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि शिशु मृत्यु दर को और कम करने के लिए निम्न क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना होगा:
- गर्भवती महिलाओं की नियमित स्वास्थ्य जांच
- मातृ पोषण में सुधार
- सुरक्षित और संस्थागत प्रसव को बढ़ावा
- नवजात शिशुओं की विशेष देखभाल
- समय पर टीकाकरण
- ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत बनाना
भारत ने शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में लंबी प्रगति की है, लेकिन लक्ष्य हासिल करने के लिए अभी भी कई राज्यों में व्यापक सुधार और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत बनी हुई है।


































