दूध और डेयरी उत्पादों के सेवन को लेकर हालिया रिसर्च में पार्किंसन जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी के संभावित जोखिम पर चर्चा सामने आई है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह सीधा कारण नहीं है, बल्कि एक संभावित संबंध (association) हो सकता है, जिसे पूरी तरह समझने के लिए और शोध की जरूरत है।
कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि अधिक मात्रा में डेयरी उत्पाद, खासकर रोजाना ज्यादा दूध पीने वाले लोगों में पार्किंसन का खतरा थोड़ा बढ़ा हुआ देखा गया है। खासतौर पर पुरुषों में यह जोखिम अधिक प्रतिशत तक रिपोर्ट किया गया है, लेकिन यह निष्कर्ष पूर्ण रूप से कारण-प्रभाव स्थापित नहीं करता।
लंबी अवधि की कुछ बड़ी रिसर्च स्टडीज़ में भी यह पैटर्न देखा गया कि जो लोग नियमित रूप से लो-फैट डेयरी का अधिक सेवन करते हैं, उनमें जोखिम अपेक्षाकृत अधिक पाया गया। हालांकि, यह अंतर कई अन्य जीवनशैली और पर्यावरणीय कारणों से भी जुड़ा हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, दूध में मौजूद कुछ तत्व जैसे संभावित रासायनिक अवशेष, गैलेक्टोज और गट-ब्रेन एक्सिस पर असर डालने वाले कारक इस संबंध को समझाने में भूमिका निभा सकते हैं। फिर भी इस पर वैज्ञानिक सहमति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
डॉक्टरों का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं है कि दूध पीना तुरंत बंद कर देना चाहिए। दूध और डेयरी संतुलित आहार का हिस्सा हैं और शरीर के लिए कई जरूरी पोषक तत्व भी देते हैं। समस्या केवल अत्यधिक सेवन या असंतुलित डाइट से जुड़ी हो सकती है।
पार्किंसन बीमारी के शुरुआती लक्षणों में हाथों में कंपन, शरीर में अकड़न, धीमी गति से काम करना और संतुलन की समस्या शामिल हो सकती है। कुछ मामलों में कब्ज, नींद की गड़बड़ी और सूंघने की क्षमता में कमी जैसे संकेत भी पहले दिखाई दे सकते हैं।
विशेषज्ञों की सलाह है कि किसी भी आहार संबंधी बदलाव से पहले संतुलन बनाए रखना जरूरी है और किसी भी लक्षण या चिंता की स्थिति में डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।


































