
लखनऊ : नेपाल के रुकुम-नुवाकोट क्षेत्र में आई भीषण आपदा के बाद राहत एवं बचाव कार्यों के बीच सरोजिनी नगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने मानवीय संवेदना का परिचय देते हुए प्रभावित भारतीय परिवारों के लिए 11 लाख रुपये की प्रारंभिक सहायता की घोषणा की है। साथ ही सभी राष्ट्रीयताओं के लोगों के लिए सहायता एवं परिवार समन्वय डेस्क स्थापित करने तथा भारत-नेपाल के बीच दीर्घकालिक हिमालयी जलवायु एवं आपदा लचीलापन साझेदारी का प्रस्ताव रखा गया है।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि इस समय प्राथमिकता राजनीति या सीमाओं से ऊपर उठकर मानव जीवन की रक्षा, लापता लोगों की तलाश, घायलों का उपचार और प्रभावित परिवारों के साथ खड़े होने की है। उन्होंने नेपाल सेना, नेपाल पुलिस, सशस्त्र पुलिस बल, चिकित्सा दलों, हेलीकॉप्टर कर्मियों और स्वयंसेवकों के राहत एवं बचाव प्रयासों को नमन करते हुए भारत सरकार की त्वरित मानवीय प्रतिक्रिया की सराहना की।
भारतीय पीड़ित परिवारों के लिए 11 लाख रुपये की सहायता

Environment Warriors की ओर से इस आपदा में मारे गए अथवा लापता भारतीय नागरिकों के परिवारों के लिए 11 लाख रुपये की प्रारंभिक सहायता राशि उपलब्ध कराई जाएगी। सक्षम प्राधिकरणों के समन्वय से सत्यापित निकटतम परिजनों तक यह सहायता पहुंचाने की बात कही गई है।

डॉ. सिंह ने कहा कि किसी परिवार पर आई त्रासदी केवल आंकड़ा नहीं होती। यह उस परिवार के जीवन को बदल देने वाला संकट होता है। इसलिए राहत व्यवस्था में मानवीय संवेदना और त्वरित सहायता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सभी राष्ट्रीयताओं के लिए सहायता एवं परिवार समन्वय डेस्क
डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने सरोजिनी नगर कार्यालय में सहायता एवं परिवार समन्वय डेस्क स्थापित करने का निर्देश दिया है। इस डेस्क के माध्यम से बाढ़ एवं आपदा में प्रभावित लोगों की सत्यापित जानकारी दर्ज की जाएगी और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित परिवारों को विदेश मंत्रालय, काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास तथा संबंधित राजनयिक मिशनों तक पहुंचाने में सहयोग किया जाएगा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सहायता राशि भारतीय नागरिकों के परिवारों के लिए है, जबकि सहायता डेस्क सभी के लिए खुला रहेगा।
शुरुआती आंकड़ों में 165 मौतें, 826 लोग लापता
प्रेस नोट में नेपाली अधिकारियों की ओर से जारी शुरुआती आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि 27 अगस्त की सुबह तक 165 शव बरामद किए जा चुके थे और 826 लोगों के लापता होने की सूचना थी। इनमें नेपाली नागरिकों के साथ सुरक्षा कर्मी, पर्यटक और बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक भी शामिल बताए गए हैं।
साथ ही यह भी कहा गया है कि खोज एवं बचाव अभियान लगातार जारी रहने के कारण आंकड़ों में बदलाव संभव है। लापता अथवा प्रभावित व्यक्तियों से संबंधित किसी भी जानकारी की पुष्टि संबंधित आधिकारिक स्रोतों से किए जाने पर जोर दिया गया है।
हिमालय से आई चेतावनी: आपदा प्रबंधन में हर मिनट महत्वपूर्ण
प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलनों का हवाला देते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बर्फ-शिला पतन अथवा अन्य प्राकृतिक घटनाओं से अचानक आपदा की स्थिति पैदा हो सकती है। प्रेस नोट में ICIMOD के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि त्रिशूली नदी में एक स्थान पर जलस्तर लगभग 30 मिनट में नौ मीटर तक बढ़ गया।
डॉ. सिंह के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में 30 मिनट की पूर्व चेतावनी भी कई जिंदगियां बचा सकती है, बशर्ते चेतावनी स्वचालित हो और सीमाओं को पार कर समय पर संबंधित लोगों तक पहुंचे।
उन्होंने कहा कि हिमालय केवल किसी एक देश की समस्या नहीं है। हिमालयी क्षेत्र में होने वाले पर्यावरणीय बदलाव भारत और नेपाल दोनों के लिए साझा चुनौती हैं।
Net Zero और आपदा प्रबंधन को साथ जोड़ने पर जोर
डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि आपदा प्रबंधन और जलवायु कार्रवाई को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार Net Zero केवल पर्यावरण का नारा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आपदा जोखिम को कम करने की रणनीति भी है।
उन्होंने स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, हरित परिवहन, जल एवं अपशिष्ट प्रबंधन और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को विकास का अभिन्न हिस्सा बनाने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि हिमालयी ग्लेशियर, परमाफ़्रॉस्ट, चट्टानी ढलान, हिमनदीय झीलें और जलस्रोत तेजी से बदल रहे हैं, इसलिए इनके संरक्षण और वैज्ञानिक निगरानी को प्राथमिकता देना जरूरी है।
सरोजनी नगर के लिए पांच सूत्रीय संकल्प
Environment Warriors एवं Net Zero Sarojini Nagar अभियान की ओर से हिमालयी आपदा और पर्यावरण संरक्षण को लेकर पांच प्रमुख संकल्प सामने रखे गए हैं-
- वृक्षारोपण नहीं, वृक्ष संरक्षण – सफलता का आकलन तीन वर्ष बाद जीवित वृक्षों की संख्या से किया जाएगा।
- तालाब, नाले और प्राकृतिक जलधाराओं का संरक्षण।
- प्राकृतिक जल-निकासी मार्गों पर अतिक्रमण और अवैज्ञानिक निर्माण का विरोध।
- Net Zero Sarojini Nagar की अवधारणा को घर, विद्यालय और संस्थानों तक पहुंचाना।
- हिमालयी पारिस्थितिक सुरक्षा और सीमापार पूर्व चेतावनी को विधानसभा में प्रमुखता से उठाना।
डॉ. सिंह ने कहा कि यदि हिमालय को केवल किसी एक देश की समस्या मानकर देखा गया तो समाधान संभव नहीं होगा। भारत और नेपाल के बीच साझा वैज्ञानिक निगरानी, डेटा साझाकरण, पूर्व चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन सहयोग को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।
भारत-नेपाल के बीच दीर्घकालिक साझेदारी का प्रस्ताव
डॉ. राजेश्वर सिंह ने भारत-नेपाल हिमालयी जलवायु एवं आपदा लचीलापन साझेदारी का प्रस्ताव रखते हुए तीन प्राथमिकताएं सुझाईं—सीमा पार पूर्व चेतावनी, साझा निगरानी एवं डेटा तथा जोखिम-संवेदी विकास।
इसके तहत ग्लेशियरों, हिमनदीय झीलों, अस्थिर ढलानों और नदी प्रवाह की उपग्रह एवं सेंसर आधारित निगरानी को बढ़ाने तथा त्वरित डेटा साझाकरण की व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया गया।
उन्होंने प्रस्ताव रखा कि 2030 तक चिन्हित उच्च-जोखिम हिमनदीय झीलों, अस्थिर बर्फीली संरचनाओं और प्राथमिकता वाले ढलानों की मैपिंग कर उन्हें सतत निगरानी एवं स्वचालित क्षेत्रीय पूर्व चेतावनी तंत्र से जोड़ा जाए।
“पहले बचाव, फिर लचीलापन”
डॉ. सिंह ने कहा कि वर्तमान समय की सबसे बड़ी जिम्मेदारी लापता लोगों को खोजना, फंसे लोगों को बचाना, घायलों का उपचार कराना और शोकाकुल परिवारों के साथ खड़ा होना है। उन्होंने कहा कि राहत और बचाव के बाद दीर्घकालिक स्तर पर आपदा के प्रति लचीलापन विकसित करना भी उतना ही जरूरी है।
उन्होंने कहा, “पहली जिम्मेदारी है—लापता लोगों को खोजना, फंसे लोगों को बचाना, घायलों का उपचार करना और शोकाकुल परिवारों के साथ खड़ा होना। बाकी हर बात-मेरी बात भी-उनके मिलने तक प्रतीक्षा कर सकती है।”
डॉ. राजेश्वर सिंह ने हिमालयी क्षेत्र में लगातार बदलती परिस्थितियों को गंभीर चेतावनी बताते हुए कहा कि “हिमालय हमारे प्रोजेक्ट नहीं, हमसे बात कर रहा है।” उन्होंने भारत और नेपाल से साझा पर्यावरणीय भविष्य की रक्षा के लिए मिलकर काम करने का आह्वान किया।
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