
लखनऊ, 25 जुलाई 2026 : भगवान बुद्ध की प्रथम धर्मदेशना की पावन स्थली सारनाथ ने शनिवार को इतिहास रच दिया। करीब 28 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद सारनाथ को UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया गया। दक्षिण कोरिया के बुसान में चल रहे UNESCO विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। UNESCO के अनुसार यह सत्र 19 से 29 जुलाई 2026 तक बुसान में आयोजित हो रहा है।

सारनाथ के विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के साथ ही यह भारत का 45वां और उत्तर प्रदेश का चौथा UNESCO विश्व धरोहर स्थल बन गया है। इससे पहले उत्तर प्रदेश की UNESCO विश्व धरोहर पहचान मुख्य रूप से आगरा के ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी तक सीमित थी। सारनाथ के जुड़ने से प्रदेश की विश्व विरासत का दायरा पूर्वांचल तक पहुंच गया है और उत्तर प्रदेश की समृद्ध बौद्ध विरासत को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिली है।
सारनाथ को वर्ष 1998 में UNESCO की टेंटेटिव लिस्ट में शामिल किया गया था। करीब तीन दशक तक चली प्रक्रिया के बाद मिली यह मान्यता न केवल वाराणसी और उत्तर प्रदेश, बल्कि भारत की बौद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए भी ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है।
जहां बुद्ध ने पहली बार घुमाया था धर्मचक्र
सारनाथ केवल प्राचीन स्मारकों का समूह नहीं, बल्कि बौद्ध धर्म के इतिहास की वह पवित्र भूमि है जहां ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश दिया और धर्मचक्र प्रवर्तन की शुरुआत की। इसी स्थान पर उन्होंने अपने पांच प्रथम शिष्यों को मध्यम मार्ग, करुणा और शांति का संदेश दिया तथा बौद्ध संघ की स्थापना की परंपरा आगे बढ़ी।
करीब ढाई हजार वर्षों से अधिक समय से सारनाथ बौद्ध आस्था, दर्शन और तीर्थ परंपरा का प्रमुख केंद्र रहा है। प्राचीन ग्रंथों में इसे ऋषिपत्तन सहित विभिन्न नामों से वर्णित किया गया है। यहां मौजूद प्राचीन स्थापत्य, स्तूप, विहारों के अवशेष और कलात्मक धरोहर बौद्ध धर्म के विकास की लंबी ऐतिहासिक यात्रा के साक्षी हैं।
चौखंडी स्तूप से धामेक स्तूप तक-इतिहास का जीवंत दस्तावेज
UNESCO की मान्यता में सारनाथ के महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष शामिल हैं। इनमें चौखंडी स्तूप और प्रमुख पुरातात्विक परिसर विशेष महत्व रखते हैं। चौखंडी स्तूप भगवान बुद्ध और उनके पांच प्रथम शिष्यों के मिलन की स्मृति से जुड़ा है।
वहीं सारनाथ के पुरातात्विक परिसर में धामेक स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, प्राचीन विहारों के अवशेष और अशोक स्तंभ जैसे महत्वपूर्ण अवशेष मौजूद हैं। ये स्मारक मिलकर यह बताते हैं कि किस तरह सारनाथ सदियों से बौद्ध धर्म, स्थापत्य, कला और आध्यात्मिक चिंतन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
जयवीर सिंह बोले- 28 वर्षों की प्रतीक्षा का मिला ऐतिहासिक प्रतिफल
उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने सारनाथ को UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने को प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उत्तर प्रदेश की बहुआयामी सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत विरासत को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के निरंतर प्रयासों का परिणाम है।
उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध और रामायण की पावन भूमि उत्तर प्रदेश में जैन, सूफी और अन्य आध्यात्मिक परंपराओं की भी समृद्ध विरासत मौजूद है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार सभी आस्था और विरासत स्थलों के संरक्षण एवं विकास को प्राथमिकता दे रही है।
जयवीर सिंह के मुताबिक, 28 वर्षों के इंतजार के बाद सारनाथ को मिली UNESCO की मान्यता उत्तर प्रदेश के बौद्ध सर्किट को वैश्विक स्तर पर नई पहचान और गति प्रदान करेगी। इससे प्रदेश की शांति, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक समावेशिता का संदेश दुनिया के व्यापक समुदाय तक पहुंचेगा।
सारनाथ की पहचान स्मारकों से कहीं आगे
सारनाथ के UNESCO नामांकन की तैयारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली संरक्षण वास्तु विशेषज्ञ आभा नारायण लांबा के अनुसार सारनाथ की वैश्विक महत्ता केवल यहां मौजूद स्मारकों तक सीमित नहीं है।
सारनाथ वह स्थल है जहां भगवान बुद्ध ने प्रथम धर्मदेशना दी, बौद्ध संघ की स्थापना हुई और बौद्ध स्थापत्य की प्रारंभिक परंपराओं का विकास हुआ। सदियों से चली आ रही बौद्ध तीर्थ परंपरा यहां की जीवंत सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत को विशिष्ट बनाती है।
वैश्विक बौद्ध पर्यटन के नक्शे पर और मजबूत होगा UP
पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात ने इसे उत्तर प्रदेश के पर्यटन क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि सारनाथ को मिली UNESCO मान्यता प्रदेश के पर्यटन स्थलों को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए किए जा रहे निरंतर प्रयासों का परिणाम है।
उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश को वैश्विक बौद्ध तीर्थाटन केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए फैम ट्रिप, ट्रैवल ट्रेड सहभागिता, बौद्ध उत्सवों और पर्यटक सुविधाओं के विकास पर विशेष जोर दिया गया है। सारनाथ की UNESCO मान्यता इन प्रयासों को नई गति दे सकती है।
अमृत अभिजात ने कहा कि अक्टूबर 2025 में लखनऊ को UNESCO की ‘क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ की मान्यता मिलने के बाद सारनाथ की विश्व धरोहर सूची में एंट्री उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को और व्यापक बनाती है।
पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा लाभ
सारनाथ को UNESCO विश्व धरोहर का दर्जा मिलने का असर केवल सांस्कृतिक पहचान तक सीमित रहने की उम्मीद नहीं है। इसकी वैश्विक ब्रांडिंग से विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ने, पर्यटकों के ठहराव की अवधि बढ़ने और वाराणसी-सारनाथ को उत्तर प्रदेश के व्यापक बौद्ध सर्किट से जोड़ने के अवसर बढ़ सकते हैं।
इसका लाभ स्थानीय होटल, गाइड, परिवहन, हस्तशिल्प, खान-पान और अन्य पर्यटन आधारित व्यवसायों तक पहुंचने की संभावना है। साथ ही, विश्व धरोहर का दर्जा सारनाथ के संरक्षण, प्रबंधन और पर्यटन सुविधाओं को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप और मजबूत करने की जिम्मेदारी भी बढ़ाता है।
सारनाथ की नई पहचान, उत्तर प्रदेश की विरासत का विस्तार
सारनाथ का UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल होना वस्तुतः केवल एक ऐतिहासिक स्थल को मिली अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं है। यह भगवान बुद्ध के शांति, करुणा और मानवता के संदेश को वैश्विक मंच पर और मजबूती से पहुंचाने का अवसर भी है।
आगरा के ताजमहल से लेकर वाराणसी के सारनाथ तक उत्तर प्रदेश की विश्व विरासत यात्रा अब एक नए पड़ाव पर पहुंच गई है। 28 साल के इंतजार के बाद सारनाथ की वैश्विक पहचान ने उत्तर प्रदेश के विरासत और बौद्ध पर्यटन मानचित्र को नई ऊंचाई दे दी है।


































