Donald Trump की चीन यात्रा के दौरान ताइवान मुद्दा एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है। चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping ने साफ संकेत दिए हैं कि ताइवान को लेकर चीन अपने रुख से पीछे हटने वाला नहीं है। वहीं Marco Rubio ने भी स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका की ताइवान नीति में कोई बदलाव नहीं होगा।
Taiwan भले ही छोटा द्वीप हो, लेकिन यह दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों—अमेरिका और चीन—के बीच रणनीतिक संघर्ष का सबसे अहम केंद्र बन चुका है।
चीन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ताइवान?
चीन की कम्युनिस्ट सरकार ताइवान को अपना हिस्सा मानती है। बीजिंग का कहना है कि “वन चाइना पॉलिसी” के तहत ताइवान चीन का ही प्रांत है। शी जिनपिंग कई बार यह कह चुके हैं कि जरूरत पड़ने पर चीन ताइवान को अपने नियंत्रण में लाने के लिए बल प्रयोग भी कर सकता है।
दूसरी ओर ताइवान खुद को एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश मानता है, जिसकी अपनी सरकार, सेना और अलग राजनीतिक व्यवस्था है। यही विवाद दोनों पक्षों के बीच सबसे बड़ा तनाव बना हुआ है।
रणनीतिक रूप से भी ताइवान बेहद अहम है। यदि चीन ताइवान पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है, तो उसकी पहुंच सीधे प्रशांत महासागर तक और मजबूत हो जाएगी। इससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन की सैन्य और समुद्री ताकत काफी बढ़ सकती है।
अमेरिका के लिए क्यों जरूरी है ताइवान?
अमेरिका ताइवान को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। Taiwan Relations Act के तहत अमेरिका ताइवान को आत्मरक्षा के लिए हथियार उपलब्ध कराने का समर्थन करता है।
हालांकि अमेरिका आधिकारिक रूप से “वन चाइना पॉलिसी” को मानता है, लेकिन उसने कभी चीन के ताइवान पर दावे को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। इसी वजह से अमेरिका “Strategic Ambiguity” यानी रणनीतिक अस्पष्टता की नीति अपनाता रहा है—वह यह साफ नहीं बताता कि चीन के हमले की स्थिति में वह सीधे सैन्य हस्तक्षेप करेगा या नहीं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए कितना अहम है ताइवान?
ताइवान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है। Taiwan Semiconductor Manufacturing Company जैसी कंपनियां दुनिया के अधिकांश एडवांस सेमीकंडक्टर चिप्स बनाती हैं।
स्मार्टफोन, लैपटॉप, कार, मेडिकल उपकरण और आधुनिक हथियारों तक में इस्तेमाल होने वाली चिप्स का बड़ा हिस्सा ताइवान से आता है। अगर ताइवान में संघर्ष होता है या सप्लाई चेन बाधित होती है, तो इसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
ट्रंप, ईरान और चीन के बीच क्या है मामला?
रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप चाहते हैं कि चीन Iran पर दबाव बनाए ताकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुला रहे और वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित न हो।
चीन भी होर्मुज जलडमरूमध्य के खुले रहने के पक्ष में दिखाई दे रहा है, क्योंकि वह ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है। हालांकि इस मुद्दे पर अमेरिकी प्रशासन के भीतर मतभेद सामने आए हैं।
मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका ने चीन से किसी प्रकार की मदद नहीं मांगी है। उनके अनुसार, अमेरिका केवल अपना रुख स्पष्ट करना चाहता था ताकि चीन को यह समझ रहे कि वॉशिंगटन ईरान और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को लेकर कितना गंभीर है।


































