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छात्र आत्महत्याएँ देश के भविष्य पर गहरा संकट, मानसिक रूप से मजबूत पीढ़ी बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत: डॉ. राजेश्वर सिंह

“अंकों की दौड़ ने छीनी युवाओं की मुस्कान”

लखनऊ। सरोजनीनगर विधायक ने देश में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे भारत के भविष्य के लिए गंभीर सामाजिक और मानसिक संकट बताया है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताज़ा आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2024 में देशभर में 14,488 छात्रों द्वारा आत्महत्या किया जाना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक सोच और पारिवारिक दबाव पर बड़ा सवाल है।

उन्होंने कहा कि प्रतिदिन लगभग 40 छात्रों का जीवन समाप्त होना यह संकेत देता है कि देश का युवा वर्ग मानसिक दबाव, अकेलेपन और असफलता के भय से जूझ रहा है। आज का दौर तीव्र प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया की तुलना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और लगातार बढ़ती अपेक्षाओं का दौर है, जहाँ बच्चे और युवा भीतर से टूटते जा रहे हैं। इंटरनेट पर उत्पीड़न, परीक्षा का दबाव, करियर की चिंता और सामाजिक तुलना युवाओं के मानसिक संतुलन को प्रभावित कर रही है।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि यह केवल कानून-व्यवस्था या शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब भारत को केवल अंकों और रैंकिंग आधारित शिक्षा प्रणाली से आगे बढ़कर मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन, रचनात्मकता और जीवन कौशल आधारित शिक्षा मॉडल की ओर बढ़ना होगा।

उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि इतिहास में अनेक महान व्यक्तियों ने असफलताओं के बावजूद दुनिया में अपनी पहचान बनाई। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि चर्चिल ने कहा था — “सफलता अंतिम नहीं होती, असफलता घातक नहीं होती; आगे बढ़ते रहने का साहस ही सबसे महत्वपूर्ण होता है।”

इसी क्रम में उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति का उदाहरण देते हुए कहा कि लिंकन ने जीवन में कई चुनावी हार और कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन धैर्य और संघर्ष के बल पर वे विश्व इतिहास के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि असफलता कभी अंत नहीं होती, बल्कि व्यक्ति को और मजबूत बनाने का अवसर होती है।

डॉ. सिंह ने कहा कि जापान, दक्षिण कोरिया, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया और फ़िनलैंड जैसे देशों ने समय रहते युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और संतुलित शिक्षा व्यवस्था को प्राथमिकता दी। भारत को भी शिक्षा व्यवस्था में ऐसे सुधार करने होंगे, जहाँ बच्चों के व्यक्तित्व विकास, संवाद क्षमता, आत्मविश्वास और मानसिक मजबूती पर समान रूप से ध्यान दिया जाए।

उन्होंने माता-पिता से अपील करते हुए कहा कि बच्चों को केवल अंक लाने की मशीन न समझा जाए। हर बच्चे की प्रतिभा अलग होती है और उन्हें तुलना या अपमान नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान और सहयोग की आवश्यकता होती है। कई बार परिवार का एक संवाद, एक भरोसा और भावनात्मक समर्थन किसी बच्चे को टूटने से बचा सकता है।

शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका पर जोर देते हुए डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार, आत्मविश्वासी और मानसिक रूप से मजबूत नागरिक तैयार करना होना चाहिए। उन्होंने विद्यालयों और महाविद्यालयों में काउंसलिंग व्यवस्था, खेल, योग, ध्यान, कला, वाद-विवाद और मार्गदर्शन कार्यक्रमों को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाने की आवश्यकता बताई।

उन्होंने युवाओं से भावुक अपील करते हुए कहा कि जीवन किसी एक परीक्षा, परिणाम या असफलता से कहीं बड़ा होता है। कठिन समय हमेशा स्थायी नहीं रहता और हर अंधेरे के बाद नई शुरुआत संभव होती है। उन्होंने कहा कि तनाव या निराशा की स्थिति में चुप रहने के बजाय परिवार, मित्रों या विशेषज्ञों से संवाद करना चाहिए।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने विश्वास जताया कि यदि देश का युवा मानसिक रूप से मजबूत, अनुशासित और सकारात्मक सोच वाला बनेगा, तो आने वाले वर्षों में भारत विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और बौद्धिक शक्ति के रूप में उभरेगा।

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