
लखनऊ, 13 मई 2026। भारतीय संस्कृति, इतिहास और ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहरों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार का 77वां स्थापना दिवस बुधवार को भव्य रूप से मनाया गया। लखनऊ स्थित शहीद स्मृति भवन में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं अभिलेख प्रदर्शनी में देश की प्राचीन पांडुलिपियों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और सांस्कृतिक विरासत की अनूठी झलक देखने को मिली। कार्यक्रम का विषय था – “भारतीय ज्ञान परम्परा में पाण्डुलिपियों का महत्व एवं भावी पीढ़ी के लिए उपयोगिता”।

इस अवसर पर लखनऊ विश्वविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU), डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय सहित विभिन्न शिक्षण संस्थानों से आए करीब 200 छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। इतिहास, संस्कृति और अभिलेख संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों ने पांडुलिपियों के महत्व, उनके संरक्षण और आधुनिक समय में उनकी उपयोगिता पर विस्तृत चर्चा की।
पांडुलिपियों ने दिखाया भारत की हजारों वर्षों पुरानी ज्ञान परंपरा का वैभव
संगोष्ठी के पहले सत्र में विशेषज्ञों ने बताया कि पांडुलिपियां केवल ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत पहचान हैं। वक्ताओं ने पांडुलिपियों को लिखने की पारंपरिक विधियों, संरक्षण की चुनौतियों और युवाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला। दूसरे सत्र में विद्वानों ने कहा कि अभिलेख और पांडुलिपियां समाज को उसकी जड़ों से जोड़ती हैं और आने वाली पीढ़ियों को भारतीय इतिहास और संस्कृति को समझने का अवसर प्रदान करती हैं।
ताड़पत्र पर लिखी 200 वर्ष पुरानी पांडुलिपि बनी आकर्षण का केंद्र
कार्यक्रम में आयोजित विशेष प्रदर्शनी लोगों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र रही। प्रदर्शनी में लगभग 50 दुर्लभ पांडुलिपियां और ऐतिहासिक अभिलेख प्रदर्शित किए गए। इनमें ताड़पत्र पर लिखी लगभग 200 वर्ष पुरानी संस्कृत पांडुलिपि ‘पुरुषोत्तम माहात्म्य’ ने लोगों का विशेष ध्यान खींचा। स्कन्द पुराण पर आधारित इस पांडुलिपि में भगवान विष्णु की लीलाओं और वैष्णव भक्तों की कथाओं का वर्णन है। इसके अंतिम पृष्ठ पर अंकित ‘जगन्नाथाय नमः’ लोगों के लिए विशेष आकर्षण रहा।
दाराशिकोह की ‘सिर-ए-अकबर’ ने बढ़ाई प्रदर्शनी की ऐतिहासिक गरिमा
प्रदर्शनी में मुगल शहजादा दाराशिकोह द्वारा फारसी भाषा में लिखित प्रसिद्ध पांडुलिपि ‘सिर-ए-अकबर’ भी प्रदर्शित की गई। वर्ष 1656-57 के आसपास तैयार इस दुर्लभ कृति में 50 उपनिषदों का फारसी अनुवाद संग्रहित है। इसका उद्देश्य हिन्दू और इस्लामी दर्शन के बीच समानताओं को समझना और ज्ञान को व्यापक समाज तक पहुंचाना था।
इसके अलावा सन् 1663 की आयुर्वेद आधारित हिन्दी पांडुलिपि ‘वैद्यक रामविनोद’ भी प्रदर्शनी का प्रमुख आकर्षण रही, जिसमें मानव शरीर के 201 रोगों के लक्षण और उनके उपचार का विस्तृत उल्लेख किया गया है। वहीं संस्कृत में लिखित ‘गज चिकित्सा’ पांडुलिपि में हाथियों के रोग और उपचार की प्राचीन पद्धतियों का वर्णन किया गया।
रामचरितमानस और भगवद्गीता की दुर्लभ पांडुलिपियों ने मोहा मन
प्रदर्शनी में वेदव्यास रचित ‘श्रीमद्भगवद्गीता एवं विविध स्तोत्र’ पांडुलिपि भी रखी गई, जिसमें भगवद्गीता के साथ विष्णु सहस्त्रनाम, पांडवगीता और रामगीता जैसे ग्रंथ संग्रहित हैं। इसके साथ ही चित्रों से सुसज्जित दुर्लभ रामचरितमानस पांडुलिपि ने भी लोगों को आकर्षित किया, जिसमें भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों को अत्यंत सुंदर ढंग से चित्रित किया गया है।
डिजिटाइजेशन से संरक्षित होगी ऐतिहासिक धरोहर : जयवीर सिंह
प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ने कहा कि पांडुलिपियां भारतीय संस्कृति, इतिहास और ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार में देश-विदेश के शोधकर्ता, छात्र और लेखक अध्ययन एवं शोध कार्य के लिए आते हैं। शोधार्थियों की सुविधा के लिए अभिलेखागार में आधुनिक तकनीकों, विशेष रूप से डिजिटाइजेशन, को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि इन धरोहरों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके। उन्होंने कहा कि इंग्लैंड, अमेरिका, जर्मनी और कनाडा सहित कई देशों के शोधकर्ता यहां अध्ययन कर चुके हैं, जो प्रदेश के लिए गर्व की बात है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ने कहा कि भारत में पांडुलिपियों की परंपरा लगभग 6000 वर्ष पुरानी है और इनमें देश का ज्ञान, इतिहास और गौरव सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि पांडुलिपियां केवल इतिहास का प्रमाण नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के लिए ज्ञान और रोजगार का भी महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में भी उपस्थित रहे। अंत में प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए।


































