
- स्कूटर्स इंडिया के ऐतिहासिक परिसर में 70 एकड़ में अशोक लेलैंड का इलेक्ट्रिक वाहन संयंत्र स्थापित, औद्योगिक विकास और रोजगार की नई संभावनाएं।
- ₹176.65 करोड़ की किला मोहम्मदी ड्रेन परियोजना से 240 से अधिक मोहल्लों और लाखों लोगों को जलभराव से राहत मिलने की उम्मीद।
- लतीफनगर डिग्री कॉलेज में बीए, बीकॉम और बीएससी की 660 सीटों से क्षेत्र की बेटियों और युवाओं को उच्च शिक्षा का अवसर।
- ₹43.19 करोड़ की लागत से 589.3 मीटर लंबा हरौनी रेलवे ओवरब्रिज चालू, ग्रामीण आवागमन को मिली बड़ी राहत।
- सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल, महिला सशक्तीकरण और जनसुनवाई के माध्यम से डॉ. राजेश्वर सिंह का सरोजनीनगर के समग्र विकास पर जोर।
- ऐसे ही तमाम ऐतिहासिक कार्य सरोजनी नगर विधानसभा क्षेत्र में चल रहे हैं जिनकी नींव सिर्फ और सिर्फ आमजनमानस के उज्ज्वल भविष्य को मद्देनजर रखते हुए रखी जा रही है।

लखनऊ: शिवसागर सिंह चौहान, True News UP: बीस साल तक स्कूटर्स इंडिया के बंद गेट के सामने से गुज़रते हुए रामदीन काका की आँखें भर आती थीं। इसी गेट के भीतर उन्होंने अपनी जवानी के तीस साल स्कूटर जोड़ते हुए बिताए थे। फिर एक दिन मशीनें रुक गईं, गेट पर ताला लगा, और बेटा नौकरी के लिए दिल्ली चला गया। बीस साल वह गेट सरोजनीनगर के टूटे सपनों का स्मारक बना रहा।
आज उसी गेट के भीतर अशोक लेलैंड का 70 एकड़ में फैला इलेक्ट्रिक वाहन संयंत्र चल रहा है। रामदीन काका का पोता अब उसी परिसर में काम करने का सपना देखता है, जहाँ उसके दादा ने पसीना बहाया था। बीस साल का सन्नाटा टूट चुका है, और सरोजनीनगर फिर से निर्माण की धरती बन गया है।
बीस बरसातों तक शहरी सरोजनीनगर की सुनीता हर साल एक ही काम करती रही। आसमान में बादल देखते ही वह चौखट पर बोरियाँ लगाती, बच्चों की किताबें अलमारी के ऊपर रखती, और रात भर जागकर पानी उतरने का इंतज़ार करती। बीस साल तक 240 से अधिक मोहल्लों की यही कहानी रही। अब किला मोहम्मदी ड्रेन की रीमॉडलिंग के लिए ₹176.65 करोड़ स्वीकृत हो चुके हैं, और 35 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को जलभराव से मुक्त करने का काम तय हो गया है। सुनीता को अब भरोसा है कि उसके बच्चे बारिश में डूबी गलियों से नहीं, सूखे रास्तों से स्कूल जाएँगे।
दस साल तक लतीफनगर का डिग्री कॉलेज अधूरी दीवारों का ढाँचा बना खड़ा रहा। उन दस सालों में प्रिया जैसी सैकड़ों बेटियों ने बारहवीं के बाद किताबें बंद कर दीं, क्योंकि शहर का कॉलेज दूर था और रास्ता लंबा। आज वही कॉलेज चल रहा है, जिसमें बीए, बीकॉम और बीएससी की 660 सीटें हैं। अब सरोजनीनगर की बेटी सुबह घर से निकलती है, कॉलेज में पढ़ती है, और शाम को माँ के पास लौट आती है।
दस साल तक हरौनी रेलवे फाटक पर गाड़ियाँ घंटों खड़ी रहती थीं। उसी जाम में एक पिता अपने बीमार बच्चे को गोद में लिए ट्रेन गुज़रने का इंतज़ार करता था, और एक किसान की सब्ज़ी मंडी पहुँचने से पहले धूप में मुरझा जाती थी। आज वहाँ 589.3 मीटर लंबा ओवरब्रिज खड़ा है, जो ₹43.19 करोड़ की लागत से बनकर चालू हो चुका है। पाँच लाख से अधिक लोग अब मोहान रोड से कानपुर रोड तक बिना रुके पहुँचते हैं। उधर दस साल से कीचड़ में डूबे नहर की पटरी के रास्ते अब पक्की सड़कों में बदल चुके हैं, और गाँव मुख्य मार्गों से जुड़ गए हैं।
पंद्रह साल तक मोहान रोड का संकरा रास्ता हर सुबह जाम बनकर खड़ा मिलता था। ऑफ़िस जाने वाला देर से पहुँचता था, और स्कूल बस में बैठे बच्चे घंटों फँसे रहते थे। पंद्रह साल बाद यह माँग पूरी हुई, और मोहान रोड पर आवागमन आसान हुआ है।
दस साल तक शिवरी के लोग कचरे के पहाड़ के साए में जिए। बदबू घरों में घुसती थी, और बीमारियाँ आँगन तक पहुँचती थीं। आज वहाँ आधुनिक कचरा प्रसंस्करण संयंत्र विकसित हो चुका है। इसी संयंत्र के दम पर लखनऊ नगर निगम के 100 प्रतिशत ठोस कचरे का वैज्ञानिक प्रसंस्करण कर रहा है, और शिवरी की हवा फिर से साँस लेने लायक़ बन रही है।
दस साल तक आशियाना का इनडोर स्टेडियम अधूरा पड़ा रहा। जिन बच्चों ने उसके पूरा होने का इंतज़ार किया, वे खिलाड़ी बनने की उम्र पार कर गए। आज वह स्टेडियम पूरी तरह संचालित है, और नई पीढ़ी के खिलाड़ी उसी छत के नीचे अपने सपनों का अभ्यास कर रहे हैं।
दस साल तक किसान अपनी ज़मीन का मुआवज़ा पुराने सर्किल रेट पर तय होते देखता रहा, और हर बार ठगा हुआ महसूस करता रहा। एक दशक बाद ज़िलाधिकारी ने सर्किल रेट बढ़ाया, और पूरे ज़िले के किसानों को अपनी ज़मीन की सही क़ीमत का हक़ मिला।
दस साल तक टी.एस. मिश्रा विश्वविद्यालय से बेहटा अंडरपास का रास्ता फ़ाइलों की श्रेणी में उलझा रहा। श्रेणी परिवर्तन के निर्णय से वह गाँठ खुली, और इस मार्ग का समाधान संभव हुआ। दस साल तक औद्योगिक क्षेत्र की टूटी सड़कों पर ट्रक हिचकोले खाते रहे और उद्यमी नुकसान गिनते रहे। आज उन सड़कों का कायाकल्प पूरा हो चुका है।
बीस साल, पंद्रह साल, दस साल। सरोजनीनगर ने इंतज़ार को जिया है, गिना है, सहा है। जिन लोगों ने इन वर्षों में उम्मीद नहीं छोड़ी, आज उन्हीं की आँखों के सामने उनका सरोजनीनगर बदल रहा है।
यह बदलाव सिर्फ़ ईंट, सीमेंट और सड़क का नहीं है। यह रामदीन काका के लौटे गर्व का है, सुनीता के लौटे भरोसे का है, और प्रिया के खुले भविष्य का है।
सरोजनीनगर अब इंतज़ार करने वाला क्षेत्र नहीं है। सरोजनीनगर अब अपना भविष्य ख़ुद गढ़ रहा है।


































