दिल्ली स्थित AIIMS ने कॉर्निया की कमी से जूझ रहे मरीजों के लिए एक अहम पहल शुरू की है। एम्स के डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंटर फॉर ऑप्थैल्मिक साइंसेज के राष्ट्रीय नेत्र बैंक (NEB) में अब नई मेम्ब्रेन पीलिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तकनीक की मदद से एक डोनर से प्राप्त कॉर्निया के अलग-अलग हिस्सों को कई मरीजों के इलाज में इस्तेमाल किया जा सकेगा।
इस पहल का उद्देश्य एक ही डोनर के कॉर्नियल टिश्यू का अधिकतम उपयोग करना है, जिससे लैमेलर कॉर्नियल ट्रांसप्लांट और एलोजेनिक स्टेम सेल जैसी प्रक्रियाओं के लिए कई मरीजों को टिश्यू उपलब्ध कराया जा सके।
61 साल में 38 हजार से ज्यादा कॉर्निया जुटाए
राष्ट्रीय नेत्र बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 61 वर्षों में 38 हजार से अधिक कॉर्निया एकत्र किए जा चुके हैं। इनकी मदद से कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से प्रभावित 28 हजार से ज्यादा मरीजों का कॉर्निया प्रत्यारोपण किया गया है।
इसी अवधि में 500 से अधिक नेत्र विशेषज्ञों को कॉर्निया ट्रांसप्लांट से जुड़ी आधुनिक तकनीकों की ट्रेनिंग भी दी गई है। इससे देश में कॉर्नियल सर्जरी की विशेषज्ञता को बढ़ाने में मदद मिली है।
2025 में 2,167 कॉर्निया किए गए कलेक्ट
राष्ट्रीय नेत्र बैंक ने वर्ष 2025 में कुल 2,167 कॉर्निया प्राप्त किए। इनमें से 1,775 कॉर्निया यानी करीब 81.9 प्रतिशत हॉस्पिटल कॉर्नियल रिट्रीवल प्रोग्राम (HCRP) के माध्यम से मिले।
एम्स-दिल्ली का HCRP मॉडल अस्पतालों में होने वाली मृत्यु की सूचना और कॉर्नियल टिश्यू रिट्रीवल की प्रक्रिया को बेहतर तरीके से जोड़ता है, जिससे जरूरतमंद मरीजों के लिए प्रत्यारोपण योग्य कॉर्नियल टिश्यू उपलब्ध कराया जा सके।
एम्स के अनुसार, राष्ट्रीय नेत्र बैंक लगातार चौथे साल 1,300 से अधिक कॉर्निया ट्रांसप्लांट करने में सफल रहा। वर्ष 2025 में 1,775 मरीजों का कॉर्निया प्रत्यारोपण किया गया और कॉर्निया उपयोग की दर लगभग 82 प्रतिशत रही।
‘एक डोनर, कई मरीज’ मॉडल पर जोर
कॉर्नियल टिश्यू की उपलब्धता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय नेत्र बैंक ने इस साल कई अस्पतालों के साथ सहयोग बढ़ाया है। इसके तहत अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एवं डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल, इंदिरा गांधी अस्पताल द्वारका और नॉर्दर्न रेलवे सेंट्रल अस्पताल के साथ समझौते किए गए हैं।
इसके अलावा बच्चों के कॉर्निया प्रत्यारोपण के लिए दूसरे आई बैंकों से टिश्यू उपलब्ध कराने की दिशा में भी काम किया जा रहा है। RayMed Ltd. के सहयोग से चल रही एक परियोजना इसी उद्देश्य से जुड़ी है।
आरपी सेंटर में ‘एक डोनर, कई मरीज’ मॉडल को आगे बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसके तहत कॉर्निया के अलग-अलग हिस्सों को जरूरत के मुताबिक अलग-अलग उपचार प्रक्रियाओं में इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है।
कॉर्निया प्रिजर्वेशन पर भी हो रहा काम
कॉर्निया को लंबे समय तक सुरक्षित और उपयोग योग्य बनाए रखने के लिए प्रिजर्वेशन मीडिया पर भी काम किया जा रहा है।
राष्ट्रीय अंधत्व नियंत्रण कार्यक्रम के सहयोग से आरपी सेंटर का ऑक्यूलर फार्माकोलॉजी विभाग ‘ExStorSol’ नामक कॉर्नियल प्रिजर्वेशन मीडिया तैयार कर रहा है।
वर्ष 2025-26 में इसके 4,652 से अधिक वायल देश के 24 राज्यों में मौजूद 130 आई बैंकों को उपलब्ध कराए गए।
ऑनलाइन सिस्टम से नेत्रदान की प्रक्रिया होगी तेज
एम्स में मृत्यु की सूचना देने के लिए 100 प्रतिशत ऑनलाइन सिस्टम भी शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य नेत्रदान से जुड़े काउंसलर और तकनीशियनों को समय रहते संबंधित परिवार तक पहुंचने में मदद करना है।
राष्ट्रीय नेत्र बैंक और ORBO ने नेत्रदान की प्रतिज्ञा के लिए ऑनलाइन सुविधा भी उपलब्ध कराई है। एम्स के अनुसार, पिछले एक साल में 100 लोगों ने राष्ट्रीय नेत्र बैंक के माध्यम से मृत्यु के बाद नेत्रदान करने की प्रतिज्ञा की।
नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए स्कूलों, कॉलेजों और रिहायशी इलाकों में भी कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी अभियान के तहत 25 अगस्त 2026 को एम्स परिसर में ‘वॉक फॉर आई डोनेशन’ का आयोजन किया गया।
DMEK तकनीक से प्रभावित परत का ही ट्रांसप्लांट
आरपी सेंटर में स्यूचरलेस डेसमेट मेम्ब्रेन एंडोथीलियल केराटोप्लास्टी यानी DMEK जैसी आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।
इस प्रक्रिया में पूरे कॉर्निया को बदलने के बजाय केवल उसकी प्रभावित कार्यात्मक परत का प्रत्यारोपण किया जाता है। इससे उपयुक्त मरीजों में अधिक लक्षित तरीके से उपचार किया जा सकता है।
केंद्र में केराटोकोनस और फुच्स एंडोथीलियल कॉर्नियल डिस्ट्रॉफी जैसी कॉर्नियल बीमारियों से जुड़े आनुवंशिक और सूजन संबंधी कारणों पर भी शोध किया जा रहा है।
Vision-Aid के साथ पांच साल की साझेदारी
वर्ष 2026 में एम्स ने Vision-Aid के साथ पांच साल की साझेदारी भी की है। इसके तहत दिल्ली-एनसीआर में 10 इंटीग्रेटेड विजन सेंटर स्थापित करने की योजना है।
इसके साथ ही बच्चों में सेरेब्रल विजुअल इम्पेयरमेंट (CVI) से जुड़ी जरूरतों के लिए एक रिसोर्स सेंटर विकसित करने की भी योजना बनाई गई है।
एम्स की इन पहलों का उद्देश्य केवल अधिक कॉर्निया जुटाना ही नहीं, बल्कि उपलब्ध कॉर्नियल टिश्यू का बेहतर इस्तेमाल, आधुनिक ट्रांसप्लांट तकनीकों को बढ़ावा देना और जरूरतमंद मरीजों तक आंखों के इलाज की सुविधाएं पहुंचाना है।


































