नेपाल इस समय भीषण बाढ़ और भारी बारिश से जूझ रहा है। कई इलाकों में पानी का स्तर तेजी से बढ़ने के कारण जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की खबर है, जबकि लापता लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। इस बीच ऐसी खबरें सामने आईं कि नेपाल ने अमेरिका, चीन समेत कुछ मित्र देशों की ओर से भेजी जाने वाली राहत और बचाव टीमों की पेशकश को स्वीकार नहीं किया है।
हालांकि, नेपाल सरकार ने शुक्रवार को इन खबरों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि उसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहायता लेने से इनकार नहीं किया है। सरकार का कहना है कि फिलहाल स्थानीय परिस्थितियों और दुर्गम क्षेत्रों की बेहतर जानकारी रखने वाले नेपाली सुरक्षा बलों को बचाव अभियान में प्राथमिकता दी जा रही है।
नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय मदद को लेकर क्या कहा?
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि सरकार ने मित्र देशों या अंतरराष्ट्रीय संगठनों से मिलने वाली सहायता के दरवाजे बंद नहीं किए हैं। जरूरत पड़ने पर तकनीकी विशेषज्ञता और अन्य जरूरी सहयोग लिया जाएगा।
सरकार का तर्क है कि बाढ़ से प्रभावित कई इलाके बेहद दुर्गम हैं और वहां की भौगोलिक परिस्थितियों से नेपाली सेना तथा पुलिस के जवान अच्छी तरह परिचित हैं। इसलिए शुरुआती राहत और बचाव अभियान में स्थानीय सुरक्षा बलों की अधिकतम तैनाती को प्राथमिकता दी जा रही है।
विदेश मंत्री के मुताबिक, जिस क्षेत्र में अतिरिक्त तकनीकी क्षमता की आवश्यकता महसूस होगी, वहां उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय सहायता का इस्तेमाल किया जा सकता है।
अमेरिका, चीन समेत कई देशों के नागरिक लापता
नेपाल में आई आपदा के बीच कई देशों के नागरिकों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। इनमें भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, मलेशिया और यूक्रेन समेत कई देशों के नागरिक शामिल बताए जा रहे हैं।
ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेपाल को राहत और खोज अभियान में सहयोग देने की पेशकश की गई है। नेपाल सरकार का कहना है कि वह जरूरत के हिसाब से इन प्रस्तावों पर फैसला करेगी।
2015 के भूकंप का अनुभव बना वजह?
नेपाल के मौजूदा फैसले के पीछे 2015 में आए विनाशकारी भूकंप के दौरान का अनुभव भी एक वजह माना जा रहा है।
उस समय दुनिया के कई देशों से बड़ी संख्या में राहत और बचाव दल नेपाल पहुंचे थे। अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय टीमों के बीच तालमेल, संसाधनों के प्रबंधन और राहत अभियान को एक दिशा में संचालित करने को लेकर कई चुनौतियां सामने आई थीं।
नेपाली अधिकारियों का मानना है कि बड़ी संख्या में विदेशी टीमों की मौजूदगी के कारण उस समय समन्वय और प्रशासनिक प्रबंधन मुश्किल हो गया था। इसी अनुभव से सबक लेते हुए इस बार सरकार शुरुआत से ही बचाव अभियान को अपने नियंत्रण में रखना चाहती है।
सेना और पुलिस की भूमिका पर भरोसा
बताया जा रहा है कि नेपाल की सुरक्षा एजेंसियों ने सरकार को भरोसा दिलाया है कि सेना और पुलिस स्थानीय परिस्थितियों में खोज एवं बचाव अभियान को प्रभावी तरीके से संचालित कर सकती हैं।
इसी वजह से विदेशी बचाव दलों को सीधे नेपाल भेजने के प्रस्तावों को फिलहाल सीमित रखा गया है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि नेपाल दूसरे देशों से किसी भी प्रकार की सहायता नहीं ले रहा है।
सरकार राहत सामग्री, चिकित्सा सहायता और आर्थिक सहयोग जैसे विकल्पों को स्वीकार कर रही है।
भारत से राहत और तकनीकी मदद ले रहा नेपाल
भारत ने नेपाल को राहत और बचाव कार्यों में सहयोग की पेशकश की है और नेपाल की जरूरत के मुताबिक सहायता उपलब्ध कराने की तैयारी की जा रही है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर के मुताबिक, नेपाल में कुछ लोगों के सुरंग में फंसे होने की आशंका है। ऐसे में भारत की ओर से टनल रेस्क्यू में विशेषज्ञता रखने वाली टीम भेजने की तैयारी की जा रही है।
इसके अलावा नेपाल को बेली ब्रिज उपलब्ध कराने की भी तैयारी है। इन पुलों को अपेक्षाकृत कम समय में तैयार किया जा सकता है और बाढ़ से क्षतिग्रस्त संपर्क मार्गों को बहाल करने में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।
भारत की ओर से मेडिकल टीम भेजने का विकल्प भी नेपाल को दिया गया है। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) की टीम भी भेजी जा सकती है।
राहत सामग्री लेकर भारत ने भेजे विमान
भारत की ओर से राहत सामग्री लेकर दो विमान नेपाल पहुंच चुके हैं, जबकि एक और विमान भेजे जाने की तैयारी है। इन विमानों के जरिए आपदा प्रभावित लोगों के लिए आवश्यक राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है।
इससे स्पष्ट है कि नेपाल विदेशी सहायता के पूरी तरह खिलाफ नहीं है। फिलहाल उसकी प्राथमिकता यह है कि जमीन पर होने वाले खोज और बचाव अभियान में नेपाली सुरक्षा बलों को मुख्य भूमिका दी जाए और जहां विशेषज्ञता या अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत पड़े, वहां अंतरराष्ट्रीय सहयोग लिया जाए।
नेपाल का रुख क्या बताता है?
नेपाल का मौजूदा रुख पूरी तरह विदेशी मदद को अस्वीकार करने के बजाय जरूरत के मुताबिक सहायता लेने पर आधारित दिखाई देता है। सरकार स्थानीय सुरक्षा बलों की क्षमता का इस्तेमाल करते हुए अंतरराष्ट्रीय सहायता को तकनीकी और संसाधन आधारित सहयोग के रूप में लेने पर जोर दे रही है।
बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित इलाकों में हालात लगातार बदल रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में अगर बचाव अभियान के लिए अतिरिक्त विशेषज्ञता या संसाधनों की जरूरत पड़ती है, तो नेपाल दूसरे देशों की मदद का दायरा बढ़ा सकता है।


































