नेपाल और तिब्बत से लगे हिमालयी इलाके में आई विनाशकारी बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी है। तेज बहाव और मलबे की चपेट में कई इलाके आ गए, जबकि बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और कई लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। राहत एवं बचाव अभियान जारी है और प्रभावित परिवार अपनों के सुरक्षित लौटने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
पहली नजर में यह आपदा अचानक आई प्राकृतिक घटना लग सकती है, लेकिन हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते ग्लेशियर पिघलने और उससे जुड़े खतरों को लेकर वैज्ञानिक पहले ही चेतावनी देते रहे हैं। करीब दो महीने पहले जारी रिपोर्टों में भी ग्लेशियरों के तेजी से सिकुड़ने और अचानक बाढ़ के खतरे को लेकर चिंता जताई गई थी।
तेजी से पिघल रहे हिमालय के ग्लेशियर
हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र को लेकर जारी एक वैज्ञानिक आकलन में बताया गया था कि ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ी है। खासतौर पर वर्ष 2000 के बाद ग्लेशियरों के सिकुड़ने की गति में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
रिपोर्ट के मुताबिक छोटे और अपेक्षाकृत कमजोर ग्लेशियर सबसे तेजी से अपना बर्फीला क्षेत्र खो रहे हैं। इसका सीधा असर ऊंचाई वाले इलाकों में मौजूद ग्लेशियर झीलों पर पड़ सकता है। ऐसी झीलों के अचानक टूटने या उनमें पानी का स्तर तेजी से बढ़ने पर निचले इलाकों में फ्लैश फ्लड का खतरा पैदा हो जाता है।
वैज्ञानिक आकलन के अनुसार 1975 के बाद से इस क्षेत्र के ग्लेशियरों की बर्फ की मोटाई में करीब 27 मीटर तक की कमी देखी गई है।
नेपाल-चीन सीमा पर बाढ़ ने मचाई भारी तबाही
नेपाल और चीन की सीमा से लगे इलाके में आई बाढ़ के बाद बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान की खबर सामने आई है। अब तक करीब 475 लोगों की मौत की पुष्टि होने और लगभग 1,000 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है।
आपदा के बाद विशेषज्ञ यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में पानी और मलबा इतनी तेजी से नीचे कैसे आया। शुरुआती आकलन में ऊंचाई वाले क्षेत्र से बर्फ, चट्टानों और मलबे के खिसकने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।
ग्लेशियर के नीचे का हिस्सा टूटने से आया मलबा?
हिमालयी आपदाओं पर काम करने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक इस घटना में संभव है कि ग्लेशियर के नीचे मौजूद आधार चट्टान का एक हिस्सा टूटकर अलग हो गया हो। इसके बाद बर्फ और चट्टानों का भारी मलबा तेजी से नीचे की घाटी की तरफ आया और बाढ़ के पानी के साथ बहता चला गया।
इस तरह के मलबे के नदी में जमा होने से आगे एक नई समस्या पैदा हो सकती है। नदी का रास्ता रुकने पर अस्थायी बांध जैसी स्थिति बन सकती है, जिसके पीछे पानी जमा होने लगता है। यदि यह प्राकृतिक अवरोध कमजोर पड़ता है और अचानक टूट जाता है, तो नीचे के इलाकों में दोबारा तेज बाढ़ आ सकती है।
अगले कुछ दिनों में फिर बढ़ सकता है खतरा
विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि मलबे के कारण बने अस्थायी जलाशय में अगले कुछ दिनों तक पानी बढ़ सकता है। अगर जलस्तर तेजी से बढ़ा और प्राकृतिक अवरोध कमजोर हुआ, तो आसपास के इलाकों में एक और अचानक बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।
हालांकि, एक दूसरा संभावित परिदृश्य यह भी है कि पानी धीरे-धीरे प्राकृतिक अवरोध से बाहर निकल जाए और अचानक बड़ी बाढ़ की स्थिति न बने। इसलिए प्रभावित घाटी और नदी के आसपास के क्षेत्रों में निगरानी बेहद जरूरी मानी जा रही है।
चमोली जैसी घटना से मिलती है समानता
विशेषज्ञों ने इस घटना की तुलना फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली में हुई आपदा से भी की है। उस घटना में ऊंचाई वाले इलाके से बड़ी मात्रा में मलबा नीचे आया था और कुछ समय के लिए ऋषिगंगा नदी का प्रवाह बाधित हो गया था।
ऐसी घटनाओं में पानी और मलबे का मिश्रित तेज बहाव निचले इलाकों में बहुत कम समय में भारी नुकसान पहुंचा सकता है। यही वजह है कि मौजूदा हालात में नदी घाटियों और निचले इलाकों पर विशेष नजर रखने की जरूरत बताई जा रही है।
नेपाल ने जारी की नई बाढ़ चेतावनी
पहले से प्रभावित इलाके में पानी का स्तर दोबारा बढ़ने के बाद नेपाल प्रशासन ने नए सिरे से बाढ़ की चेतावनी जारी की है। स्थानीय लोगों को संवेदनशील इलाकों से दूर रहने और प्रशासन के निर्देशों का पालन करने को कहा गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बचाव अभियान के साथ-साथ प्रभावित क्षेत्र में जलस्तर और मलबे से बने अवरोधों की लगातार निगरानी करना जरूरी है।
38 ग्लेशियरों के अध्ययन से सामने आई चिंता
हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियरों पर किए गए 2026 के आकलन में 38 ग्लेशियरों से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि वर्ष 2000 के बाद ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार पहले की तुलना में करीब दोगुनी हो गई है।
हालांकि, अध्ययन में हिमालयी ग्लेशियरों की निगरानी व्यवस्था को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई। 38 ग्लेशियरों में केवल सात ही ऐसे पाए गए जो वैश्विक निगरानी मानकों के अनुरूप पर्याप्त डेटा उपलब्ध करा रहे थे।
काराकोरम, सिक्किम, जांस्कर और भूटान जैसे महत्वपूर्ण ग्लेशियर क्षेत्रों में निगरानी का नेटवर्क अभी भी पर्याप्त नहीं माना जा रहा है।
वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती निगरानी की कमी
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय तेजी से बदल रहा है, लेकिन उसके साथ तालमेल बिठाने के लिए निगरानी व्यवस्था उतनी तेजी से विकसित नहीं हुई है।
ग्लेशियरों के आकार, बर्फ की मोटाई, झीलों के जलस्तर और मलबे की गतिविधियों पर लगातार नजर रखना बेहद जरूरी है। यदि इन बदलावों की समय रहते पहचान नहीं हो पाती, तो किसी बड़े खतरे की जानकारी तब मिलती है जब नुकसान शुरू हो चुका होता है।
पूर्वी हिमालयी इलाकों में तेजी से घट रही बर्फ
अध्ययन में पूर्वी हेंगडुआन शान क्षेत्र के ग्लेशियरों में तेजी से हो रहे बदलाव को भी रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन दशकों में कुछ हिस्सों में ग्लेशियरों की बर्फ में करीब 33 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है।
सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी घाटियां इस बदलाव से विशेष रूप से प्रभावित हैं। इन तीनों नदी घाटियों में हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के 74 प्रतिशत से अधिक ग्लेशियर मौजूद हैं।
चेतावनी अब सिर्फ भविष्य की नहीं, वर्तमान की भी है
नेपाल की मौजूदा बाढ़ ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के तेजी से बदलते स्वरूप को लेकर चेतावनियों को कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है।
बाढ़ का वास्तविक कारण और इस आपदा में ग्लेशियर या मलबे की भूमिका पूरी वैज्ञानिक जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। लेकिन ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने, ग्लेशियर झीलों के बढ़ते खतरे और कमजोर निगरानी व्यवस्था को देखते हुए विशेषज्ञ हिमालयी क्षेत्रों में बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली और लगातार निगरानी की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।


































