देश में कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दो अहम कीमोथेरेपी दवाओं—सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन—की कीमतों में बढ़ोतरी को सरकार ने मंजूरी दे दी है। इन दवाओं की लगातार कमी और सप्लाई संकट को देखते हुए यह फैसला लिया गया है।
क्यों बढ़ाई गई कीमत?
इन दवाओं के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले प्लेटिनम की कीमतों में पिछले कुछ वर्षों में तेज उछाल आया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कच्चे माल की कीमतों में भारी वृद्धि और वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव के कारण कंपनियों के लिए पुराने दामों पर उत्पादन जारी रखना मुश्किल हो गया था।
इसी वजह से कई दवा कंपनियों ने उत्पादन कम कर दिया, जिससे बाजार में इन दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हुई।
अस्पतालों में पहले से थी कमी
देश के बड़े अस्पतालों जैसे एम्स और टाटा मेमोरियल सेंटर में भी इन दवाओं की कमी की शिकायतें सामने आ चुकी थीं। डॉक्टरों के अनुसार, ये दवाएं लंग्स, सिर-गर्दन, सर्वाइकल, ओवरी और टेस्टिकुलर कैंसर समेत कई गंभीर कैंसर के इलाज में बेहद जरूरी हैं।
इनका कोई पूरी तरह समान विकल्प उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीजों के इलाज पर सीधा असर पड़ सकता है।
सरकार का फैसला और नियमों में छूट
दवाओं की कमी को देखते हुए सरकार ने ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) 2013 के विशेष प्रावधान के तहत यह फैसला लिया है। इसके तहत आवश्यक दवाओं की उपलब्धता प्रभावित होने पर सामान्य मूल्य नियंत्रण नियमों से अलग जाकर कीमतों में संशोधन किया जा सकता है।
एक समिति की सिफारिश के अनुसार, हर साल अधिकतम 10% तक बढ़ोतरी और कुल मिलाकर 50% तक वृद्धि की अनुमति पर विचार किया गया है, हालांकि अंतिम निर्णय उत्पादन लागत को ध्यान में रखकर तय होगा।
मरीजों पर क्या असर पड़ेगा?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन दवाओं की कमी जारी रहती, तो कई मरीजों के इलाज में देरी हो सकती थी। इससे कैंसर के दोबारा लौटने और रिकवरी दर पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका रहती है।
सरकार का मानना है कि कीमतों में संशोधन के बाद कंपनियां फिर से उत्पादन बढ़ाएंगी, जिससे बाजार में दवाओं की उपलब्धता बेहतर होगी।
निष्कर्ष
हालांकि कीमतों में बढ़ोतरी से शुरुआती तौर पर मरीजों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है, लेकिन यह कदम दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने और सप्लाई संकट को दूर करने के लिए जरूरी बताया जा रहा है।


































