डायबिटीज की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाला HbA1c टेस्ट लंबे समय से सबसे भरोसेमंद जांच माना जाता रहा है, लेकिन अब विशेषज्ञों का कहना है कि कई भारतीय मरीजों में यह टेस्ट पूरी तरह सही तस्वीर नहीं दिखा पाता। हालिया रिसर्च में सामने आया है कि खून से जुड़ी कुछ सामान्य समस्याएं इस जांच के नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे डायबिटीज या प्रीडायबिटीज का सही समय पर पता लगाना मुश्किल हो जाता है।
रिपोर्ट और शरीर के लक्षणों में दिखा फर्क
विशेषज्ञों के सामने एक ऐसा मामला आया, जिसमें एक 45 वर्षीय मरीज का HbA1c स्तर सामान्य सीमा के करीब था और उसे प्रीडायबिटीज माना जा रहा था। हालांकि, उसकी फास्टिंग ब्लड शुगर लगातार ज्यादा आ रही थी और आंखों में डायबिटीज से जुड़ी शुरुआती दिक्कतों के संकेत भी मिलने लगे थे। इससे डॉक्टरों को शक हुआ कि केवल HbA1c रिपोर्ट के आधार पर बीमारी का सही आकलन नहीं हो पा रहा।
किन समस्याओं से प्रभावित हो सकता है टेस्ट?
रिसर्च में पाया गया कि भारत और दक्षिण एशिया में आम तौर पर पाई जाने वाली कई ब्लड डिसऑर्डर HbA1c टेस्ट के रिजल्ट को बदल सकती हैं। इनमें शामिल हैं:
- आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया
- थैलेसीमिया
- G6PD की कमी
- दूसरी हीमोग्लोबिन से जुड़ी बीमारियां
ये स्थितियां रेड ब्लड सेल्स की उम्र और व्यवहार को प्रभावित करती हैं, जबकि HbA1c टेस्ट इन्हीं सेल्स के आधार पर पिछले तीन महीनों का औसत ब्लड शुगर मापता है।
कैसे गलत हो सकती है रिपोर्ट?
अगर शरीर में रेड ब्लड सेल्स ज्यादा समय तक रहती हैं, तो HbA1c का स्तर वास्तविकता से ज्यादा दिख सकता है। वहीं अगर रेड ब्लड सेल्स जल्दी टूटती हैं, तो HbA1c कम दिखाई दे सकता है, जबकि असली ब्लड शुगर ज्यादा हो सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया काफी आम है और यह HbA1c को जरूरत से ज्यादा बढ़ाकर दिखा सकता है। दूसरी तरफ G6PD की कमी जैसी स्थिति में रिपोर्ट सामान्य या कम आ सकती है, जबकि मरीज को डायबिटीज हो सकती है।
सिर्फ एक टेस्ट पर निर्भर रहना क्यों ठीक नहीं?
डॉक्टरों का कहना है कि HbA1c टेस्ट हीमोग्लोबिन पर आधारित होता है, इसलिए जो भी बीमारी हीमोग्लोबिन को प्रभावित करती है, वह इस जांच की सटीकता कम कर सकती है। ऐसे में केवल HbA1c के भरोसे डायबिटीज की पहचान करना हर मरीज के लिए सही तरीका नहीं माना जा रहा।
विशेषज्ञ अब सलाह दे रहे हैं कि जरूरत पड़ने पर इन जांचों का सहारा भी लिया जाए:
- फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट
- ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (OGTT)
- नियमित शुगर मॉनिटरिंग
- कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटरिंग (CGM)
कम उम्र में बढ़ रहे हैं डायबिटीज के मामले
डॉक्टरों का कहना है कि भारत में अब कम उम्र और सामान्य वजन वाले लोग भी तेजी से डायबिटीज की चपेट में आ रहे हैं। ऐसे में बीमारी की सही और समय पर पहचान बेहद जरूरी हो गई है।
एक स्टडी में पाया गया कि ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट ने बड़ी संख्या में प्रीडायबिटीज के मामलों की पहचान की, जबकि HbA1c कई मामलों को पकड़ नहीं पाया। इससे साफ है कि कई बार अलग-अलग जांचों को साथ में करना ज्यादा भरोसेमंद साबित हो सकता है।
भविष्य में कैसे बदलेगा इलाज?
विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में डायबिटीज का इलाज “प्रिसीजन मेडिसिन” की दिशा में बढ़ेगा। यानी इलाज केवल एक रिपोर्ट देखकर नहीं, बल्कि मरीज की बॉडी, खानपान, लाइफस्टाइल, जेनेटिक्स और मेडिकल हिस्ट्री को ध्यान में रखकर तय किया जाएगा।
हालांकि चुनौती यह है कि ऐसी एडवांस जांच और तकनीकें अभी हर व्यक्ति की पहुंच में नहीं हैं। इसलिए डॉक्टर किसी भी रिपोर्ट को समझने से पहले मरीज की पूरी स्थिति का आकलन करने की सलाह दे रहे हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख स्वास्थ्य विशेषज्ञों और रिसर्च आधारित जानकारी पर तैयार किया गया है। किसी भी जांच या इलाज को लेकर फैसला लेने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।


































