Marco Rubio ने कहा है कि Iran के खिलाफ जारी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य वहां की सरकार को बदलना नहीं, बल्कि उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को कमजोर करना है। उनके अनुसार ऑपरेशन का फोकस खासतौर पर छोटी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों और ईरानी नौसेना से उत्पन्न खतरे को समाप्त करना है, जिससे अमेरिकी नौसैनिक जहाजों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
रुबियो ने बताया कि अब तक की कार्रवाई “काफी सफल” रही है, लेकिन अभियान अभी खत्म नहीं हुआ है। उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले दिनों में और भी कड़े हमले किए जा सकते हैं।
पहले हमला क्यों किया?
रुबियो के मुताबिक, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को पहले से संकेत मिल चुके थे कि यदि ईरान पर हमला होता है तो वह तुरंत जवाबी कार्रवाई करेगा। कथित तौर पर ईरानी कमांडरों को पहले ही जवाबी हमले के आदेश दिए जा चुके थे। ऐसे में अगर अमेरिका पहले कदम न उठाता, तो अमेरिकी सैनिकों और ठिकानों को भारी नुकसान हो सकता था।
उन्होंने कहा कि यदि खतरे की जानकारी होने के बावजूद अमेरिका इंतजार करता और बाद में हमला झेलता, तो प्रशासन पर सवाल उठते कि पहले कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
मिसाइल ताकत खत्म करना मुख्य लक्ष्य
रुबियो ने स्पष्ट किया कि इस मिशन का उद्देश्य ईरान की मिसाइल क्षमता को इस हद तक नुकसान पहुंचाना है कि वह उसे दोबारा खड़ा न कर सके। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी लक्ष्य है कि मिसाइल कार्यक्रम की आड़ में परमाणु गतिविधियों को आगे न बढ़ाया जाए।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ईरान में अलग नेतृत्व देखना चाहता है, लेकिन मौजूदा सैन्य अभियान का घोषित उद्देश्य शासन परिवर्तन नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि “सबसे कड़े प्रहार अभी बाकी हैं” और अगला चरण ईरान के लिए ज्यादा नुकसानदेह हो सकता है।
अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, कांग्रेस में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े वरिष्ठ नेताओं को अभियान की नियमित जानकारी दी जा रही है।
इंटरसेप्टर मिसाइल उत्पादन पर बयान
रुबियो ने अमेरिकी रक्षा उत्पादन क्षमता को लेकर भी बयान दिया। उनके अनुसार, अमेरिका हर महीने लगभग 6 से 7 इंटरसेप्टर मिसाइलें तैयार कर पाता है। ये मिसाइलें दुश्मन की मिसाइलों को हवा में ही नष्ट करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं।
इसके विपरीत, उन्होंने दावा किया कि ईरान हर महीने 100 से अधिक मिसाइलें और हजारों ड्रोन बनाने की क्षमता रखता है। इस उत्पादन अंतर को उन्होंने रणनीतिक चुनौती बताया, क्योंकि हमलावर हथियारों की तुलना में रक्षा प्रणाली का निर्माण अपेक्षाकृत धीमा है।
अमेरिका का कहना है कि यह अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक तय किए गए सभी सैन्य लक्ष्य हासिल नहीं हो जाते और क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत नहीं कर लिया जाता।


































