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Backward Walking: पीछे की ओर चलने से घुटनों के दर्द में मिल सकती है राहत? जानें फायदे और सावधानियां

घुटनों में दर्द अब केवल बढ़ती उम्र की समस्या नहीं रह गई है। लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना, शारीरिक गतिविधि की कमी, बढ़ता वजन और मांसपेशियों की कमजोरी जैसी वजहों से कम उम्र के लोगों में भी घुटनों से जुड़ी परेशानियां देखने को मिल रही हैं। दर्द से राहत पाने के लिए लोग अलग-अलग तरह की एक्सरसाइज और घरेलू तरीकों को आजमाते हैं।

इन्हीं में Backward Walking यानी पीछे की ओर चलना इन दिनों काफी चर्चा में है। इसे लेकर सवाल उठता है कि क्या उल्टी दिशा में चलने से वास्तव में घुटनों के दर्द में राहत मिल सकती है या फिर यह सिर्फ एक नया फिटनेस ट्रेंड है। कुछ शोधों में इसके संभावित फायदे सामने आए हैं, लेकिन इसे हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त व्यायाम नहीं माना जा सकता।

पीछे चलने से घुटनों पर क्या असर पड़ता है?

सामान्य तरीके से चलते समय घुटने के जोड़ पर एक खास तरह का दबाव पड़ता है। पीछे की ओर चलने पर चलने का पैटर्न बदल जाता है, जिससे घुटने के कुछ हिस्सों पर पड़ने वाला भार भी अलग तरीके से वितरित होता है।

यह गतिविधि उन मांसपेशियों को सक्रिय कर सकती है, जिनका सामान्य वॉकिंग के दौरान अपेक्षाकृत कम इस्तेमाल होता है। खास तौर पर घुटने को सहारा देने वाली मांसपेशियों की सक्रियता बढ़ने से संतुलन और पैरों की कार्यक्षमता में सुधार हो सकता है।

कुछ लोगों में, विशेषकर घुटने के ऑस्टियोआर्थराइटिस या घुटने के सामने वाले हिस्से में परेशानी होने पर, नियंत्रित तरीके से किया गया बैकवर्ड वॉकिंग दर्द और असहजता कम करने में मदद कर सकता है।

क्या इससे घुटने का दर्द पूरी तरह ठीक हो जाता है?

यह समझना जरूरी है कि पीछे की ओर चलना घुटने के दर्द का कोई स्थायी या अकेला इलाज नहीं है। घुटनों में दर्द होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे शरीर का अधिक वजन, मांसपेशियों की कमजोरी, चोट, जोड़ में घिसाव या उम्र से संबंधित बदलाव।

इसलिए केवल बैकवर्ड वॉकिंग पर निर्भर रहने के बजाय जरूरत के अनुसार स्ट्रेंथ एक्सरसाइज, वजन को नियंत्रित रखना, मांसपेशियों की फ्लेक्सिबिलिटी बनाए रखना और रोजमर्रा की गतिविधियों में सुधार करना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

बैकवर्ड वॉकिंग के संभावित फायदे

पीछे की ओर चलने को सही तरीके और सुरक्षित परिस्थितियों में किया जाए, तो इसके कई संभावित फायदे हो सकते हैं।

घुटनों पर दबाव में बदलाव: पीछे चलने से सामान्य वॉकिंग की तुलना में घुटने पर लगने वाला भार अलग तरीके से वितरित हो सकता है।

क्वाड्रिसेप्स की मजबूती: यह एक्सरसाइज जांघ के सामने मौजूद क्वाड्रिसेप्स मांसपेशियों को सक्रिय करने में मदद कर सकती है, जो घुटने को सपोर्ट देती हैं।

संतुलन बेहतर करने में मदद: उल्टी दिशा में चलने के दौरान शरीर को अपने मूवमेंट पर अधिक ध्यान देना पड़ता है, जिससे बैलेंस और कोऑर्डिनेशन पर काम हो सकता है।

घुटने की कार्यक्षमता में सुधार: नियमित और नियंत्रित अभ्यास कुछ लोगों में पैरों की ताकत और घुटने की कार्यक्षमता को बेहतर करने में मदद कर सकता है।

दर्द में संभावित राहत: घुटने के कुछ खास प्रकार के दर्द में यह सहायक एक्सरसाइज के तौर पर उपयोगी हो सकती है।

पीछे चलते समय सबसे ज्यादा जरूरी है सुरक्षा

बैकवर्ड वॉकिंग का सबसे बड़ा जोखिम गिरने का है। पीछे चलते समय व्यक्ति को सामने की जमीन साफ दिखाई नहीं देती। ऐसे में रास्ते में कोई गड्ढा, सीढ़ी, पत्थर या दूसरी बाधा होने पर चोट लग सकती है।

इसलिए इसे सड़क, सीढ़ियों या ऊबड़-खाबड़ जमीन पर करने से बचना चाहिए। शुरुआत किसी सपाट और सुरक्षित जगह पर करनी बेहतर होती है। जरूरत पड़ने पर किसी फिटनेस एक्सपर्ट या फिजियोथेरेपिस्ट की निगरानी में इसे शुरू किया जा सकता है।

शुरुआत में कुछ मिनट ही पीछे चलें और शरीर की प्रतिक्रिया के अनुसार धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। अगर अभ्यास के दौरान दर्द बढ़े, चक्कर आए या असहजता महसूस हो तो तुरंत रुक जाना चाहिए।

किन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए?

अगर घुटने में गंभीर दर्द, हाल की चोट, सूजन, संतुलन की समस्या या चलने में पहले से परेशानी है, तो बिना विशेषज्ञ की सलाह के बैकवर्ड वॉकिंग शुरू नहीं करनी चाहिए।

घुटने के दर्द की सही वजह पता करना भी जरूरी है। हर तरह के दर्द में एक ही एक्सरसाइज काम नहीं करती। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट से सलाह लेकर ऐसा व्यायाम चुना जाना चाहिए जो आपकी स्थिति के लिए सुरक्षित हो।

निष्कर्ष: बैकवर्ड वॉकिंग कुछ लोगों के लिए घुटनों की ताकत, संतुलन और दर्द प्रबंधन में उपयोगी हो सकती है। हालांकि, इसे घुटने के दर्द का पूरा इलाज नहीं माना जाना चाहिए। बेहतर परिणाम के लिए इसे उचित स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, वजन नियंत्रण और स्वस्थ जीवनशैली के साथ अपनाना ज्यादा प्रभावी हो सकता है।

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