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मनुस्मृति पर प्रहार, शाह बानो पर अधिकारों का संहार- कांग्रेस का महिला सम्मान दोहरा क्यों ? : डॉ. राजेश्वर सिंह

लखनऊ : कांग्रेस के मनुस्मृति और महिला अधिकारों से जुड़े हालिया बयानों पर सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने तीखा हमला बोला है। उन्होंने कांग्रेस पर महिला अधिकारों, समानता और संवैधानिक मूल्यों के मुद्दे पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए उसके राजनीतिक इतिहास पर सवाल उठाए।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि महिला सम्मान, समानता और संवैधानिक अधिकारों की बात करने से पहले कांग्रेस को अपने राजनीतिक इतिहास और उन फैसलों का जवाब देना चाहिए, जिनको लेकर आज भी महिला अधिकारों के संदर्भ में सवाल उठते हैं।

शाह बानो मामले को लेकर कांग्रेस पर सवाल

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि 1985-86 का शाह बानो मामला कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। उनके अनुसार, तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो को गुजारा भत्ता दिए जाने के फैसले के बाद मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया, जिससे उस फैसले का प्रभाव सीमित हुआ।

उन्होंने सवाल उठाया कि महिला अधिकारों के मुद्दे पर राजनीतिक दबाव के सामने कांग्रेस सरकार को पीछे क्यों हटना पड़ा? क्या राजनीतिक हित और वोट बैंक की राजनीति महिला के अधिकारों से ऊपर रखी गई?

तीन तलाक कानून पर भी उठाया सवाल

डॉ. राजेश्वर सिंह ने 2019 के तीन तलाक कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को तत्काल तीन तलाक की प्रथा से कानूनी संरक्षण देने के लिए कानून बनाया।

उन्होंने कांग्रेस के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब तीन तलाक के खिलाफ कानून संसद में लाया गया, तब कांग्रेस ने इसके प्रमुख प्रावधानों का विरोध क्यों किया? यदि महिला सम्मान और अधिकार वास्तव में कांग्रेस की प्राथमिकता हैं, तो मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के सवाल पर उसका रुख अलग क्यों रहा?

समान नागरिक संहिता पर कांग्रेस से जवाब मांगा

सरोजनीनगर विधायक ने संविधान के अनुच्छेद 44 का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य को समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास करने की बात संविधान में कही गई है। उन्होंने सवाल किया कि दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस ने इस दिशा में ठोस पहल क्यों नहीं की।

उन्होंने कहा कि महिलाओं के अधिकारों और समानता की बात करने वाली राजनीतिक पार्टियों के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विषयों पर भी समानता के सिद्धांत को एक समान दृष्टिकोण के साथ लागू करने की बात करें।

हिंदू कानूनों में सुधार और पर्सनल लॉ पर सवाल

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि स्वतंत्र भारत में 1955-56 के दौरान हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में व्यापक सुधार किए गए। इसके साथ उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े सुधारों को लेकर कांग्रेस के रुख पर सवाल उठाया।

उन्होंने कहा कि महिलाओं के अधिकारों और समानता के मामले में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग मानदंड नहीं होने चाहिए। उनके अनुसार, महिला के अधिकार उसकी धार्मिक या सामुदायिक पहचान से तय नहीं होने चाहिए, बल्कि समानता और गरिमा के संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर होने चाहिए।

“मनुस्मृति को लेकर Selective Outrage क्यों?”

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कांग्रेस पर “Selective Outrage” का आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस के नेता मनुस्मृति और हिंदू धार्मिक परंपराओं से जुड़े ग्रंथों में महिलाओं से संबंधित कथित भेदभावपूर्ण प्रावधानों को लेकर सवाल उठाते हैं, लेकिन अन्य धार्मिक या पवित्र ग्रंथों में महिलाओं से जुड़े विवादित प्रावधानों पर समान मुखरता दिखाई नहीं देती।

उन्होंने सवाल किया कि यदि उद्देश्य वास्तव में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना है, तो विरोध और आलोचना का पैमाना धर्म के आधार पर अलग-अलग क्यों होना चाहिए?

“महिला अधिकार राजनीतिक सुविधा का विषय नहीं”

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई केवल भाषणों और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं होनी चाहिए। वास्तविक प्रतिबद्धता का अर्थ है कि हर महिला के अधिकार, सम्मान, गरिमा और समानता के लिए बिना किसी राजनीतिक या वोट बैंक के दबाव के समान रूप से आवाज उठाई जाए।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने तीन तलाक जैसी प्रथा के खिलाफ कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और गरिमा की रक्षा की। महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल राजनीतिक नारे लगाना नहीं, बल्कि प्रत्येक महिला को समान अधिकार, सम्मान और न्याय उपलब्ध कराना है।

“कांग्रेस अपने राजनीतिक इतिहास का आईना देखे”

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि कांग्रेस को मनुस्मृति पर दूसरों को उपदेश देने से पहले शाह बानो से लेकर तीन तलाक तक अपने राजनीतिक इतिहास और महिला अधिकारों के मुद्दे पर अपनाए गए रुख का जवाब देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मनुस्मृति से लेकर समान नागरिक संहिता तक, यदि सिद्धांत समानता है तो उसका पैमाना भी समान होना चाहिए। महिला अधिकार किसी राजनीतिक दल की सुविधा या वोट बैंक की राजनीति का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता, महिला गरिमा और न्याय का विषय हैं।

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