पाकिस्तान की राजनीति में इमरान खान और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच लंबे समय से चला आ रहा टकराव एक बार फिर चर्चा में है। जेल में बंद पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक इमरान खान के करीबी सहयोगी जुल्फिकार बुखारी ने संकेत दिया है कि अगर इमरान जेल से बाहर आते हैं तो वह सेना के साथ सीधा टकराव बढ़ाने के बजाय देश के हित को प्राथमिकता दे सकते हैं।
बुखारी के बयान को पाकिस्तान की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके मुताबिक, इमरान खान रिहाई के बाद ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे जिससे देश की स्थिति और खराब हो। उन्होंने सैन्य नेतृत्व के साथ टकराव से बचने और राजनीतिक तनाव कम करने की जरूरत पर जोर दिया।
क्या इमरान खान ने सेना के सामने रुख नरम किया है?
इसे सीधे तौर पर इमरान खान का ‘सरेंडर’ कहना जल्दबाजी होगी। PTI की ओर से सामने आया संकेत ज्यादा राजनीतिक समझौते और तनाव कम करने की कोशिश की ओर इशारा करता है।
2022 में सत्ता से हटने के बाद से इमरान खान और पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान के संबंध बेहद खराब रहे हैं। 2023 के बाद उनके खिलाफ कई कानूनी मामले दर्ज हुए और उनकी पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं पर भी कार्रवाई हुई।
ऐसे माहौल में अगर PTI अब सेना के साथ सीधी भिड़ंत से बचने की बात कर रही है, तो इसके पीछे राजनीतिक और संगठनात्मक दबाव दोनों हो सकते हैं।
इमरान खान के लिए टकराव कम करना क्यों जरूरी हो सकता है?
1. कानूनी मामलों का दबाव
इमरान खान लंबे समय से जेल में हैं और उनके खिलाफ कई मामलों में कानूनी प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में सैन्य नेतृत्व के साथ सार्वजनिक टकराव को और बढ़ाना उनके लिए राजनीतिक तथा कानूनी मुश्किलें बढ़ा सकता है।
इसलिए बातचीत का रास्ता खोलना PTI के लिए व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।
2. पार्टी संगठन पर लगातार दबाव
इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद PTI को कई स्तरों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। नेताओं की गिरफ्तारियां, मुकदमे और राजनीतिक गतिविधियों पर दबाव ने पार्टी के संगठन को प्रभावित किया है।
ऐसे में सेना के साथ तनाव कम होने से पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए राजनीतिक गतिविधियों की गुंजाइश बढ़ सकती है।
3. देश की आर्थिक स्थिति
पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में राजनीतिक और सैन्य संस्थानों के बीच लगातार संघर्ष देश की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
PTI की ओर से ‘देश पहले’ वाला संदेश इसी राजनीतिक परिस्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है।
4. पर्दे के पीछे बातचीत की संभावना
सार्वजनिक बयान में नरमी आने से दोनों पक्षों के बीच बैकचैनल बातचीत की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।
अगर PTI और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच संवाद शुरू होता है तो इसका इस्तेमाल इमरान खान की रिहाई, पार्टी के राजनीतिक भविष्य और आगामी राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत के लिए किया जा सकता है।
क्या जनरल आसिम मुनीर प्रधानमंत्री जितने ताकतवर हैं?
यह कहना कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख के पास प्रधानमंत्री के बिल्कुल बराबर संवैधानिक शक्तियां हैं, सही नहीं होगा। पाकिस्तान का संविधान प्रधानमंत्री को सरकार का प्रमुख बनाता है, जबकि सेना प्रमुख सैन्य संस्थान का नेतृत्व करते हैं।
हालांकि पाकिस्तान की राजनीति में सेना का प्रभाव लंबे समय से काफी महत्वपूर्ण रहा है। इसी वजह से सेना प्रमुख का वास्तविक राजनीतिक प्रभाव कई बार उनके संवैधानिक पद की सीमाओं से कहीं व्यापक माना जाता है।
सेना का आर्थिक फैसलों में बढ़ता प्रभाव
पाकिस्तान में स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल (SIFC) जैसे संस्थागत तंत्रों के जरिए आर्थिक और निवेश संबंधी मामलों में सैन्य प्रतिष्ठान की भूमिका बढ़ी है।
विदेशी निवेश आकर्षित करने, बड़े आर्थिक प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाने और निवेश से जुड़ी बाधाओं को दूर करने में सेना की भागीदारी ने उसके प्रभाव को आर्थिक क्षेत्र तक पहुंचाया है।
हालांकि इसे प्रधानमंत्री के बराबर औपचारिक संवैधानिक अधिकार के रूप में देखना सही नहीं होगा।
सुरक्षा और खुफिया तंत्र में सेना की बड़ी भूमिका
पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियानों और रणनीतिक मामलों में सेना की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। देश की सुरक्षा व्यवस्था में इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) जैसी संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहती है।
इसी कारण सेना प्रमुख का प्रभाव केवल सैन्य मामलों तक सीमित नहीं माना जाता। सुरक्षा और रणनीतिक नीतियों में उनकी भूमिका पाकिस्तान की राजनीति में भी बड़ा असर डाल सकती है।
विदेश नीति में भी सेना का प्रभाव
पाकिस्तान की विदेश और सुरक्षा नीति में सेना का प्रभाव ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहा है। चीन के साथ रणनीतिक संबंध, CPEC, अमेरिका के साथ रिश्ते तथा सऊदी अरब और खाड़ी देशों के साथ सुरक्षा सहयोग जैसे मामलों में सैन्य नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
इसका एक कारण यह भी है कि पाकिस्तान की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के कई महत्वपूर्ण मुद्दे सीधे सैन्य रणनीति से जुड़े हुए हैं।
सेना और प्रधानमंत्री के बीच असली अंतर क्या है?
पाकिस्तान में प्रधानमंत्री के पास सरकार चलाने, मंत्रिमंडल का नेतृत्व करने और प्रशासनिक नीतियां तय करने की संवैधानिक जिम्मेदारी होती है। दूसरी तरफ सेना प्रमुख का औपचारिक क्षेत्र सैन्य कमान से जुड़ा है।
लेकिन पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में सेना का प्रभाव इतना मजबूत रहा है कि कई मौकों पर सैन्य नेतृत्व ने राजनीतिक फैसलों पर भी निर्णायक असर डाला है।
इसी वजह से इमरान खान और जनरल आसिम मुनीर के बीच संबंधों को केवल प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के सामान्य संस्थागत रिश्ते के रूप में नहीं देखा जाता।
आगे क्या हो सकता है?
PTI की ओर से टकराव कम करने का संकेत अगर वास्तविक राजनीतिक रणनीति में बदलता है, तो पाकिस्तान की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इमरान खान स्वयं अपने करीबी सहयोगी के इस रुख से किस हद तक सहमत हैं। इसलिए फिलहाल इसे संभावित राजनीतिक समझौते की दिशा में एक संकेत के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।
आने वाले समय में यह साफ होगा कि PTI और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच संवाद की कोई वास्तविक शुरुआत होती है या दोनों पक्षों के बीच पुराना टकराव फिर से तेज हो जाता है।


































