रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच अब एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भी तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। जापान को आशंका है कि भविष्य में प्रशांत महासागर में भी ऐसी सैन्य परिस्थितियां बन सकती हैं, जिनका असर पूरे एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा। इसी बीच जापान की ओर से भारत के साथ रणनीतिक और रक्षा सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
जापान के रक्षा मंत्री शिंजीरो के प्रस्तावित भारत दौरे को इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासतौर पर रूस, चीन और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग तथा जापान के इन देशों के साथ अलग-अलग विवादों को देखते हुए भारत की भूमिका अहम हो सकती है।
जापान की चिंता क्यों बढ़ रही है?
जापान ने हाल के वर्षों में अपनी सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव किया है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद टोक्यो को यह चिंता सताने लगी है कि अगर किसी क्षेत्रीय विवाद ने सैन्य संघर्ष का रूप लिया, तो उसका असर जापान और पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर पड़ सकता है।
इसी वजह से जापान ने अपने रक्षा खर्च में भी बढ़ोतरी की है। देश अपनी समुद्री और हवाई सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के साथ-साथ आधुनिक युद्धपोत, ड्रोन और दूसरी सैन्य तकनीक पर निवेश बढ़ा रहा है।
जापान की रणनीति का एक प्रमुख उद्देश्य यह है कि किसी संभावित संकट की स्थिति में वह अपने समुद्री इलाकों और महत्वपूर्ण द्वीपों की सुरक्षा बेहतर तरीके से कर सके।
रूस के साथ तनाव ने बढ़ाई मुश्किल
रूस और जापान के बीच लंबे समय से कुरील द्वीप समूह को लेकर विवाद चला आ रहा है। जापान इन द्वीपों के कुछ हिस्सों पर अपना दावा करता है, जबकि रूस का वहां नियंत्रण है।
रूस की ओर से इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ाए जाने पर जापान कई बार आपत्ति दर्ज करा चुका है। यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों के संबंधों में और तनाव आया है।
ऐसे माहौल में जापान के लिए भारत महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि नई दिल्ली और मॉस्को के बीच दशकों पुराने संबंध हैं। भारत रूस के साथ संवाद बनाए रखने में सक्षम है और दोनों देशों के बीच रक्षा तथा ऊर्जा क्षेत्र में भी लंबे समय से सहयोग रहा है।
चीन भी जापान की बड़ी चिंता
जापान की सुरक्षा चिंताओं का दूसरा बड़ा कारण चीन है। दोनों देशों के बीच पूर्वी चीन सागर में स्थित सेनकाकू द्वीपों को लेकर विवाद है।
चीन इन द्वीपों को दियाओयू द्वीप कहता है, जबकि जापान इन्हें सेनकाकू द्वीप समूह के रूप में अपना क्षेत्र मानता है। दोनों देशों के बीच समुद्री और हवाई गतिविधियों को लेकर समय-समय पर तनाव देखने को मिलता है।
इसके अलावा चीन और रूस के बीच बढ़ता सैन्य सहयोग भी जापान के लिए चिंता का विषय है। दोनों देश प्रशांत क्षेत्र में संयुक्त सैन्य अभ्यास कर चुके हैं।
उत्तर कोरिया से भी खतरा
जापान के सामने एक और चुनौती उत्तर कोरिया की मिसाइल और परमाणु क्षमता है। उत्तर कोरिया लगातार मिसाइल परीक्षण करता रहा है और इनमें से कुछ मिसाइलें जापान के आसपास के समुद्री क्षेत्र में गिरी हैं।
उत्तर कोरिया के रूस के साथ भी संबंध पिछले कुछ समय में काफी मजबूत हुए हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस और उत्तर कोरिया के बीच सैन्य सहयोग बढ़ने की खबरें सामने आई हैं।
इस स्थिति में जापान को लगता है कि उसे अपनी सुरक्षा रणनीति को केवल अमेरिका पर निर्भर रखने के बजाय दूसरे भरोसेमंद साझेदारों के साथ भी मजबूत करना चाहिए।
ऐसे में भारत क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत की भूमिका कई वजहों से अहम हो जाती है।
पहली वजह रूस से संबंध: भारत और रूस के बीच लंबे समय से रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में भारत मॉस्को के साथ संवाद बनाए रखने की क्षमता रखता है।
दूसरी वजह चीन: भारत खुद चीन के साथ सीमा विवाद का सामना कर रहा है। दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव के बावजूद आर्थिक और कूटनीतिक संवाद जारी है।
तीसरी वजह जापान से रक्षा सहयोग: भारत और जापान के बीच रक्षा संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। दोनों देशों की सेनाएं संयुक्त सैन्य अभ्यास करती हैं और नौसेनाएं बहुपक्षीय अभ्यासों में भी हिस्सा लेती हैं।
भारत-जापान की बढ़ती सैन्य साझेदारी
भारत और जापान के बीच धर्म गार्जियन जैसे सैन्य अभ्यास होते हैं। दोनों देशों की नौसेनाएं अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ मालाबार अभ्यास में भी भाग लेती हैं।
इससे चार देशों—भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया—के बीच इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग मजबूत हुआ है।
जापान के लिए भारत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत हिंद महासागर और प्रशांत क्षेत्र के बीच एक रणनीतिक स्थिति में मौजूद है।
जापान के रक्षा मंत्री की भारत यात्रा क्यों अहम?
जापानी रक्षा मंत्री का प्रस्तावित भारत दौरा ऐसे समय हो रहा है जब एशिया में कई बड़े शक्ति समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।
एक तरफ रूस और चीन के बीच सहयोग बढ़ रहा है। दूसरी तरफ उत्तर कोरिया रूस के करीब आता दिखाई दे रहा है। जापान चीन और रूस दोनों के साथ अलग-अलग विवादों में उलझा हुआ है।
ऐसे समय में भारत के साथ रक्षा और रणनीतिक सहयोग बढ़ाना जापान की व्यापक इंडो-पैसिफिक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
क्या सच में यूक्रेन जैसी जंग शुरू होने वाली है?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि प्रशांत क्षेत्र में यूक्रेन जैसी कोई बड़ी जंग निश्चित रूप से होने वाली है। जापान की सुरक्षा तैयारियां और दूसरे देशों के साथ रक्षा सहयोग को सीधे युद्ध की शुरुआत का संकेत मानना सही नहीं होगा।
दरअसल, देशों की कोशिश अक्सर संभावित संघर्ष को रोकने के लिए अपनी निरोधक क्षमता (deterrence) मजबूत करने की होती है।
यही वजह है कि जापान भारत जैसे देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है। अगर भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश आपसी रणनीतिक सहयोग बढ़ाते हैं, तो इसका उद्देश्य केवल सैन्य टकराव की तैयारी नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखना भी हो सकता है।
कुल मिलाकर, जापान के लिए भारत अब केवल एक आर्थिक साझेदार नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक की बदलती भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी बन चुका है। रूस, चीन और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ते सहयोग के बीच आने वाले समय में भारत-जापान रक्षा साझेदारी और ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।


































