
लखनऊ, 6 जुलाई 2026 : उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय को देश का सबसे प्रतिष्ठित परफॉर्मिंग आर्ट्स एवं संस्कृति विश्वविद्यालय बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सरकार का लक्ष्य ऐसा विश्वस्तरीय सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक परिसर विकसित करना है, जहां संगीत, नृत्य, रंगमंच, लोक कलाएं, भारतीय ज्ञान परंपरा, शोध और आधुनिक रचनात्मक विषयों का समावेश हो तथा उत्तर प्रदेश सांस्कृतिक शिक्षा और कलात्मक उत्कृष्टता का राष्ट्रीय केंद्र बनकर उभरे।

इस महत्वाकांक्षी रोडमैप पर सोमवार को लखनऊ में पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात की अध्यक्षता में आयोजित सलाहकार समिति की बैठक में विस्तृत चर्चा हुई। बैठक में देश के प्रतिष्ठित संगीतज्ञों, नृत्यांगनाओं, रंगकर्मियों, वास्तु विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने भाग लिया तथा पंडित विष्णु नारायण भातखंडे की विरासत को केंद्र में रखते हुए विश्वविद्यालय के दीर्घकालिक विकास पर मंथन किया।
AI म्यूजिक लैब से लेकर डिजिटल सांस्कृतिक संग्रहालय तक की तैयारी
प्रस्तावित योजना के तहत काकराबाद परिसर को बहु-विषयक सांस्कृतिक कैंपस के रूप में विकसित किया जाएगा, जहां संगीत, नृत्य, रंगमंच, दृश्य कला, फिल्म, योग, अध्यात्म और भारतीय ज्ञान परंपरा के अलग-अलग स्कूल स्थापित होंगे। वहीं ऐतिहासिक कैसरबाग परिसर को सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और आयोजनों का जीवंत केंद्र बनाया जाएगा।
योजना में भारत की पहली AI म्यूजिक लैब, म्यूजियम ऑफ इंडियन परफॉर्मिंग आर्ट्स, सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स एंड हेल्थ, राष्ट्रीय डिजिटल रिपॉजिटरी, पांडुलिपि संरक्षण केंद्र, ओरल हिस्ट्री आर्काइव, सांस्कृतिक स्टार्टअप इनक्यूबेशन सेंटर, 1500 सीटों वाला विष्णु नारायण भातखंडे ग्रैंड ऑडिटोरियम, ब्लैक बॉक्स थिएटर और ओपन एयर एम्फीथिएटर जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं विकसित करने पर विचार किया गया।
अमृत अभिजात बोले- दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों की बराबरी करेगा भातखंडे

बैठक को संबोधित करते हुए अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात ने कहा कि उत्तर प्रदेश के पास ऐसा संस्थान विकसित करने का अवसर है, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत को भविष्य की आवश्यकताओं से जोड़े।
उन्होंने कहा कि भातखंडे को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मिंग आर्ट्स संस्थानों के समकक्ष स्थापित करना सरकार का लक्ष्य है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर की वास्तु डिजाइन प्रतियोगिता भी आयोजित की जाएगी, ताकि देश के श्रेष्ठ विशेषज्ञ इस परियोजना में अपना योगदान दे सकें।
परंपरा और तकनीक के समन्वय पर जोर
पूर्व राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय निदेशक एवं पद्मश्री प्रो. वामन केंद्रे ने डिजिटल आर्ट, एनीमेशन, डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण और वर्चुअल प्रोडक्शन जैसे आधुनिक विषयों को पारंपरिक कलाओं के साथ जोड़ने का सुझाव दिया। उन्होंने कलाकारों और शोधकर्ताओं के लिए सहयोगात्मक नवाचार केंद्र विकसित करने की आवश्यकता भी बताई।
भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ेगा वैश्विक दृष्टिकोण
प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने सुझाव दिया कि संगीत विश्वविद्यालय से संस्कृति विश्वविद्यालय बनने की अवधारणा पाठ्यक्रम और वैश्विक दृष्टिकोण में भी दिखाई देनी चाहिए। उन्होंने बौद्ध सांस्कृतिक दर्शन और भारतीय ज्ञान प्रणाली जैसे पाठ्यक्रम शुरू करने की वकालत की, जिससे विदेशी छात्रों को भी आकर्षित किया जा सके।
जीवंत सांस्कृतिक अनुभव बनेगा पूरा परिसर
प्रो. श्रुति बंद्योपाध्याय ने दुर्लभ वाद्ययंत्रों, पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करने के लिए सेंटर फॉर मेमोरीज़ स्थापित करने का सुझाव दिया।
लोकगायिका एवं पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित प्राकृतिक वातावरण वाले परिसर की कल्पना प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारतीय संगीत का प्रकृति से गहरा संबंध है और खुले आंगन, छायादार गलियारे तथा प्राकृतिक वातावरण छात्रों की सृजनात्मकता को नई ऊर्जा देंगे।
पद्मश्री डॉ. शोभना नारायण ने कहा कि विश्वविद्यालय केवल शिक्षण संस्थान नहीं बल्कि जीवंत सांस्कृतिक केंद्र होना चाहिए, जहां नियमित प्रस्तुतियां, कार्यशालाएं, व्याख्यान और कलाकारों के साथ संवाद होते रहें।
वास्तु विशेषज्ञ डॉ. वंदना सहगल ने परिसर को इंटरएक्टिव सार्वजनिक स्थलों, प्रदर्शन प्रांगणों और सहयोगात्मक शिक्षण वातावरण के साथ विकसित करने का सुझाव दिया।
वैश्विक पहचान दिलाने की तैयारी
बैठक में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, कलाकार रेजिडेंसी, अंतर्विषयक शोध, सांस्कृतिक पर्यटन, परफॉर्मिंग आर्ट्स आधारित वेलनेस तथा आधुनिक विश्वविद्यालय व्यवस्था में गुरु-शिष्य परंपरा को मजबूत करने पर भी विस्तार से चर्चा हुई। उद्देश्य भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय को ऐसा वैश्विक संस्थान बनाना है, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करते हुए भविष्य की पीढ़ियों को नई दिशा प्रदान करे।
बैठक के अंत में कुलपति प्रो. मांडवी सिंह ने सभी विशेषज्ञों का आभार व्यक्त करते हुए इसे विश्वविद्यालय के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बताया।


































