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500 किलोमीटर दूर से आई पुकार, एक फोन कॉल और फरिश्ता बन गया इंस्पेक्टर का बेटा: उत्तर प्रदेश पुलिस के एक परिवार ने पेश की मानवता की मिसाल, रक्तदान कर बचाई जान

लखनऊ/बलिया। कहते हैं कि इंसानियत की कोई सीमा नहीं होती और न ही रिश्तों की कोई शर्त। जब किसी की जिंदगी बचाने का सवाल हो तो अनजान लोग भी अपनों से बढ़कर साथ खड़े हो जाते हैं। ऐसी ही एक भावुक और प्रेरणादायक कहानी उत्तर प्रदेश के बलिया और लखनऊ के बीच सामने आई है, जहां 500 किलोमीटर दूर से आई एक मदद की पुकार पर उत्तर प्रदेश पुलिस में तैनात इंस्पेक्टर के परिवार ने ऐसा उदाहरण पेश किया, जो समाज के लिए प्रेरणा बन गया।

बलिया जिले के बंकवा गांव निवासी अजीत कुमार पटेल अपनी मां बेबी देवी को गंभीर हार्ट स्ट्रोक आने के बाद उपचार के लिए लगभग 500 किलोमीटर दूर लखनऊ स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान लेकर पहुंचे। जांच के दौरान चिकित्सकों ने बताया कि उनकी जान बचाने के लिए हृदय में वाल्व प्रत्यारोपण (हार्ट वाल्व सर्जरी) आवश्यक है। लेकिन ऑपरेशन से पहले तत्काल रक्त की जरूरत थी। घर से इतनी दूर न कोई रिश्तेदार था और न कोई परिचित। अस्पताल के बाहर खड़े अजीत कुमार के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि आखिर रक्त की व्यवस्था कैसे हो।

इसी दौरान उन्हें अपने गांव के निवासी, पत्रकार एवं पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री के मीडिया सलाहकार अभिषेक सिंह की याद आई। उन्होंने तुरंत उन्हें फोन कर पूरी स्थिति बताई। मामला गंभीर था, इसलिए अभिषेक सिंह ने बिना देर किए अपने पत्रकार साथियों से मदद की अपील शुरू कर दी।

कुछ ही समय बाद लखनऊ में ही कार्यरत एक पत्रकार साथी शिवसागर सिंह चौहान के माध्यम से वर्तमान समय में बलिया जनपद में ही तैनात इंस्पेक्टर संजय शुक्ला तक बात पहुंची। उस समय वह बलिया में अपनी ड्यूटी निभा रहे थे। जैसे ही उन्हें पता चला कि बलिया जिले का ही एक परिवार लखनऊ में रक्त के अभाव में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है, उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपने 20 वर्षीय पुत्र रूद्रेश शुक्ला को रक्तदान के लिए हॉस्पिटल भेज दिया।

रूद्रेश शुक्ला अस्पताल पहुंचे और तुरंत रक्तदान किया। रक्त मिलते ही ऑपरेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ सकी और अजीत कुमार के परिवार के चेहरे पर राहत लौट आई। जिस परिवार के लिए कुछ देर पहले हर रास्ता बंद दिखाई दे रहा था, उसके लिए एक अनजान परिवार देवदूत बनकर सामने आ गया।

रक्तदान इस परिवार की परंपरा बन चुका है

यह घटना केवल एक बार की मदद नहीं, बल्कि वर्षों से निभाए जा रहे मानव सेवा के संकल्प का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश पुलिस के वर्ष 2001 बैच के उपनिरीक्षक (इंस्पेक्टर) संजय शुक्ला अब तक 15 बार स्वेच्छा से रक्तदान कर चुके हैं। उनकी पत्नी विनीत शुक्ला 14 बार रक्तदान कर चुकी हैं। वहीं, महज 20 वर्षीय पुत्र रूद्रेश शुक्ला ने बीटेक (कंप्यूटर साइंस) के तीसरे वर्ष का छात्र होने के बावजूद पांचवीं बार रक्तदान कर किसी जरूरतमंद की जिंदगी बचाने में योगदान दिया।

परिवार का कहना है कि रक्तदान उनके लिए केवल सामाजिक दायित्व नहीं बल्कि मानवता की सेवा है।

माता-पिता बने प्रेरणा, बेटे ने बनाया जीवन का संकल्प

संजय शुक्ला बताते हैं कि शुरुआत उन्होंने स्वयं रक्तदान से की। उनके इस कार्य से प्रेरित होकर उनकी पत्नी विनीत शुक्ला ने भी नियमित रक्तदान शुरू किया। बचपन से माता-पिता को लोगों की जान बचाते देखकर रूद्रेश ने भी संकल्प लिया कि वह भी बड़ा होकर इसी सेवा को आगे बढ़ाएगा।

आज पूरा परिवार रक्तदान को एक संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में निभा रहा है।

“बस मन में सेवा का भाव होना चाहिए”

इंस्पेक्टर संजय शुक्ला कहते हैं,

“रक्तदान के लिए किसी विशेष शक्ति या असाधारण क्षमता की जरूरत नहीं होती। केवल मन में सेवा का भाव होना चाहिए। यदि व्यक्ति स्वस्थ खान-पान अपनाए, नियमित योग और व्यायाम करे तो वह बार-बार भी सुरक्षित तरीके से रक्तदान कर सकता है। किसी जरूरतमंद की जिंदगी बचाने से बड़ा कोई संतोष नहीं होता।”

कर्तव्य के साथ मानवता की भी मिसाल

48 वर्षीय संजय शुक्ला उत्तर प्रदेश पुलिस में वर्ष 2001 बैच के अधिकारी हैं। अपने सेवा काल में उन्होंने सिद्धार्थनगर, बस्ती, बहराइच, लखनऊ में सर्विलांस, स्वाट प्रभारी तथा विभूतिखंड थाना प्रभारी जैसे महत्वपूर्ण दायित्व निभाए हैं। वर्तमान में उनकी तैनाती बलिया में है। उनका गृह जनपद गोरखपुर है। उनके पिता सुरेंद्रनाथ शुक्ला का गोलोकगमन हो चुका है।

पुलिस की वर्दी पहनकर कानून व्यवस्था संभालने के साथ-साथ उनका पूरा परिवार समाज में मानवता और सेवा का संदेश भी लगातार दे रहा है।

समाज के लिए एक प्रेरणा

आज जब अक्सर समाज में नकारात्मक खबरें सुर्खियां बनती हैं, ऐसे समय में संजय शुक्ला, उनकी पत्नी विनीत शुक्ला और पुत्र रूद्रेश शुक्ला का यह परिवार उम्मीद की एक नई रोशनी बनकर सामने आया है। यह घटना बताती है कि इंसानियत आज भी जिंदा है और कई बार एक फोन कॉल, कुछ मिनट का रक्तदान और निस्वार्थ सेवा किसी परिवार के लिए पूरी जिंदगी बदल सकती है।

रक्तदान केवल रक्त देना नहीं, बल्कि किसी मां, किसी पिता, किसी बेटे या किसी बेटी को नया जीवन देने का माध्यम है। यदि समाज का हर स्वस्थ व्यक्ति इसी भावना के साथ आगे आए तो देश में रक्त की कमी से किसी मरीज की जान नहीं जाएगी।

ऐसे परिवार वास्तव में समाज के लिए प्रेरणा हैं, जो सेवा को केवल शब्दों में नहीं बल्कि अपने जीवन के संस्कारों में उतार चुके हैं।

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