मध्य एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच पाकिस्तान की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनातनी के बीच पाकिस्तान एक तरफ मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश करता दिखा, लेकिन दूसरी ओर अफगानिस्तान में उसकी सैन्य कार्रवाई ने नई बहस छेड़ दी है।
बताया जा रहा है कि इस्लामाबाद में बातचीत का पहला दौर विफल रहने और ईरान द्वारा सीधे संवाद से इनकार करने के बाद पाकिस्तान की कूटनीतिक कोशिशों को झटका लगा। ऐसे में अब यह माना जा रहा है कि पाकिस्तान इस जटिल स्थिति से खुद को बाहर निकालने के लिए नए रास्ते तलाश रहा है।
अफगानिस्तान पर हमले क्यों?
हाल के दिनों में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के कई इलाकों में हमले किए, जिनमें नागरिक ठिकाने और शैक्षणिक संस्थान भी प्रभावित हुए। इन हमलों के समय को लेकर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि एक ओर पाकिस्तान शांति की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सैन्य कार्रवाई कर रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह कदम क्षेत्रीय समीकरणों से जुड़ा हो सकता है। यदि ईरान-अमेरिका संघर्ष बढ़ता है और इसमें सऊदी अरब जैसे देश शामिल होते हैं, तो पाकिस्तान पर भी अपने सहयोगियों का साथ देने का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में वह सीधे टकराव से बचने के लिए अलग मोर्चों पर सक्रिय दिख रहा है।
आंतरिक और बाहरी दबाव
पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को पनाह देने का आरोप लगाता रहा है। हालिया हमलों को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
इसके अलावा, पाकिस्तान की अपनी आंतरिक स्थिति भी जटिल है। देश में शिया आबादी की बड़ी संख्या को देखते हुए ईरान के खिलाफ खुलकर किसी सैन्य कार्रवाई का असर घरेलू स्तर पर भी पड़ सकता है।
क्षेत्रीय तनाव और भविष्य की आशंका
रिपोर्ट्स के अनुसार, अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में हुए हमलों में नागरिकों को नुकसान पहुंचा है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया है।
कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में पाकिस्तान एक कठिन कूटनीतिक और सैन्य संतुलन साधने की कोशिश में है। लेकिन उसकी हालिया कार्रवाइयों ने यह साफ कर दिया है कि क्षेत्र में स्थिति तेजी से जटिल होती जा रही है और इसका असर पूरे इलाके की स्थिरता पर पड़ सकता है।


































