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बसंत पंचमी से महावीर जयंती तक चलेगा एनयूजे का प्रदेशव्यापी सदस्यता अभियान: लखनऊ बैठक में लिए गए कई अहम फैसले, मार्च के अंत में होली मिलन संग प्रांतीय महाधिवेशन

  • एनयूजे उत्तर प्रदेश व लखनऊ इकाई की संयुक्त बैठक गोमतीनगर, लखनऊ में संपन्न हुई।
  • बैठक में 23 जनवरी से 31 मार्च तक प्रदेशव्यापी सदस्यता अभियान चलाने का निर्णय लिया गया।
  • मार्च के अंत में लखनऊ में होली मिलन समारोह के साथ प्रांतीय महाधिवेशन आयोजित होगा।
  • सदस्यता अभियान को प्रभावी बनाने के लिए मंडलवार प्रभारी नियुक्त करने के निर्देश दिए गए।
  • संगठन विस्तार के जरिए एनयूजे उत्तर प्रदेश इकाई को नई मजबूती देने पर जोर दिया गया।

लखनऊ: नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (एनयूजे) उत्तर प्रदेश एवं लखनऊ इकाई की संयुक्त बैठक गुरुवार को गोमतीनगर, लखनऊ में आयोजित की गई, जिसमें संगठन को सशक्त बनाने की दिशा में कई महत्वपूर्ण और बड़े निर्णय लिए गए। बैठक में प्रदेशव्यापी सदस्यता अभियान, प्रांतीय महाधिवेशन और होली मिलन समारोह को लेकर विस्तृत चर्चा हुई।

बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि 23 जनवरी (बसंत पंचमी) से 31 मार्च (महावीर जयंती) तक पूरे प्रदेश में सदस्यता अभियान चलाया जाएगा। इसके साथ ही मार्च माह के अंत में राजधानी लखनऊ में होली मिलन समारोह के साथ प्रांतीय महाधिवेशन का आयोजन किया जाएगा।

संगठन विस्तार पर विशेष जोर

कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष के. बख्श सिंह ने सदस्यता अभियान को प्रभावी बनाने के लिए मंडलवार प्रभारी नामित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि संगठन की मजबूती के लिए सदस्य संख्या में तेजी से बढ़ोतरी आवश्यक है, जिसके लिए सभी जनपदों को सामूहिक प्रयास करने होंगे, उन्होंने प्रत्येक जिलाध्यक्ष से 20 नए सदस्य, उपाध्यक्ष, मंत्री एवं अन्य पदाधिकारियों से 10-10 सदस्य, जबकि कार्यकारिणी सदस्यों से 5-5 नए सदस्य जोड़ने का आह्वान किया।

प्रदेश प्रवक्ता डॉ. अतुल मोहन सिंह के प्रस्ताव पर कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष के. बख्श सिंह ने मार्च के अंत में होली मिलन समारोह के साथ प्रदेश स्तरीय महाधिवेशन आयोजित करने की घोषणा की।इस अवसर पर संरक्षक अजय कुमार ने आयोजन समिति के शीघ्र गठन पर जोर देते हुए कहा कि महाधिवेशन की तैयारियां तुरंत शुरू की जाएं। उन्होंने आयोजन व्यवस्था में हर संभव सहयोग का भरोसा भी दिलाया।

एनयूजे उत्तर प्रदेश इकाई रचेगी नया इतिहास

बैठक में लिए गए फैसलों को ऐतिहासिक बताते हुए कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष के. बख्श सिंह ने कहा कि 23 जनवरी से 31 मार्च तक चलने वाला व्यापक सदस्यता अभियान और प्रांतीय महाधिवेशन एनयूजे उत्तर प्रदेश इकाई को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा।उन्होंने कहा कि संगठनात्मक विस्तार और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से एनयूजे उत्तर प्रदेश इकाई एक बार फिर नया इतिहास रचने जा रही है।

बैठक में ये पदाधिकारी रहे मौजूद

बैठक में संरक्षक अजय कुमार, कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष के. बख्श सिंह, प्रदेश कोषाध्यक्ष अनुपम चौहान, प्रदेश प्रवक्ता डॉ. अतुल मोहन सिंह, कार्यकारिणी सदस्य एस.वी. सिंह ‘उजागर’, अरुण शर्मा ‘टीटू’ के साथ लखनऊ इकाई से जिलाध्यक्ष मीनाक्षी वर्मा, महामंत्री श्यामल त्रिपाठी, संगठन मंत्री अनिल सिंह, कोषाध्यक्ष अभिनव श्रीवास्तव, प्रवक्ता शिव सागर सिंह चौहान, आलोक श्रीवास्तव, किरण सिंह, पवन विश्वकर्मा, रोनॉल्ड डिसूजा, संतोष पटवा, शिवम भार्गव सहित अन्य पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे।

Early Signs Of Prostate Cancer:“पुरुषों के लिए ‘साइलेंट किलर’ साबित हो सकता है यह कैंसर, बिना लक्षण देता है दस्तक- 50 के बाद खतरा सबसे ज्यादा”

 प्रोस्टेट कैंसर पुरुषों में होने वाला एक ऐसा कैंसर है, जो प्रोस्टेट ग्रंथि में शुरू होता है. प्रोस्टेट एक छोटी-सी ग्रंथि होती है, जो स्पर्म बनाने में मदद करती है. इस बीमारी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआती दौर में इसके लक्षण अक्सर नजर नहीं आते. कई पुरुषों को शुरुआत में कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती, क्योंकि शुरुआती प्रोस्टेट कैंसर चुपचाप बढ़ता रहता है. कई बार यह बीमारी सालों तक धीरे-धीरे बढ़ती रहती है और तब जाकर सामने आती है, जब यह काफी आगे बढ़ चुकी होती है. यही वजह है कि यह कैंसर लोगों को बिना चेतावनी दिए पकड़ लेता है.

भारत में गंभीर समस्या

भारत में प्रोस्टेट कैंसर पुरुषों में होने वाले कैंसरों में तीसरे स्थान पर है. इससे पहले लंग्स और मुंह का कैंसर आता है. दुनियाभर में हर साल करीब 15 लाख नए मामले सामने आते हैं और बढ़ती उम्र के साथ इसके मामलों में लगातार इजाफा होने की आशंका है. इंडियन जर्नल ऑफ यूरोलॉजी में 2024 में आई एक स्टडी के मुताबिक, प्रोस्टेट कैंसर के मामले 50 साल की उम्र के बाद तेजी से बढ़ने लगते हैं और 64 साल के बाद इनमें और तेजी देखी जाती है. चिंता की बात यह है कि करीब 43 प्रतिशत मामलों में कैंसर का पता तब चलता है, जब वह शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल चुका होता है.

भारत में अवेयरनेस की कमी

इतनी आम बीमारी होने के बावजूद भारत में प्रोस्टेट कैंसर को लेकर जागरूकता काफी कम है. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य लगते हैं. रात में बार-बार यूरिन आना या यूरिन की धार कमजोर होना जैसी समस्याओं को ज्यादातर पुरुष बढ़ती उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं या इसे प्रोस्टेट बढ़ने की आम समस्या समझ लेते हैं. लक्षण इतने हल्के होते हैं कि लोग यह सोचते ही नहीं कि डॉक्टर को दिखाने की जरूरत है.

शुरुआत में नहीं दिखते हैं लक्षण

मायो क्लिनिक के मुताबिक, प्रोस्टेट कैंसर के शुरुआती चरण में अक्सर कोई लक्षण नहीं होते. हालांकि, कुछ संकेत ऐसे हो सकते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इनमें यूरिन में खून आना, जिससे यूरिन का रंग गुलाबी या लाल दिख सकता है, स्पर्म में खून आना, बार-बार यूरिन लगना, यूरिन शुरू करने में दिक्कत और रात में बार-बार यूरिन के लिए उठना शामिल है. अगर कैंसर आगे बढ़ जाए, तो यूरिन का रिसाव, पीठ या हड्डियों में दर्द, इरेक्शन में दिक्कत, अत्यधिक थकान, बिना वजह वजन कम होना और हाथ-पैरों में कमजोरी जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं.

कैसे होते हैं इसके लक्षण?

सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. अरुण कुमार गोयल ने TOI को बताया कि उम्र बढ़ने के साथ कई पुरुषों में बेनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया की समस्या हो जाती है. इसके लक्षणों में यूरिन की धार कमजोर होना, ब्लैडर पूरी तरह खाली न होना और रात में दो बार से ज्यादा यूरिन के लिए उठना शामिल है. बीपीएच के लक्षण आमतौर पर धीरे-धीरे बढ़ते हैं, जबकि प्रोस्टेट कैंसर में लक्षण तेजी से बढ़ सकते हैं और इसके साथ यूरिन या स्पर्म में खून, लगातार हड्डियों या पीठ में दर्द और अचानक वजन कम होना जैसे संकेत दिखाई दे सकते हैं.

डॉक्टरों के मुताबिक, आमतौर पर 50 साल की उम्र के बाद प्रोस्टेट कैंसर की नियमित जांच शुरू की जाती है. जिन पुरुषों के परिवार में पहले किसी को प्रोस्टेट कैंसर रहा हो, उन्हें 40 से 45 साल की उम्र से ही पीएसए टेस्ट और डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन कराना चाहिए. समय पर जांच और लक्षणों को गंभीरता से लेने से प्रोस्टेट कैंसर को शुरुआती स्टेज में पकड़ा जा सकता है, जहां इलाज के सफल होने की संभावना काफी ज्यादा होती है.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

“ग्रीनलैंड मुद्दे पर ट्रंप का फिर कड़ा रुख, ‘कब्जे में रोड़ा डाला तो…’, दावोस से दी सीधी चेतावनी- किस पर साधा निशाना? ”

दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम को संबोधित करते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोप को आड़े हाथों लिया. उन्होंने कहा कि यूरोप सही दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा है, हालांकि वे यूरोपीय देशों से प्यार करते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि नाटो अमेरिका को ग्रीनलैंड सौंप दे. ट्रंप ने कहा कि वह ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए बल का प्रयोग नहीं करेंगे.

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप ने नाटो को चेताया

ट्रंप ने दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड को बर्फ का एक टुकड़ा बताया. उन्होंने ने कहा, ‘हम बस इतना ही मांग रहे हैं कि हमें ग्रीनलैंड मिल जाए, जिसमें स्वामित्व और मालिकाना हक भी शामिल हो. इसकी रक्षा के लिए स्वामित्व बहुत जरूरी है क्योंकि पट्टे पर रखकर इसकी रक्षा नहीं की जा सकती.’ ट्रंप ने नाटो को चेतावनी दिया, अगर आप ग्रीनलैंड पर कब्जा करने में अमेरिका का साथ देंगे तो हम आपके आभारी रहेंगे. अगर साथ नहीं दिया तो हम इसे याद रखेंगे.’

नाटो ने अमेरिका के साथ अच्छा नहीं किया: ट्रंप

ट्रंप ने कहा, ‘कौन भला ऐसे लाइसेंस समझौते या पट्टे की रक्षा करना चाहेगा, जो समुद्र के बीचोंबीच बर्फ का एक बड़ा टुकड़ा है. यहां जहां अगर युद्ध होता है तो अधिकांश कार्रवाई उसी बर्फ के टुकड़े पर होगी. मिसाइलें ठीक उसी बर्फ के टुकड़े के ऊपर से गुजरेंगी.’ ट्रंप ने यह भी तर्क दिया कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण से नाटो गठबंधन मजबूत होगा. उन्होंने कहा, ‘यह नाटो के लिए कोई खतरा नहीं है. इससे पूरे नाटो गठबंधन की सुरक्षा और मजबूत होगी. नाटो ने अमेरिका के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया.’

यूरोपीयन यूनियन को अमेरिका से सीखना चाहिए: ट्रंप

ट्रंप ने कहा, ‘यूरोपीयन यूनियन को अमेरिका की सरकार से सीखना चाहिए. मैं ग्रीनलैंड और डेनमार्क के लोगों का सम्मान करता हूं. दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब हमने ग्रीनलैंड को बचाया और डेनमार्क को सौंप दिया, तब हम एक शक्तिशाली थे, लेकिन अब हम उससे कहीं अधिक शक्तिशाली हैं. हमने खूबसूरत डेनमार्क के लिए लड़ाई लड़ी, जो कि जमीन नहीं, बल्कि बर्फ का एक बड़ा टुकड़ा है, इसे वापस देना हमारी मूर्खता थी.’

सही रास्ते पर नहीं चल रहा यूरोप: ट्रंप

ट्रंप ने कहा, ‘ग्रीनलैंड अमेरिका, रूस और चीन के बीच एक महत्वपूर्ण सामरिक लोकेशन है. इस पर अमेरिका का कब्जा होने से समूचे नाटो की सुरक्षा बढ़ेगी. हमें इसकी आवश्यकता रणनीतिक कारणों से है, न कि दुर्लभ खनिजों के लिए.’ उन्होने कहा, ‘यूरोप में कुछ स्थान तो पहचाने जाने लायक भी नहीं हैं. मुझे यूरोप से प्यार है, लेकिन यह सही रास्ते पर नहीं चल रहा है. यूरोप को उसकी इमिग्रेशन और आर्थिक नीतियों से काफी नुकसान हुआ है. इसके उलट अमेरिका में बड़े बदलाव हुए हैं.’

पेरिस में G7 मीटिंग और डिनर… ग्रीनलैंड को लेकर मैक्रों ने ट्रंप को दो ऑफर दिए, अब हुआ खुलासा

ग्रीनलैंड से जुड़े विवाद पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बातचीत हुई. ट्रंप ने इमैनुएल मैक्रों के टेक्स्ट मैसेज का स्क्रीनशॉट को सार्वजनिक कर दिया. इसमें मैक्रों ने सीरिया और ईरान को लेकर की गई अमेरिकी कोशिशों की सराहना करते हुए ग्रीनलैंड पर मिलकर बात करने की बात कही थी.

इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप को प्राइवेट मैसेज भेजने में सावधानी बरतें, नहीं तो फिर आपके बारे में बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाएगा. मैक्रों ने कहा कि उन्हें ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की रणनीति समझ नहीं आ रही है, जिसे ट्रंप किसी भी कीमत पर हथियाने की धमकी दे रहे हैं. चैट में मैक्रों ने 2 प्रस्ताव रखे. पहला- गुरुवार (22 जनवरी 2026) पेरिस में G7 की मीटिंग रखी जाए, जिसमें मैं यूक्रेन, डेनमार्क, सीरिया और रूस को भी बातचीत के लिए राजी कर सकता हूं. दूसरा- आपके अमेरिका वापस जाने से पहले 22 जनवरी को पेरिस में साथ में डिनर करते हैं.

मैक्रों ने चैट में लिखा ‘मेरे दोस्त’

फ्रांस के राष्ट्रपति सार्वजनिक रूप से डोनाल्ड ट्रंप को कई बार अपना दोस्त बता चुके हैं. दोनों नेताओं के बीच कुछ बैठकें अच्छी भी रहीं. हालांकि दोनों नेताओं ने बीते कुछ दिनों में एक-दूसरे पर निशाना साधा है. खासकर ट्रंप ने राजनयिक प्रयासों और एनर्जी के मुद्दे को लेकर फ्रांस पर निशाना साधा. सोमवार (19 जनवरी 2026) को फ्रांस ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के प्रस्तावित गाजा ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने से इनकार कर दिया. इस पर ट्रंप ने कहा, ‘कोई भी उन्हें नहीं चाहता क्योंकि वे बहुत जल्द पद से हट जाएंगे.’ फिर उन्होंने फ्रांसीसी वाइन और शैम्पेन पर 200 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी दी.

मैक्रों के सीरिया मुद्दे पर सहमत होने का मतलब

सीरिया डोनाल्ड ट्रंप और इमैनुएल मैक्रों के बीच सहमति का क्षेत्र है. दोनों नेता अल-कायदा के पूर्व सदस्य अहमद अल-शारा को सीरिया के नेता के रूप में समर्थन देते हैं. ट्रंप और मैक्रों दोनों ही नेता सीरिया को प्रमुखता देते हैं क्योंकि अपने मतभेदों को छिपाने का ये उनके पास सबसे बेहतर तरीका है. यूरोप में दक्षिणपंथी आंदोलनों के लिए वाशिंगटन का समर्थन, इजरायल-गाजा युद्ध, जलवायु परिवर्तन और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को इसके उदाहरण के रूप में समझा जा सकता है.

हम ईरान के मामले में बहुत कुछ कर सकते हैं: मैक्रों

ये एक ऐसा मुद्दा है जिस पर फ्रांस और अमेरिका बहुत हद तक सहमत हैं. जी7 देशों ने ईरान को प्रतिबंधों की धमकी दी है यदि तेहरान में प्रदर्शनकारियों पर खूनी कार्रवाई जारी रहती है और यूरोपीय संघ भी अतिरिक्त प्रतिबंधों पर विचार कर रहा है. हालांकि फ्रांस ईरान पर बमबारी का समर्थन नहीं करते, जबकि ट्रंप ने ऐसा करने की धमकी दी है. जरूरी बात ये है कि पेरिस ने ईरान के साथ परमाणु समझौते को तैयार करने में मदद की थी, जिससे ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान खुद को अलग कर लिया था.

ग्रीनलैंड पर फ्रांस के राष्ट्रपति के बयान का मतलब

मैक्रों ने ट्रंप को कहा, ‘मुझे समझ नहीं आ रहा कि आप ग्रीनलैंड में क्या कर रहे हैं?’ इस मुद्दे पर ट्रंप के साथ सीधी बातचीत में मैक्रों ने पहली बार नरमी दिखाई. ग्रीनलैंड पर अमेरिकी राष्ट्रपति की योजनाओं का समर्थन न करने वाले यूरोपीय सहयोगियों पर टैरिफ लगाने की ट्रंप की धमकियों के जवाब में फ्रांस ने सार्वजनिक रूप से कहीं अधिक आक्रामक रुख अपनाया है. मैक्रों ने यूरोपीय यूनियन से अपने एंटी ट्रेड टूल्स को लागू करने का आग्रह किया है, जबकि जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ जैसे अन्य नेता कूटनीति को मौका देना चाहते हैं.

यूक्रेन, डेनमार्क, सीरिया और रूस पर दिए बयान का अर्थ

मैक्रों की ओर से यूक्रेन और डेनमार्क के साथ-साथ रूस को भी पेरिस में होने वाली जी7 बैठक में आमंत्रित करने की स्पष्ट इच्छा से यूरोपीय लोगों के बीच चिंताएं बढ़ने की संभावना है. फ्रांस के राष्ट्रपति ने बार-बार कहा है कि अमेरिका, यूक्रेन और रूस के बीच शांति वार्ता के बाद यूरोपीय देशों को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत फिर से शुरू करनी चाहिए. हालांकि, यूरोपीय देशों में इस बात पर मतभेद है कि इन वार्ताओं का नेतृत्व कौन करेगा और क्या यूरोपीय विशेष दूत का पद बनाना चाहिए, क्योंकि मॉस्को लगातार यूक्रेन पर बमबारी कर रहा है.

पेरिस में हो रही जी7 बैठक में रूस को आमंत्रित करना, पुतिन की शांति वार्ता को गंभीरता से लेने का कोई संकेत दिए जाने से पहले ही मॉस्को की छवि सुधारने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है. यह एक जोखिम भरा दांव है.

दावोस के बाद पेरिस में जी7 की बैठक का अर्थ

मैक्रों ने चैट में कहा था, ‘मैं गुरुवार दोपहर को दावोस के बाद पेरिस में जी7 की बैठक आयोजित कर सकता हूं.’ पॉलिटिको की रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस के अधिकारी ने इसे लेकर बताया, ‘ऐसा हो सकता है कि मैक्रों एक ऐसी बैठक का प्रस्ताव दे रहे होंगे जो ब्रुसेल्स में गुरुवार शाम को होने वाले यूरोपीय संघ के नेताओं के आपातकालीन शिखर सम्मेलन से सीधे टकराती.’

ट्रम्प की टैरिफ धमकी का जवाब यूरोपीय संघ के पास है, लेकिन इसमें ब्रिटेन शामिल नहीं है, जो यूक्रेन के लिए सुरक्षा गारंटी और ग्रीनलैंड की सुरक्षा पर चर्चा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. फ्रांस की ओर से जी-7 प्रारूप का प्रस्ताव रखे जाने की संभावना है क्योंकि वह समूह की रोटेशन अध्यक्षता कर रहा है और इसमें ब्रिटेन-कनाडा जैसे प्रमुख देश शामिल हैं. यूरोपीय रक्षा और सुरक्षा पर चर्चा करने के लिए नाटो आमतौर पर एक विशेष मंच है, लेकिन यह वास्तव में एक सदस्य द्वारा दूसरे को धमकी देने की स्थिति से निपटने के लिए नहीं बना है.

ट्रंप के साथ डिनर क्या मतलब हो सकता है?

पेरिस में एक डिनर कार्यक्रम का आयोजन ट्रंप का दिल जीतने का एक तरीका हो सकता है. यूरोपीय लोगों को लगता है कि भव्य समारोह अमेरिकी राष्ट्रपति को खुश कर देती है. मैक्रोन ने “डिनर डिप्लोमेसी” में भी महारत हासिल कर ली है, जिसके तहत उन्होंने मतभेदों को सुलझाने के प्रयास में हंगरी के विक्टर ओर्बन को कई बार पेरिस में रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया है. मैक्रों ने डिनर डिप्लोमेसी में भी महारत हासिल कर ली है, जिसके तहत उन्होंने मतभेदों को सुलझाने के प्रयास में हंगरी के विक्टर ओर्बन को कई बार पेरिस में रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया है.

IPL 2026 Schedule Awaited For Election Dates: “आईपीएल 2026 का शेड्यूल कब होगा जारी? टीमों के वेन्यू फाइनल होने पर बीसीसीआई ने दिया बड़ा बयान”

इंडियन प्रीमियर लीग 2026 के शेड्यूल का ऐलान अभी तक नहीं किया जा सका है. कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. बीसीसीआई इंतजार कर रही है कि राज्यों में चुनाव की तारीखों का ऐलान हो जाए, उसके बाद आईपीएल 2026 के शेड्यूल की घोषणा की जाए ताकि चुनाव और मैचों के बीच क्लैश वाली स्थिति न बने. इसके अलावा, बीसीसीआई कुछ टीमों के होम वेन्यू निर्धारित करने का भी इंतजार कर रहा है. आईएएनएस को मिली जानकारी के मुताबिक बीसीसीआई ने राजस्थान रॉयल्स (RR) और रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) को इस सप्ताह के अंत तक अपने होम वेन्यू तय करने का निर्देश दिया है. आरसीबी का होम वेन्यू एम चिन्नास्वामी स्टेडियम, बेंगलुरु है, जबकि राजस्थान का जयपुर के सवाई मानसिंह स्टेडियम और कुछ मैचों के लिए गुवाहाटी के बरसापारा स्टेडियम में खेलती है.

IPL 2026 में राजस्थान रॉयल्स का कहां होगा होम वेन्यू 

आरआर के लिए होम वेन्यू तय करना थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो रहा है. राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन में प्रशासनिक समस्याओं के कारण जयपुर स्टेडियम में अनिश्चितता बनी हुई है. बीसीसीआई ने कहा है कि जरूरत पड़ी तो राजस्थान रॉयल्स को पुणे के एमसीए स्टेडियम को अपने बैकअप होम वेन्यू के रूप में उपयोग करना पड़ सकता है.

RCB का कहां होगा IPL 2026 में होम वेन्यू 

आरसीबी के लिए भी होम वेन्यू को लेकर चर्चा चल रही है. बेंगलुरु के एम चिन्नास्वामी स्टेडियम को हाल ही में आईपीएल और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच का आयोजन करने की मंजूरी दी गई है, ये अनुमति राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों द्वारा तय नियमों और शर्तों के आधार पर निर्भर है. आरसीबी के उपाध्यक्ष राजेश मेनन ने नया रायपुर के शहीद वीर नारायण सिंह इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में दो मैच खेलने की संभावना के संबंध में छत्तीसगढ़ के सीएम से मुलाकात की थी.

BCCI चुनाव की तारीखों का कर रही है इंतजार

बीसीसीआई का लक्ष्य है कि आईपीएल 2026 का शेड्यूल ऐसा हो कि किसी भी राज्य में होने वाले चुनाव और मैचों में टकराव न हो. इसके लिए बोर्ड टीमों के फैसलों और चुनाव की तारीखों की घोषणा दोनों का इंतजार कर रहा है. एक बार जब आरसीबी और आरआर अपने होम वेन्यू फाइनल कर लेंगी और चुनाव की तारीखें घोषित हो जाएंगी, बीसीसीआई आईपीएल 2026 के शेड्यूल को अंतिम रूप देगी. आईपीएल 2026 की तैयारियों में ये विलंब चुनाव और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण हो रहा है, लेकिन बोर्ड ये सुनिश्चित करना चाहता है कि सभी मैच बिना किसी बाधा के सुचारू रूप से हों.