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बांग्लादेश चुनाव: सीमावर्ती क्षेत्रों में जमात को बढ़त, भारत के लिए क्या संकेत?

बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव में जहां तारिक रहमान की Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने राष्ट्रीय स्तर पर भारी बहुमत हासिल किया, वहीं जमात-ए-इस्लामी ने भारत से सटे सीमावर्ती जिलों में मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया है।

विशेष रूप से सतखिरा, कुष्टिया, खुलना बेल्ट के हिस्से और रंगपुर क्षेत्र जमात के प्रभाव वाले क्लस्टर के रूप में उभरे हैं।


सीमावर्ती इलाकों में जमात का मजबूत आधार

भारत की सीमा से लगे ये जिले पश्चिम बंगाल, असम और सिलीगुड़ी कॉरिडोर से भौगोलिक रूप से जुड़े हुए हैं।

  • सतखिरा: सभी 4 सीटों पर जमात की जीत
  • कुष्टिया: 4 में से 3 सीटें
  • रंगपुर क्षेत्र: कई सीटों पर मजबूत पकड़
  • नाओगांव-2, जॉयपुरहाट-1, शेरपुर-1 और गाइबंदा-1 जैसे इलाकों में भी जमात या उसके सहयोगी आगे रहे

इन क्षेत्रों में जमात का आधार मुख्यतः ग्रामीण नेटवर्क, मस्जिदों और मदरसों के प्रभाव पर टिका बताया जा रहा है।

इसके विपरीत BNP ने सिल्हेट, चटगांव और मायमंसिंह जैसे शहरी और प्रवासी आय (रेमिटेंस) से प्रभावित इलाकों में बड़ी जीत दर्ज की।


भारत के लिए क्या मायने?

सीमा से सटे जिलों में जमात की राजनीतिक मजबूती भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय मानी जा रही है, खासकर पश्चिम बंगाल और असम की सुरक्षा के संदर्भ में।

विश्लेषकों के अनुसार:

  • राजनीतिक वैधता मिलने से कट्टरपंथी विचारधाराओं को खुलकर काम करने का स्पेस मिल सकता है।
  • पहले जो गतिविधियां गुप्त थीं, वे अर्ध-खुले रूप में सामने आ सकती हैं।
  • खतरा प्रत्यक्ष हिंसा से कम और दीर्घकालिक वैचारिक नेटवर्क के निर्माण से ज्यादा माना जा रहा है।

रिपोर्टों में यह भी संकेत है कि संभावित जोखिमों में सीमित लेकिन प्रभावशाली घुसपैठ, डिजिटल प्रचार, फंडिंग नेटवर्क और विचारधारात्मक प्रसार शामिल हो सकते हैं।


सांप्रदायिक संतुलन पर असर?

कुछ आकलनों में यह आशंका जताई गई है कि सीमावर्ती इलाकों में सामाजिक दबाव, भूमि विवाद या पलायन जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं, जिससे भारत में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को बल मिल सकता है।

हालांकि, फिलहाल किसी बड़े आतंकी खतरे की स्पष्ट पुष्टि नहीं है। चिंता अधिकतर लंबे समय में “रेडिकल इकोसिस्टम” बनने को लेकर जताई जा रही है।


आगे क्या?

BNP की राष्ट्रीय जीत के बाद नई सरकार का भारत के साथ संबंधों पर रुख अहम होगा। यदि द्विपक्षीय सहयोग मजबूत रहता है, तो सीमा प्रबंधन और खुफिया समन्वय भी बेहतर हो सकता है।

फिलहाल संकेत यही हैं कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर निगरानी और सतर्कता बढ़ाई जा सकती है, ताकि किसी भी संभावित जोखिम को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।

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