
भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा के बाद अब संगठन को पूरी तरह कसने की तैयारी शुरू कर दी है। अगला बड़ा फोकस प्रदेश पदाधिकारियों और मोर्चों के गठन पर है। इसी कड़ी में भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) का प्रदेश अध्यक्ष पद इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में है। खासकर क्षत्रिय समाज ने इस बार मन ही मन मान लिया है कि युवा मोर्चा की कमान अब उनके समाज के किसी बेटे को ही मिलेगी।
इसके पीछे तर्क भी समाज के पास पूरे हैं। दयाशंकर सिंह के बाद से अब तक भाजयुमो को कोई भी क्षत्रिय अध्यक्ष नहीं मिला। लंबे अंतराल के बाद क्षत्रिय समाज को लगता है कि अब उनकी बारी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं क्षत्रिय होकर प्रदेश का नेतृत्व कर रहे हैं, लेकिन समाज का एक वर्ग यह मानता है कि योगी जी संत हैं, इसलिए उनके कारण क्षत्रिय समाज की राजनीतिक भागीदारी संतुलित नहीं मानी जा सकती। इसी सोच के चलते पहले से ही यह कयास लगाए जा रहे थे कि भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष क्षत्रिय नहीं होगा, और वही हुआ- इस बार भी प्रदेश अध्यक्ष पिछड़ा वर्ग से चुना गया।
इसी कारण अब पार्टी और समाज दोनों स्तरों पर यह धारणा बन रही है कि भाजयुमो का अध्यक्ष सामान्य वर्ग से होना चाहिए। ब्राह्मण कोटे से पहले ही हरीश द्विवेदी, सुब्रत पाठक, आशुतोष राय और प्रांशु दत्त द्विवेदी जैसे चेहरे मोर्चा की कमान संभाल चुके हैं। ऐसे में क्षत्रिय समाज इस बार पूरी उम्मीद लगाए बैठा है कि युवा मोर्चा की कमान अब किसी क्षत्रिय को सौंपी जाएगी।
क्षत्रिय दावेदारों में फिलहाल दो नाम सबसे प्रबल माने जा रहे हैं। पहला नाम अयोध्याधाम से जुड़े एक प्रदेश पदाधिकारी का है और दूसरा मऊ से आने वाले एक राष्ट्रीय नेता का। सियासी गलियारों में चर्चा है कि अयोध्या वाले इसलिए मजबूत माने जा रहे हैं क्योंकि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक “बड़े भाई साहब” का संरक्षण प्राप्त है और वे उनके शिष्य माने जाते हैं। वहीं मऊ वाले नेता जी की समस्या यह है कि उनका खुद का कोई मजबूत व्यक्तिगत राजनीतिक आधार नहीं बताया जाता।
हालांकि अयोध्या वाले दावेदार की ताकत ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी मानी जा रही है। माना जा रहा है कि दिल्ली वाले बड़े भाई साहब के विरोधी यदि एकजुट हो गए तो अयोध्या वाले को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में दिल्ली की टीम पूरे प्रदेश में सक्रिय होकर लखनऊ के खिलाफ माहौल बना सकती है।
दूसरी ओर मऊ वाले नेता जी की सबसे बड़ी कमजोरी उनके पारिवारिक अतीत से जुड़ी बताई जाती है। उनके पिता का मुख्तार अंसारी के साथ व्यापारिक साझेदारी का पुराना किस्सा आज भी उनके रास्ते में रोड़ा माना जा रहा है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ऐसे किसी भी नाम को मंजूरी देने के पक्ष में नहीं होंगे, जिस पर इस तरह का साया हो।
दिलचस्प बात यह है कि दोनों दावेदारों की सबसे बड़ी ताकत उनके अभिभावक माने जाते हैं और विडंबना यह है कि वही अभिभावक उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बनते नजर आते हैं। तर्क, गणित और जोर-आजमाइश- तीनों ही पक्षों में दमदार है, लेकिन फिलहाल सियासी समीकरणों को देखते हुए अयोध्या वाले पदाधिकारी ही इस रेस में थोड़ा आगे दिखते हैं। बड़े भाई साहब का साथ उनके पलड़े को भारी करता नजर आ रहा है।
अंततः ताजपोशी किसके सिर सजेगी, इसका फैसला तो वक्त ही करेगा, लेकिन इस समय भाजयुमो की इस रेस में यही दो घोड़े सबसे ज्यादा ताकतवर माने जा रहे हैं- एक अयोध्या का, दूसरा मऊ का। कहा भी जा रहा है कि अयोध्या के लोग हर्षीले होते हैं और मऊ के लोग पॉवर वाले। अब देखना यह है कि हर्ष जीतता है या पॉवर।


































