दुनिया की आर्थिक और व्यापारिक राजनीति तेजी से बदल रही है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों, ऊंचे टैरिफ और अनिश्चित व्यापार रुख के चलते अब कई बड़े देश अमेरिका पर निर्भरता कम करने की रणनीति अपना रहे हैं. इस ग्लोबल चेंज के सेंटर में भारत एक मजबूत और भरोसेमंद आर्थिक साझेदार के रूप में उभर रहा है. यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका के कई देश अब पारंपरिक वेस्ट-सेंट्रिक मॉडल से हटकर पश्चिम-पूर्व आर्थिक धुरी की ओर बढ़ रहे हैं, जहां भारत को दीर्घकालिक विकल्प और रणनीतिक संतुलन के रूप में देखा जा रहा है.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर का चीन दौरा इसी बदलते वैश्विक समीकरण का संकेत है. पिछले 8 सालों में यह किसी ब्रिटिश प्रधानमंत्री की पहली चीन यात्रा होगी. इस दौरे का मकसद चीन के साथ बिगड़े रिश्तों को सुधारना और व्यापारिक सहयोग को दोबारा मजबूत करना है. स्टारमर के साथ वरिष्ठ मंत्री और कई बड़े कारोबारी नेता भी होंगे. बीजिंग में उनकी मुलाकात राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कियांग से होगी, जबकि शंघाई में व्यापारिक बैठकों का आयोजन किया जाएगा. रॉयटर्स के अनुसार, ब्रिटेन अब अमेरिका को एक अनिश्चित साझेदार मान रहा है और अपनी आर्थिक निर्भरता कम करना चाहता है. फिलहाल चीन ब्रिटेन का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और 2025 के मध्य तक दोनों देशों के बीच व्यापार 100 अरब पाउंड से अधिक पहुंच चुका है.
कनाडा की रणनीति बदली, भारत बना प्राथमिक साझेदार
अमेरिका के करीबी सहयोगी रहे कनाडा ने भी अपनी विदेश और व्यापार नीति में बड़ा बदलाव शुरू कर दिया है. कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी मार्च के पहले सप्ताह में भारत दौरे की तैयारी कर रहे हैं. यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी दी और उसे 51वां अमेरिकी राज्य कहकर विवाद खड़ा किया. कनाडा की विदेश मंत्री अनिता आनंद ने दावोस में स्पष्ट कहा कि कनाडा कभी भी अमेरिका का हिस्सा नहीं बनेगा. उन्होंने यह भी बताया कि कनाडा अगले दस वर्षों में अमेरिका के बाहर अपने निर्यात को दोगुना करना चाहता है. इसी रणनीति के तहत भारत और चीन को प्रमुख साझेदार के रूप में चुना गया है.
ब्राज़ील का भारत पर भरोसा, ग्लोबल साउथ की नई धुरी
ग्लोबल साउथ के देशों में भी भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है. ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा फरवरी में भारत दौरे पर आ रहे हैं. वे एक बड़े कारोबारी प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत पहुंचेंगे और भारतीय उद्योगपतियों के साथ व्यापक बातचीत करेंगे. यह दौरा इस बात का संकेत है कि विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाएं भारत को केवल बाजार नहीं, बल्कि रणनीतिक आर्थिक साझेदार के रूप में देख रही हैं.
भारत-यूरोपीय संघ FTA बना गेमचेंजर
इस ग्लोबल चेंज का सबसे बड़ा उदाहरण भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता है, जिस पर 26 जनवरी 2026 को हस्ताक्षर हुए. यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे मदर ऑफ ऑल डील्स कहा है. यह समझौता दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत ग्लोबल GDP और करीब दो अरब लोगों को जोड़ता है. इसके तहत यूरोपीय संघ भारत को भेजे जाने वाले लगभग 97 प्रतिशत उत्पादों पर टैरिफ घटाएगा या खत्म करेगा, जबकि भारत भी चरणबद्ध तरीके से 93 प्रतिशत यूरोपीय उत्पादों पर टैरिफ हटाएगा. इससे भारत में यूरोपीय कारें, वाइन, चॉकलेट और प्रोसेस्ड फूड सस्ते होंगे, जबकि भारतीय टेक्सटाइल, फार्मा, इंजीनियरिंग और आईटी उत्पादों को यूरोप में बड़ा बाजार मिलेगा.
अमेरिका की चिंता और भारत की स्पष्ट नीति
इन नए वैश्विक गठबंधनों से अमेरिका असहज नजर आ रहा है. अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने भारत पर रूस से तेल खरीद को लेकर सवाल उठाए, जबकि कनाडा को चीन के सस्ते सामान के खिलाफ चेतावनी दी गई. इसके बावजूद देशों का रुख साफ है. वे अब रणनीतिक स्वायत्तता चाहते हैं और किसी एक शक्ति पर निर्भर नहीं रहना चाहते. भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि कोई भी देश यह उम्मीद नहीं कर सकता कि वह भारत के बाकी दुनिया से रिश्तों पर वीटो लगाए. यही सोच आज भारत को वैश्विक आर्थिक बदलाव का केंद्र बना रही है.


































