
लखनऊ : राजधानी लखनऊ में निर्माणाधीन ग्रीन कॉरिडोर परियोजना एक बार फिर चर्चा और विवाद के केंद्र में आ गई है। इस बार मामला निर्माण की गुणवत्ता या प्रगति को लेकर नहीं, बल्कि मीडिया प्रतिनिधियों को निर्माण स्थल में प्रवेश से रोके जाने को लेकर सामने आया है।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सूरज बिल्डर प्राइवेट लिमिटेड के प्रोजेक्ट मैनेजर प्रवीण चंद्र दास द्वारा पत्रकारों को साइट पर जाने की अनुमति नहीं दी गई, जिससे पारदर्शिता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
मीडिया की एंट्री पर रोक: क्या है पूरा मामला

जानकारी के अनुसार, कुछ पत्रकार ग्रीन कॉरिडोर परियोजना के निर्माण कार्य की वास्तविक स्थिति जानने और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग के उद्देश्य से स्थल पर पहुंचे थे। बताया जाता है कि उन्हें सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई।

प्रोजेक्ट मैनेजर की ओर से यह कहा गया कि निर्माण क्षेत्र सेना की भूमि से सटा हुआ है और सुरक्षा मानकों के चलते बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश प्रतिबंधित है। हालांकि, इस स्पष्टीकरण के बाद भी यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या मीडिया के लिए किसी निर्धारित अनुमति प्रक्रिया का पालन संभव था या नहीं।
सेना की भूमि का हवाला: सुरक्षा बनाम पारदर्शिता
यदि निर्माण स्थल वास्तव में सेना की भूमि के निकट है, तो सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन अनिवार्य है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि संपूर्ण साइट प्रतिबंधित क्षेत्र में आती है या केवल सीमावर्ती हिस्सा संवेदनशील है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक हित से जुड़ी बड़ी परियोजनाओं में पारदर्शिता सर्वोपरि होती है। मीडिया की भूमिका ऐसे कार्यों की निगरानी और तथ्य सामने लाने में महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में स्पष्ट दिशा-निर्देश और अधिकृत अनुमति प्रक्रिया सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि सुरक्षा और पारदर्शिता दोनों के बीच संतुलन बना रहे।
स्थानीय स्तर पर उठते सवाल
पत्रकारों को रोके जाने की घटना के बाद स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों के बीच कई प्रश्न चर्चा का विषय बन गए हैं।
क्या निर्माण कार्य स्वीकृत नक्शे और मानकों के अनुरूप हो रहा है? क्या भूमि सीमांकन पूरी तरह स्पष्ट और विधिसम्मत है? क्या सभी आवश्यक वैधानिक अनुमति और पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ प्राप्त हैं?
इन प्रश्नों पर अभी तक संबंधित एजेंसी या प्रशासन की ओर से विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
प्रशासनिक जवाबदेही की अपेक्षा
ग्रीन कॉरिडोर परियोजना शहर की यातायात व्यवस्था और शहरी विकास से सीधे जुड़ी एक महत्वाकांक्षी योजना है। ऐसे में जिला प्रशासन, संबंधित विभागों और निर्माण एजेंसी से पारदर्शी संवाद की अपेक्षा की जा रही है।
यदि परियोजना सभी नियमों और मानकों के अनुरूप संचालित हो रही है, तो मीडिया को नियंत्रित और अधिकृत तरीके से तथ्यात्मक कवरेज की अनुमति देने पर स्पष्ट नीति सामने आनी चाहिए। इससे अनावश्यक आशंकाओं और अफवाहों पर भी विराम लग सकेगा।
पारदर्शिता ही विश्वास की आधारशिला
शहरी बुनियादी ढांचा परियोजनाएँ केवल निर्माण कार्य नहीं होतीं, बल्कि वे जनता के विश्वास से भी जुड़ी होती हैं। पारदर्शिता, जवाबदेही और संवाद- ये तीनों तत्व किसी भी सार्वजनिक परियोजना की सफलता के लिए अनिवार्य हैं।
फिलहाल, प्रोजेक्ट मैनेजर द्वारा पत्रकारों को रोके जाने की घटना ने ग्रीन कॉरिडोर परियोजना को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें संबंधित एजेंसियों और प्रशासन पर टिकी हैं कि वे इस विषय पर क्या आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करते हैं और भविष्य में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।


































