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मानसिक स्वास्थ्य कोई ऐड-ऑन नहीं, बल्कि सतत एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की रीढ़ है: लखनऊ के सुल्तानपुर रोड में स्थित SMS कॉलेज के प्रिंसिपल्स कॉनक्लेव-2026 में सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह का दूरदर्शी और प्रेरक संबोधन

लखनऊ: सरोजनीनगर विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने शनिवार को सुल्तानपुर रोड, गोसाईगंज स्थित स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज (एसएमएस) में आयोजित प्रिंसिपल्स कॉनक्लेव – 2026 में मुख्य वक्ता के रूप में भाग लेकर शिक्षा जगत को एक नई दिशा देने वाला संदेश दिया। सम्मेलन का विषय था-
“Mental Health and Well-Being of Students and Educators: Creating a Supportive Ecosystem”
(छात्रों एवं शिक्षकों का मानसिक स्वास्थ्य एवं सुख-समृद्धि: एक सहायक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण)।

कार्यक्रम में देश-प्रदेश से आए प्रिंसिपल, शिक्षाविद, नीति-निर्माता और शिक्षा विशेषज्ञ शामिल हुए। डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने ओजस्वी और तथ्यपरक संबोधन में स्पष्ट कहा कि मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा का कोई अतिरिक्त या वैकल्पिक हिस्सा नहीं है, बल्कि यह सतत, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बुनियाद है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर छात्रों और शिक्षकों का मन स्वस्थ नहीं है, तो कोई भी पाठ्यक्रम, तकनीक या संसाधन शिक्षा को सफल नहीं बना सकता।

डॉ. राजेश्वर सिंह: शिक्षा और समाज को जोड़ने वाली मजबूत कड़ी

डॉ. राजेश्वर सिंह ने एक जनप्रतिनिधि होने के साथ-साथ समाज, शिक्षा और युवाओं से जुड़े विषयों पर अपनी गहरी समझ का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि एक विधायक की जिम्मेदारी केवल सड़क, बिजली और पानी तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि समाज के मानसिक, बौद्धिक और नैतिक विकास में भी उसकी भूमिका होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि सरोजनीनगर क्षेत्र में वे लगातार शिक्षा, युवाओं और महिलाओं के मानसिक सशक्तिकरण से जुड़े कार्यक्रमों को बढ़ावा दे रहे हैं और भविष्य में इसे और व्यापक रूप देने का संकल्प लिया है।

उन्होंने कहा कि आज का बच्चा तकनीक से जुड़ा जरूर है, लेकिन भावनात्मक रूप से कई बार अकेला और दबाव में होता है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों, शिक्षकों और अभिभावकों—तीनों की संयुक्त जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों को सिर्फ अंक नहीं, बल्कि आत्मबल भी दें।

भारत की विशाल शिक्षा व्यवस्था और बदलती चुनौतियां

डॉ. राजेश्वर सिंह ने भारत की शिक्षा व्यवस्था का व्यापक चित्र प्रस्तुत करते हुए बताया कि-

  • स्कूली शिक्षा में 24.8 करोड़ छात्र
  • 14.72 लाख स्कूल
  • लगभग 98 लाख शिक्षक
  • उच्च शिक्षा में 4.33 करोड़ छात्र
  • 40,000 से अधिक उच्च शिक्षण संस्थान

उन्होंने कहा कि आजादी के समय मात्र 10% साक्षरता से बढ़कर आज लगभग 80% तक पहुंचना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह शिक्षकों, प्रिंसिपलों और शैक्षणिक संस्थानों की वर्षों की मेहनत का परिणाम है।

उन्होंने यह भी बताया कि आज 82% संस्थान हाइब्रिड लर्निंग अपना चुके हैं, एडटेक सेक्टर 10.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुका है, शिक्षा पर जीडीपी का लगभग 6.5% खर्च हो रहा है और एआई व डिजिटल टूल्स तेजी से शिक्षा में शामिल हो रहे हैं। लेकिन इन सभी प्रगतियों के बीच मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है।

डराने वाले आंकड़े, गंभीर चेतावनी

डॉ. राजेश्वर सिंह ने WHO इंडिया, NCERT, द लैंसेट साइकेट्री और UNICEF इंडिया के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि—

  • 5 में से 3 छात्र किसी न किसी स्तर पर चिंता से ग्रस्त हैं
  • करीब 70% छात्र अकादमिक दबाव में हैं
  • 50% से अधिक में अवसाद के शुरुआती लक्षण हैं
  • 55% शिक्षक कार्य-संबंधित तनाव से पीड़ित हैं
  • 1 में से 4 शिक्षक नियमित रूप से आत्म-देखभाल नहीं कर पाते

उन्होंने कहा कि ये आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य की चेतावनी हैं। अगर आज हमने इस पर ध्यान नहीं दिया, तो कल हमें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

प्रिंसिपलों को दिया नेतृत्व का मंत्र

डॉ. राजेश्वर सिंह ने प्रिंसिपलों को संस्थान का “मानवीय वास्तुकार” बताते हुए कहा कि शिक्षक कक्षा बनाते हैं, लेकिन प्रिंसिपल पूरे माहौल को गढ़ते हैं। उन्होंने आह्वान किया कि हर प्रिंसिपल अपने संस्थान को केवल परीक्षा केंद्र नहीं, बल्कि जीवन निर्माण केंद्र बनाए।

उन्होंने सुझाव दिया कि-

  • हर स्कूल और कॉलेज में वार्षिक वेलनेस कैलेंडर बने
  • प्रशिक्षित काउंसलर की नियुक्ति हो
  • छात्रों और शिक्षकों के लिए सुरक्षित संवाद मंच तैयार किए जाएं
  • योग, ध्यान, खेल और कला को नियमित दिनचर्या का हिस्सा बनाया जाए

उनका स्पष्ट संदेश था कि मानसिक स्वास्थ्य अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।

जनप्रतिनिधि के रूप में सक्रिय भूमिका

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि वे इस विषय को केवल मंच से बोलकर नहीं छोड़ेंगे, बल्कि इसे नीतिगत और सामाजिक स्तर पर आगे बढ़ाएंगे। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे शासन, प्रशासन और शिक्षा विभाग से मिलकर ऐसे मॉडल विकसित करने का प्रयास करेंगे, जिससे स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य को व्यवस्थित रूप से शामिल किया जा सके।

उन्होंने कहा कि सरोजनीनगर क्षेत्र में वे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में स्कूलों में काउंसलिंग, लाइफ-स्किल ट्रेनिंग और पैरेंट-टीचर वर्कशॉप जैसे कार्यक्रम शुरू कराने की दिशा में काम करेंगे, ताकि इसका मॉडल पूरे प्रदेश में अपनाया जा सके।

विशिष्ट अतिथियों का सम्मान

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व आईएएस अधिकारी एवं सुशांत यूनिवर्सिटी, गुड़गांव के कुलपति जय शंकर मिश्रा की उपस्थिति को डॉ. राजेश्वर सिंह ने प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि जय शंकर मिश्रा का प्रशासनिक अनुभव और शैक्षणिक दृष्टि सभी के लिए मार्गदर्शक है।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज, लखनऊ की पूरी टीम को इस सफल आयोजन के लिए बधाई दी और श्री आनंद के. सिन्हा (सचिव, AKWL), ए.के. माथुर, डॉ. धर्मेंद्र सिंह, डॉ. आशीष भटनागर, डॉ. बी.आर. सिंह, डॉ. जगदीश सिंह, डॉ. वी.बी. सिंह, श्री सुरेंद्र श्रीवास्तव, डॉ. पी.के. सिंह, राहुल अवस्थी और आदित्य प्रताप सिंह सहित सभी विशिष्ट अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

शिक्षा का भविष्य: स्वस्थ मन, मजबूत राष्ट्र

अपने संबोधन के अंत में डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि मजबूत भारत की नींव तभी पड़ेगी, जब हमारे बच्चे न केवल पढ़े-लिखे, बल्कि मानसिक रूप से स्वस्थ, आत्मविश्वासी और संवेदनशील होंगे। उन्होंने कहा कि शिक्षा का असली उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि संतुलित इंसान बनाना है।

उन्होंने विश्वास जताया कि प्रिंसिपल्स कॉनक्लेव-2026 जैसे मंच शिक्षा को केवल अकादमिक नहीं, बल्कि मानवीय और संवेदनशील बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाएंगे, और इसमें जनप्रतिनिधियों, शिक्षकों और समाज- तीनों की साझी जिम्मेदारी होगी।

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