अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी अचानक और बड़े स्तर पर बढ़ा दी है। पिछले 24 घंटों में 50 से ज्यादा लड़ाकू विमान क्षेत्र में भेजे गए हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तेहरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को लेकर नई कूटनीतिक बातचीत जारी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, Axios ने सबसे पहले इस तैनाती की जानकारी दी। एक अमेरिकी अधिकारी ने पुष्टि की कि बड़ी संख्या में फाइटर जेट्स को क्षेत्र में भेजा गया है ताकि हवाई और नौसैनिक ताकत को मजबूत किया जा सके।
F-22, F-35 और F-16 एक साथ तैनात
फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा में F-22 Raptor, F-35 Lightning II और F-16 Fighting Falcon जैसे एडवांस लड़ाकू विमानों की उड़ान दर्ज की गई है। इनके साथ एयर रिफ्यूलिंग टैंकर भी देखे गए, जो लंबे समय तक ऑपरेशन की तैयारी का संकेत देते हैं।
एक अधिकारी के अनुसार, “पिछले 24 घंटे में 50 से अधिक फाइटर जेट्स तैनात किए गए हैं।”
दूसरा एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप भी रवाना
इसी बीच, USS Gerald R. Ford कैरियर स्ट्राइक ग्रुप कैरिबियन से निकलकर मध्य अटलांटिक में पहुंच चुका है और मध्य पूर्व की ओर बढ़ रहा है। इसके साथ तीन गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर—
- USS Mahan
- USS Bainbridge
- USS Winston S. Churchill
भी शामिल हैं। हालांकि मौजूदा स्थिति को देखते हुए इस स्ट्राइक ग्रुप को ईरान के पास पहुंचने में एक हफ्ते से ज्यादा समय लग सकता है।
पहले से ही USS Abraham Lincoln और अन्य अमेरिकी नौसैनिक व हवाई संसाधन क्षेत्र में तैनात हैं।
कूटनीतिक बातचीत में सकारात्मक संकेत
सैन्य गतिविधि बढ़ने के बावजूद, अमेरिका और ईरान दोनों ने कूटनीति को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया है। जिनेवा में हुई हालिया बैठक को लेकर अमेरिकी अधिकारियों ने “प्रगति” की बात कही है, हालांकि कई अहम मुद्दों पर अभी चर्चा बाकी है।
ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने बातचीत को “गंभीर, रचनात्मक और सकारात्मक” बताया। उन्होंने कहा कि पिछली बैठक की तुलना में इस बार बेहतर प्रगति हुई है और आगे का रास्ता अधिक स्पष्ट नजर आ रहा है।
ओमान के विदेश मंत्री Badr Albusaidi, जिन्होंने वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाई, ने कहा कि बातचीत अच्छे माहौल में समाप्त हुई और साझा लक्ष्यों तथा तकनीकी मुद्दों की पहचान में मदद मिली।
क्या संकेत देता है यह कदम?
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह सैन्य तैनाती एक रणनीतिक संदेश भी हो सकती है—एक तरफ दबाव की नीति और दूसरी तरफ कूटनीतिक बातचीत। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह बढ़ी हुई सैन्य मौजूदगी सिर्फ एहतियाती कदम है या क्षेत्र में तनाव और बढ़ने वाला है।


































