Home उत्तर प्रदेश यश और राजयोग की देवी हैं माँ बगलामुखी- डॉक्टर राजेश्वर सिंह

यश और राजयोग की देवी हैं माँ बगलामुखी- डॉक्टर राजेश्वर सिंह

ब्रह्मास्त्र रूपिणी देवी माता श्री बगलामुखी।
चित शक्ति ज्ञानरूपा च ब्रह्मानन्द प्रदायनी।।

“जिंदगी में मुश्किलें तो आती ही हैं। समय बदलता है तो जिंदगी का चक्र भी बदल जाता है। सुख कब दुःख में बदल जाए और जीत कब हार में, कौन जानता है ? ऐसे कठिन वक्त में देवी बगलामुखी की उपासना से मनोबल बढ़ता है। ऐसा मानना है प्रवर्तन निदेशालय के लखनऊ ज़ोन के डायरेक्टर डॉक्टर राजेश्वर सिंह जी का”

ईडी के लखनऊ ज़ोन के डायरेक्टर डॉक्टर राजेश्वर सिंह जी

ब्यूरोक्रेसी में रहते अपनी कार्यशैली से पूरे देश मे एक अलग छाप छोड़ने के बाद अब राजनीतिक गलियारों में धमक मचाने की फिराक रखने के उद्देश्य से हाल ही में अपनी सर्विस से वीआरएस मांगने वाले उत्तरप्रदेश के चर्चित अधिकारी व इंफोर्समेंट डिपार्टमेंट के लखनऊ ज़ोन के डायरेक्टर डॉ०राजेश्वर सिंह न सिर्फ अपनी सर्विस को लेकर पूरी निष्ठा और ईमानदारी से काम करते हैं। बल्कि देवी-देवताओं के प्रति उनकी अलग ही श्रद्धा देखने को मिलती है। आस्था के प्रति डॉ०सिंह की अलग ही छाप है। वो मां पीताम्बरा बगलामुखी देवी के उपासक हैं। उनका मानना है कि सच्चे मन से माँ की उपासना करने से एक तरफ जहां “कीर्ति और यश” की प्राप्ति होती है तो वहीं दूसरी तरफ मां की उपासना “राजयोग” तक भी पहुंचाती है।

गौरतलब है कि पितृ पक्ष चल रहे हैं और इनकी समाप्ति के तुरंत बाद शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होगी। ऐसे में लोग जगह-जगह पर 9 दिनों के लिए देवी माँ की मूर्ति को स्थापित करते हैं और विधि विधान से पूजा-पाठ भी करते हैं। आस्था पर डॉ०राजेश्वर सिंह भी अच्छा खासा यकीन करते हैं और स्वयं पूजा-पाठ भी करते हैं, इस सम्बंध में उन्होंने बताया कि वो मां पीताम्बरा बगलामुखी देवी के उपासक भी हैं। साथ ही उन्होंने बताया कि तंत्र शास्त्र की दस महाविद्याओं में देवी बगलामुखी आठवीं महाविद्या हैं। देवी को वीररति भी कहा जाता है, क्योंकि वे स्वयं ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं। तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं। गृहस्थों के लिए वह समस्त प्रकार के संदेहों का शमन करने वाली हैं। देवी को पीताम्बरा, बगला और वल्गामुखी आदि नामों से भी जाना जाता है। भगवती बगलामुखी का प्राकट्य सौराष्ट्र में हरिद्रा सरोवर से हुआ है। मान्यता है कि एक बार सतयुग में महाविनाश करने वाला तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा यह देखकर भगवान विष्णु चिंतित हो गए और शिव का स्मरण करने लगे। तब भगवान शिव ने कहा कि शक्ति रूप के अतिरिक्त कोई अन्य इस विनाश को रोक नहीं सकता, उनकी शरण में जाएं। तब विष्णु भगवान ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंच कर कठोर तप किया और उनके तप से देवी शक्ति प्रकट हुई। हरिद्रा झील में जल क्रीड़ा करती देवी मां पीतांबरा के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ और उस तेज से तूफान थम गया। मंगल युक्त चतुर्दशी की अर्धरात्रि में देवी शक्ति का बगलामुखी के रूप में प्रादुर्भाव हुआ। मां बगलामुखी ने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रुक सका।

माँ पीताम्बरा बगलामुखी देवी के दिव्य दर्शन

भारत के हिमाचल प्रदेश में एक और मध्यप्रदेश राज्य में बगलामुखी देवी के दो प्रमुख स्थल है, तीन मुख वाली त्रिशक्ति माता बगलामुखी का मंदिर मध्य प्रदेश के आगर जिले की तहसील नलखेड़ा में स्थित लखुंदर नदी के किनारे पर बना है। पीतांबरा पीठ के नाम से विख्यात देवी बगलामुखी का एक मंदिर मध्य प्रदेश के दतिया जिले में भी स्थित है। मान्यता है कि बगलामुखी देवी की पूजा तांत्रिक विधि से की जाती है, तांत्रिक पूजन पद्धति और तांत्रिक पंचांग के अनुसार बगलामुखी देवी का प्रतिदिन पीतोपचार से पूजन किया जाता है। देवी मां के पूजन का क्रम अभी भी इन जगहों पर अनवरत चल रहा है। चैत्र मास, आषाढ़ मास, अश्विन मास और माघ मास, इन चारों माह की नवरात्रियों में देश के कोने-कोने से शक्ति के उपासक (साधक) साधना करने के लिए श्री पीतांबरा पीठ पर आते हैं और आश्रम में निवास कर बगलामुखी देवी की साधना कर मंत्र की सिद्धि प्राप्त करते हैं। एक मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में भी है। नवरात्रि में प्रतिदिन बगलामुखी देवी का अभिषेक किया जाता है और नवरात्रि के पश्चात हर माह मंगलवार और शुक्रवार के दिन साधक और उपासक पूरे विधि विधान से पीतांबरा बगलामुखी देवी का अभिषेक करते हैं।

मां बगलामुखी देवी के ध्यान और पूजन की विधि

भगवती बगलामुखी देवी को पीतोपचार प्रिय है। अतः बगलामुखी देवी प्रतिदिन प्रातः पूजन में पीले वस्त्र धारण करती हैं। पीतांबर धारण करने से इन्हें पीतांबरा देवी भी कहते हैं। सायंकाल के तांत्रिक पूजन में बगलामुखी देवी रविवार को गुलाबी, सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल, बुद्धवार को हरी, गुरुवार को पीली, शुक्रवार को छींट और शनिवार को काली पोशाक धारण करती हैं। पीले वस्त्र धारण कर, पीला आसन, पीली गोमुखी हरिद्रा, हल्दी की माला, गाय के घी से दीप प्रज्ज्वलित कर पीले ऊन के आसन पर बैठकर मंगलाचरण कर संकल्प करें। प्रथम दिवस जिस समय जाप आरम्भ करें और प्रथम दिवस मंत्र की जितनी संख्या है, उतनी ही संख्या रखें। कम या ज्यादा न करें। संयमित आहार ग्रहण करें।।

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