Home उत्तर प्रदेश उत्तरप्रदेश राजकीय निर्माण निगम में स्मारक घोटाले के दागियों को अहम तैनाती

उत्तरप्रदेश राजकीय निर्माण निगम में स्मारक घोटाले के दागियों को अहम तैनाती

बहुचर्चित घोटालेबाजों को मलाईदार पोस्टिंग देने का मामला
पूर्ववर्ती बसपा सरकार के दागियों को दी गयी खास तरजीह

लखनऊ: उत्तरप्रदेश में योगी सरकार ने यूं तो भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ हर तरफ़ हल्ला बोल रखा है, लेकिन मुख्यमंत्री आवास से महज 4 किलोमीटर दूर स्थित उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम लिमिटेड के अफसर खेल करने में जुटे हुए हैं। ताजा मामला स्मारक घोटाले के दागियों को मलाईदार पोस्टिंग देने का है। जानकारी के अनुसार भ्रष्टाचार के मामलों में बदनाम इस डिपार्टमेंट के तत्कालीन एमडी यूके गहलोत ने नियम कानून ताक पर रखकर दागी अफसरों को ही मलाईदार पोस्टिंग दे दी, जबकि सभी पर भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं। जांच एजेंसियां भी अपनी रिपोर्ट में उन्हे दोषी मान चुकी हैं। तब आखिर क्या वजह है कि तत्कालीन एमडी अपने चहेते अफसरों को महत्वपूर्ण पदों पर तैनात कर दिया और वर्तमान कार्यवाहक एमडी उनपर कार्रवाई करने से कतरा रहे हैं।

अधिकारियों पर घोटाले के दाग

निर्माण निगम के सूत्रों की मानें तो विभाग के तत्कालीन पूर्व एमडी यूके गहलोत ने अपने निजी स्वार्थ के लिए कई अधिकारियों को नियम विरुद्ध महत्वपूर्ण ओहदों से नवाज दिया था जबकि उस पद के फिट और ईमानदार अफसर साइड में कर दिए गए, इतना ही नहीं बसपा सरकार में वर्ष 2007 से 2011 के बीच हुए स्मारक घोटाले के दो अधिकारी आरोपी भी हैं। वहीं लोकायुक्त और विजलेंस जांच में इन अधिकारियों पर आरोप सही पाया गया। मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है, इसके बावजूद तत्कालीन एमडी ने अपने चहेतों को मलाईदार पद पर तैनात कर दिया जबकि यह उस पद के लिए अर्हता ही नहीं रखते हैं।

23 दिसंबर 1994 को किया था ज्वॉइन

तत्कालीन एमडी यूके गहलोत ने नियम को ताक पर रख अपर परियोजना प्रबंधक (एपीएम) राजीव गर्ग को एजीएम कामर्शियल के पद तैनात कर दिया जबकि राजीव गर्ग की 2 जून 1988 में सीधी भर्ती के जरिये उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम में एआरई के पद पर तैनाती हुई थी, जानकार बताते हैं कि नियमानुसार उनकी इस पद पर नियुक्ति नहीं की जा सकती है। सूत्रों की मानें तो सितंबर 2019 को जारी वरिष्ठता की सूची में इनका 49वें नंबर पर स्थान है। वहीं यह एपीएम हैं इन्हे डायरेक्ट एटीएम के पद पर तैनाती नहीं दी जा सकती है। राजीव गर्ग को इस पर तैनाती के लिए इनका पूर्णकालिक प्रोजेक्ट मैनेजर होना जरूरी है। वह भी तब जब विभाग में कोई अधिकारी इस पद के लिए अर्हता न रखता हो। जबकि कई अधिकारी इस पद के लिए अर्हता रखते हैं, ऐसे में नियमों को ताक पर रख राजीव गर्ग को तैनाती दी गई।

इन पर भी मेहरबान हुए पूर्व एमडी

एपीएम राकेश चंद्रा को एजीएम टेक्निकल के पद पर तैनाती दी गई। इसके अलावा इन्हें जीएम टेक्निकल का भी अतिरिक्त प्रभार दिया गया है जबकि इनकी ज्वाइनिंग 23 दिसंबर 1994 में सीधी भर्ती के जरिये विभाग में एआर के पद पर हुई थी। विभाग द्वारा जारी वरिष्ठता सूची में इनका स्थान नंबर 83वें नंबर पर है, यह भी इस पद के लिए अर्हता नहीं रखते हैं क्योंकि एपीएम की सीधी तैनाती एजीएम पद पर नहीं की जा सकती है, वहीं इस पद की अर्हता रखने वाले अधिकारियों को साइड लाइन कर दिया गया है। हैरानी की बात तो यह है कि तत्कालीन एमडी यूके गहलोत ने रिटायरमेंट से पहले उपरोक्त दोनों ही अधिकारियों को मलाईदार पद पर तैनात कर दिया। वहीं वर्तमान कार्यवाहक एमडी सत्य प्रकाश को मामले की जानकारी होने के बाद भी कोई एक्शन नहीं लिया जा रहा है।

स्मारक घोटाले के प्रमुख आरोपी

बसपा सरकार में वर्ष 2007 से 2012 के बीच नोएडा व राजधानी लखनऊ में अंबेडकर स्मारकों के निर्माण में हुए 1400 करोड़ रुपये से ज्यादा के घोटाले में तत्कालीन लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में घोटाले के लिए पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा समेत 199 लोगों को जिम्मेदार ठहराया गया था। इसमें एक विधायक, दो पूर्व विधायक, खनन विभाग के पांच अधिकारी, राजकीय निर्माण निगम के 57 इंजीनियर व 37 लेखाकार, एलडीए के पांच इंजीनियर, पत्थरों की आपूर्ति करने वाली 60 फर्में व 20 कंसोर्टियम प्रमुख, दो वकील और आठ बिचौलियों के नाम सामने आए थे। इसमें इंजीनियर राकेश चंद्रा और राजीव गर्ग का भी नाम शामिल हैं। लोकायुक्त ने अपनी चांच रिपोर्ट में इन दोनों को भी दोषी ठहराया है।

जांच में मिले थे दोनों दोषी

वर्तमान में मामले की जांच विजिलेंस कर रही है, विजिलेंस ने भी अपनी रिपोर्ट में इंजीनियर राकेश चंद्रा और राजीव गर्ग को दोषी मानते हुए गोमतीनगर थाने में इनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी, वहीं अभी विजिलेंस मामले की जांच कर रही है हालांकि विजिलेंस ने भी दोनों को घोटाले का दोषी माना है। वहीं मामला कोर्ट में विचाराधीन है, विभागीय सूत्रों की मानें तो घोटाले की जांच तक दोनों इंजीनियर को किसी भी महत्वपूर्ण पद पर तैनाती नहीं दी जा सकती है। बताया जा रहा है कि पूर्व एमडी यूके गहलोत ने प्रमुख सचिव को गुमराह कर दोनों ही इंजीनियर को बिना अर्हता रखते हुए भी एजीएम के पद पर तैनात कर दिया है।

यह भी कुछ कम नहीं

विभाग में जीएम कामर्शियल और कांट्रैक्ट के पद पर तैनात इंजीनियर सत्यवीर यादव ने सपा सरकार में अपनी पकड़ का फायदा उठाकर पीडब्ल्यूडी से प्रतिनियुक्ति पर राजकीय निर्माण निगम में तैनाती करा ली थी। बताया जाता है कि वह उस समय पीडब्लूडी में एक्सियन के पद पर तैनात थे। प्रतिनियुक्ति पर आए सत्यवीर यादव को यहां पर प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर तैनात किया गया था। सूत्रों की मानें तो पीडब्ल्यूडी द्वारा करीब तीन साल पहले ही विभाग में वापस अपने पद पर तैनात करने का आदेश दिया जा चुका है, लेकिन अपनी पहुंच और रसूख के चलते अभी भी राजकीय निर्माण निगम में तैनात हैं। इसका कई बार रिमाइंडर भी भेजा जा चुका है। विभागीय सूत्रों की मानें तो इन पर भी वर्तमान एमडी सत्य प्रकाश काफी मेहरबान हैं। इसकी वजह यह बताई जा रही है कि एमडी सत्य प्रकाश भी पीडब्लयू विभाग से ही राजकीय निर्माण निगम में भेजे गये हैं इसलिए इन्होंने अब तक सत्यवीर यादव को अपने मूल विभाग में भेजने की कार्रवाई नहीं की, इतना ही नहीं वर्तमान में सत्यवीर यादव के पास दो चार्ज हैं। सत्यवीर यादव जीएम कामर्शियल और कांट्रैक्ट के पद पर तैनात हैं जबकि इन्हें विभाग में रहते हुए प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर ही रखा जा सकता है। ऐसे ही एक इंजीनियर एपीएम अनिल कुमार यादव हैं, जो सपा सरकार में पैक्सफैड से प्रतिनियुक्ति पर राजकीय निर्माण निगम में तैनात हुए थे। बाद में इन्होंने अपने रसूख का फायदा उठाकर राजकीय निर्माण निगम में समायोजन करा लिया था। वहीं बाद में जूनियर होने के बाद पूर्व एमडी यूके गहलोत की मेहरबानी से एजीएम कांट्रैक्ट और इलेक्ट्रिकल जोन-3 के पद पर तैनाती करा ली जबकि इनसे कई सीनियर अधिकारी इस पद के लिए अर्हता रखते हैं।

पक्ष रखने से भी कतराए जिम्मेदार

मामले पर जानकारी के लिए जब उत्तरप्रदेश राजकीय निर्माण निगम के एमडी सत्यप्रकाश से उनके लैंडलाइन नम्बर में बात करने की कोशिस की गई तो पहले तो मीटिंग का हवाला देकर ऑफिस के जिम्मेदारों ने टाला, लेकिन तीन-चार बार लगातार कॉल करने के बाद एमडी सत्यप्रकाश का पर्सनल नम्बर तो मिला परन्तु उन्होंने फोन ही कट कर दिया, जवाब देना उचित नहीं समझा।।

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