आजकल ढाबों, होटलों और ऑनलाइन डिलीवरी में इस्तेमाल होने वाले काले प्लास्टिक डिब्बों को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। हाल ही में इस मुद्दे पर राज्यसभा में भी चर्चा हुई, जहां सांसद घनश्याम तिवाड़ी ने सवाल उठाया कि क्या ऐसे कंटेनर सेहत के लिए खतरा बन सकते हैं।
काले प्लास्टिक में क्या समस्या है?
रिपोर्ट्स के अनुसार, इन डिब्बों में अक्सर रिसाइकल्ड प्लास्टिक, यहां तक कि इलेक्ट्रॉनिक कचरे से निकला प्लास्टिक भी इस्तेमाल हो सकता है। इन्हें मजबूत बनाने या आग से बचाने के लिए कुछ केमिकल (जैसे फ्लेम रिटार्डेंट) मिलाए जाते हैं। समस्या यह है कि ये केमिकल प्लास्टिक में पूरी तरह बंधे नहीं रहते और गर्म होने पर खाने में मिल सकते हैं।
इसके अलावा, ऐसे प्लास्टिक में BPA (Bisphenol A) और फ्थेलेट्स जैसे हानिकारक केमिकल भी हो सकते हैं, जो शरीर के हार्मोन सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं।
सेहत पर क्या असर पड़ सकता है?
- लंबे समय तक ऐसे प्लास्टिक के संपर्क में रहने से हार्मोनल गड़बड़ी हो सकती है
- कुछ रिसर्च के अनुसार कैंसर का खतरा बढ़ने की आशंका जताई गई है
- दिल की बीमारी, डायबिटीज और प्रजनन संबंधी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है
- माइक्रोप्लास्टिक शरीर में जाकर टॉक्सिक असर बढ़ा सकते हैं
एक स्टडी में पाया गया कि 80% से ज्यादा काले प्लास्टिक उत्पादों में हानिकारक केमिकल मौजूद हो सकते हैं।
कौन ज्यादा प्रभावित हो सकता है?
बच्चे, गर्भवती महिलाएं और पहले से बीमार लोग इसके असर के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं।
क्या करें? (सुरक्षित विकल्प)
- स्टील, कांच या कागज के कंटेनर में खाना रखना बेहतर है
- प्लास्टिक में खाना गरम करने से बचें
- बार-बार प्लास्टिक डिब्बों का उपयोग न करें
- माइक्रोवेव में प्लास्टिक का इस्तेमाल बिल्कुल न करें
निष्कर्ष:
हर काला प्लास्टिक खतरनाक हो, यह जरूरी नहीं, लेकिन उसमें मौजूद केमिकल्स और गर्मी के साथ उनकी प्रतिक्रिया को देखते हुए सावधानी रखना समझदारी है। खासकर गरम खाना रखने या गर्म करने के लिए प्लास्टिक से बचना सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है।


































