मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका और इजरायल जहां युद्ध में भारी खर्च कर रहे हैं, वहीं इस संकट के बीच रूस को बड़ा आर्थिक फायदा होता नजर आ रहा है। बढ़ती तेल कीमतों और सप्लाई बाधित होने की आशंका ने रूसी तेल की मांग को अचानक बढ़ा दिया है।
जब Donald Trump ने 2025 में दोबारा व्हाइट हाउस की कमान संभाली, तो उनकी सरकार ने शुरुआत से ही रूस के ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बनाने की नीति अपनाई। यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर अमेरिका ने रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिश की और उसके प्रमुख तेल खरीदार देशों, खासकर India और China पर भी दबाव डाला। इसी नीति के तहत भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की गई थी, ताकि वह रूस से तेल खरीद कम कर दे। हालांकि बाद में अमेरिका ने भारत को सीमित राहत भी दी।
लेकिन हालात तब बदल गए जब अमेरिका और इजरायल की ओर से Iran पर सैन्य कार्रवाई के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव तेजी से बढ़ गया। इस संघर्ष ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा क्षेत्र से कच्चे तेल की सप्लाई पर असर डालना शुरू कर दिया। इससे रूस के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका बन गया।
युद्ध के बाद कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में तेजी आई है। Brent Crude की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई, जो 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। इसी के साथ रूस के प्रमुख निर्यात तेल Urals crude oil की कीमत भी बढ़कर लगभग 78 से 82 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जबकि युद्ध से पहले यह करीब 65 से 68 डॉलर प्रति बैरल के बीच थी।
मिडिल ईस्ट में अस्थिरता और सप्लाई चेन बाधित होने के डर से पिछले कुछ दिनों में रूसी तेल की मांग में करीब 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। खासतौर पर Strait of Hormuz के बंद होने की आशंका ने वैश्विक तेल बाजार में चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक चौथाई हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है।
रूस ने इस स्थिति का फायदा उठाते हुए अपने तेल निर्यात में भी बढ़ोतरी की है। पहले रूस रोजाना लगभग 32 लाख बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति करता था, जो अब बढ़कर करीब 35 लाख बैरल प्रतिदिन हो गई है। इसके साथ ही रूस ने भारत को मिलने वाली छूट भी घटा दी है। पहले भारत को यूराल तेल पर 8 से 10 डॉलर प्रति बैरल की छूट मिलती थी, जो अब घटकर करीब 2 से 4 डॉलर प्रति बैरल रह गई है।
रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin ने भी संकेत दिया है कि यदि यूरोपीय देश राजनीतिक मतभेदों को कम कर स्थायी सहयोग के लिए तैयार होते हैं, तो रूस उन्हें तेल और गैस की आपूर्ति जारी रखने को तैयार है। उन्होंने यह भी कहा कि रूस एशियाई साझेदारों के साथ-साथ यूरोपीय देशों जैसे हंगरी और स्लोवाकिया को ऊर्जा आपूर्ति जारी रख सकता है।
दूसरी ओर, युद्ध में अमेरिका का खर्च तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिकी प्रशासन इस संघर्ष में हर दिन करीब 891 मिलियन डॉलर यानी लगभग 8 हजार करोड़ रुपये खर्च कर रहा है। युद्ध के पहले ही सप्ताह में कुल खर्च करीब 6 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया।
सैन्य अभियानों के खर्च पर नजर डालें तो हवाई हमलों पर प्रतिदिन लगभग 30 मिलियन डॉलर, नौसेना संचालन पर करीब 15 मिलियन डॉलर और जमीनी अभियानों पर लगभग 1.6 मिलियन डॉलर खर्च किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसका असर वैश्विक तेल बाजार, महंगाई और कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर गहरा पड़ सकता है।


































